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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इस प्रकार महात्मा हरिदास जी भगवन्नाम का माहात्म्य स्थापित करते हुए गंगा जी के किनारे निवास करने लगे। जब उन्होंने सुना कि नवद्वीप में उदय होकर गौरचन्द्र अपनी शीतल और सुखमयी कृपा-किरणों से भक्तों के हृदयों को भक्ति-रसामृत से सिंचन कर रहे हैं, तो ये भी उस निष्कलंकपूर्ण चन्द्र की छत्र-छाया में आकर नवद्वीप में रहने लगे। ये अद्वैताचार्य के कृपापात्र तो पहले से ही थे, इसलिये इन्हें प्रभु के अन्तरंग भक्त बनने में अधिक समय नहीं लगा। थोड़े ही दिनों में ये प्रभु के प्रधान कृपापात्र भक्तों में गिने जाने लगे। इनकी भगवन्नाम-निष्ठा का सभी भक्त बड़ा आदर करते थे। प्रभु इन्हें बहुत अधिक चाहते थे। इन्होंने भी अपना सर्वस्व प्रभु के पादपद्मों में समर्पित कर दिया था। इनकी प्रत्येक चेष्टा प्रभु की इच्छानुसार ही होती थी। ये भक्तों के साथ संकीर्तन में रात्रि-रात्रि भर नृत्य करते रहते थे और नृत्य में बेसुध होकर गिर पड़ते थे। इस प्रकार श्रीवास पण्डित का घर श्रीकृष्ण-संकीर्तन का प्रधान अड्डा बन गया। शाम होते ही सब भक्त एकत्रित हो जाते। भक्तों के एकत्रित हो जाने पर किवाड़ बन्द कर दिये जाते और फिर संकीर्तन आरम्भ होता। फिर चाहे कोई भी क्येां न आये, किसी के लिये किवाड़ नहीं खुलते थे। इससे बहुत-से आदमी निराश होकर लौट जाते और वे संकीर्तन के सम्बन्ध में भाँति-भाँति के अपवाद फैलाते। इस प्रकार एक ओर तो सज्जन भक्त संकीर्तन के आनन्द में परमानन्द का रसास्वादन करने लगे और दूसरी ओर निन्दक लोग संकीर्तन के प्रति बुरे भावों का प्रचार करते हुए अपनी आत्मा को कलुषित बनाने लगे।

सप्तप्रहरिया भाव....

महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन के प्रार्थना करने पर भगवान ने उसे अपना विराटरूप दिखाया था। भगवान का वह विराटरूप अर्जुन को ही दृष्टिगोचर हुआ था। दोनों सेनाओं के लाखों मनुष्य वहाँ उपस्थित थे, किंतु उनमें से किसी को भी भगवान के उस रूप के दर्शन नहीं हुए थे। अर्जुन भी इन चर्म-चक्षुओं से भगवान के दर्शन नहीं कर सकते थे, इसलिये कृपा करके भगवान ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान कर दी थी। इसीलिये दिव्य दृष्टि के सहारे उस अलौकिक रूप को देखने में समर्थ हो सके। इधर भगवान वेदव्यास जी ने संजय को दिव्य दृष्टि दे रखी थी, इस कारण उन्हें भी हस्तिनापुर में बैठे-ही-बैठे उस रूप के दर्शन हो सके। असल में दिव्य दृष्टि के बिना दिव्य रूप के दर्शन हो ही नहीं सकते। बाहरी लौकिक दृष्टि से तो बाहर के भौतिक पदार्थ ही देखे जा सकते हैं। जब तक भीतरी नेत्र न खुलें, जब तक कृपा करके श्रीकृष्ण दिव्य दृष्टि प्रदान न करें तब तक अलौकिक और परम प्रकाशमय स्वरूप दीख ही नहीं सकता। भक्तों का लोक ही अलग होता है, उसकी भाषा अलग होती है और उसका व्यवहार भी भिन्न ही प्रकार का होता है। जिसे भगवान कृपा करके अपना लेते हैं, अपना कहकर जिसे वरण कर लेते हैं और जिसकी रतिरूपी अन्तर्दृष्टि को खोल देते हैं, उसे ही अपने ध्येय पदार्थ में इष्टदेव के दर्शन होते हैं। उसके सामने ही उसके भाव ज्यों-के-त्यों प्रकट होते हैं। दृढ़ विश्वास के बिना कहीं भी अपने इष्टदेव के दर्शन नहीं हो सकते।
गौरांग के जीवन में द्विविध भाव दृष्टिगोचर होते थे। वैसे तो वे सदा एक अमानी भवत-भक्त के भाव में रहते थे, किंतु कभी-कभी उनके शरीर में भगवत-भाव भी प्रकट होता था, उस समय उनकी सभी चेष्टाएँ तथा व्यवहार ऐश्वर्यमय होते थे। ऐसा भाव बहुत देर तक नहीं रहता था, कुछ काल के ही अनन्तर उस भाव का शमन हो जाता और फिर ये ज्यों-के-त्येां ही साधारण भगवत-भक्त के भाव में आ जाते। अब तक ऐसे भाव थोड़ी ही देर को हुए थे, किंतु एक बार ये पूरे सात प्रहर भगवत-भाव में बने रहे। इस भाव को ‘सप्तप्रहरिया भाव’ या ‘महाप्रकाश’ कहकर वैष्णव भक्तों ने इसका विशदरूप से वर्णन किया है। नवद्वीप में प्रभु के शरीर में यही सबसे बड़ा भाव हुआ था।वासुदेव घोष, मुरारी गुप्त और मुकुन्द दत्त- ये तीनों उस महाप्रकाश के समय वहाँ मौजूद थे। ये तीनों ही वैष्णवों में प्रसिद्ध पदकार हुए हैं। इन तीनों ने चैतन्यचरित्र लिखा है। इन्होंने अपनी आँखेां का प्रत्यक्ष देखा हुआ वर्णन किया है, इतने पर भी विश्वास न करने वाले विश्वास नहीं करते, क्योंकि वे इस विषय से एकदम अनभिज्ञ हैं। उनकी बुद्धि भौतिक पदार्थों के अतिरिक्त् ऐसे विषयों में प्रवेश ही नहीं कर सकती। किंतु जिनका परमार्थ-विषय में तनिक भी प्रवेश होगा, उन्हें इस विषय के श्रवण से बड़ा सुख मिलेगा, इसलिये अब ‘महाप्रकाश’ का वृत्तान्त सुनिये।

एक दिन प्रातःकाल ही सब भक्त श्रीवास पण्डित के घर पर जुटने लगे। एक-एक करके सभी भक्त वहाँ एकत्रित हो गये। उनमें से प्रधान-प्रधान भक्तों के नाम ये हैं- अद्वैताचार्य, नित्यानन्द, श्रीवास, गदाधर, मुरारी गुप्त, मुकुन्द दत्त, नरहरि, गंगादास, महाप्रभु के मौसा चन्द्रशेखर आचार्यरत्न, पुरुषोत्तम आचार्य (स्वरूपदामोदर) वक्रेश्वर, दामोदर, जगदानन्द, गोविन्द, माधव, वासुदेव घोष, सारंग तथा हरिदास आदि-आदि। इनके अतिरिक्त और भी बहुत-से भक्त वहाँ उपस्थित थे।

एक प्रहर दिन चढ़ते-चढ़ते प्रायः सभी मुख्य-मुख्य भक्त श्रीवास पण्डित के घर आ गये थे कि इतने में ही प्रभु पधारे। प्रभु के पधारते ही भक्तों के हृदयों में एक प्रकारके नवजीवन का-सा संचार होने लगा। और दिन तो प्रभु अन्य भक्तों की भाँति आकर बैठ जाते और सभी के साथ मिलकर भक्ति-भाव से बहुत देर तक संकीर्तन करते रहते, तब कहीं जाकर किसी दिन भगवत-आवेश होता, किंतु आज तो सीधे आकर एकदम भगवान के सिंहासन पर बैठ गये। सिंहासन की मूर्तियाँ एक ओर हटा दीं और आप शान्त, गम्भीर भाव से भगवान के आसन पर आसीन हो गये। इनके बैठते ही भक्तों के हृदयों में एक प्रकार का विचित्र-सा प्रकाश दिखायी देने लगा। सभी आश्चर्य और सम्भ्रम के भाव से प्रभु के श्रीविग्रह की ओर देखने लगे। किंतु किसी को उनकी ओर बहुत देर तक देखने का साहस ही नहीं होता था।
भक्तों को उनका सम्पूर्ण शरीर तेजोमय परम प्रकाशयुक्त दिखायी देने लगा। जिस प्रकार हजारों सूर्य-चन्द्रमा एक ही स्थान पर प्रकाशित हो रहे हों।
क्रमशः

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