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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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बहुत प्रयत्न करने पर भी किसी की दृष्टि बहुत देर तक प्रभु के सम्मुख टिक नहीं सकती थी। एकदम, चारों ओर विमल-धवल प्रकाश की ज्योतिर्मय किरणें छिटक रही थीं। मानो अग्नि की शुभ्र ज्वाला में से बड़े-बड़े विस्फुलिंग इधर-उधर उड़-उड़कर अन्धकार का संहार कर रहे हों। प्रभु के नखों की ज्योति आकाश में बड़े-बड़े नक्षत्रों की भाँति स्पष्ट ही पृथक-पृथक दिखायी पड़ती थी। उनका चेहरा देदीप्यमान हो रहा था।भक्तों की आँखों में यकाचैंध छा जाता, किंतु उस रूप से दृष्टि हटाने को तबीयत नहीं चाहती थी। इस प्रकार सभी भक्त बहुत देर तक पत्थर की निर्जीव मूर्तियों की भाँति स्तब्ध-भाव से चुपचाप बैठे रहे, उस समय कोई जोर से साँस तक नहीं लेता था, यदि एक सूई भी उस समय गिर पड़ती, तो उसकी भी आवाज सबको सुनायी देती। उस नीरव निस्तब्धता को भंग करते हुए प्रभु ने गम्भीर भाव से कहना आरम्भ किया- ‘भक्तवृन्द! हम आज तुम सब लोगों की मनःकामना पूर्ण करेंगे। आज तुम लोग हमारा विधिवत अभिषेक करो।’
प्रभु की ऐसी आज्ञा पाते ही सभी को अत्यन्त ही आनन्द हुआ। श्रीवास के आनन्द की तो सीमा ही न रही। वे प्रेम के कारण अपने आपे को भूल गये। जिस प्रकार कोई चक्रवर्ती राजा किसी कंगाल के प्रेम के वशीभूत होकर सहसा उसकी टूटी झोंपड़ी में स्वयं आ जाय, उस समय उसकी जो दशा हो जाती है, उससे भी अधिक प्रेममय दशा श्रीवास पण्डित की हो गयी। वे आनन्द के कारण हक्के-बक्के-से हो गये। शरीर की सुधि भुलाकर स्वयं ही घड़ा उठाकर गंगा जी की ओर दौड़े, किंतु बीच में ही प्रेम के कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़े। तब उनके दास-दासी बहुत-से घड़े लेकर गंगाजल लेने के लिये चल दिये। बहुत-से भक्त भी कहीं-कहीं से घड़ा माँगकर गंगाजल लेने के लिये दौड़े गये। बहुत-से घड़ों में गंगाजल आ गया। भक्तों ने प्रभु को एक सुन्दर चैकी पर बिठाकर उनके सम्पूर्ण शरीर में भाँति-भाँति के सुगन्धित तैलों की मालिश की। तदनन्तर सुवासित जल के घड़ों से उन्हें विधिवत स्नान कराया। अद्वैताचार्य और आचार्यरत्न प्रभृति पण्डितश्रेष्ठ महापुरुष स्नान के मन्त्रों का उच्चारण करने लगे। भक्त बारी-बारी से प्रभु के श्रीअंग पर गंगाजल डालते जाते थे और मन-ही-मन प्रसन्न होते थे। इस प्रकार घंटों तक स्नान ही होता रहा। जब सभी ने अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार स्नान करा दिया तब प्रभु के श्रीअंग को एक महीन सुन्दर स्वच्छ वस्त्र से खूब पोंछा गया। उसी समय श्रीवास पण्डित अपने घर में से नूतन महीन रेशमी वस्त्र निकाल लाये। उन सुन्दर वस्त्रों को भक्तों ने विधिवत प्रभु के शरीर में पहनाया और फिर उन्हें एक सजे हुए सुन्दर सिंहासन पर विराजमान किया।
प्रभु के सिंहासनारूढ़ हो जाने पर भक्तों ने बारी-बारी से प्रभु के अंगों में केसर, कपूर तथा कस्तूरी मिले हुए चन्दन का लेप किया। चरणों में तुलसी ओर चन्दन चढ़ाया। मालाएँ घर में थोड़ी ही थीं, यह समझकर कुछ भक्त उसी समय बाजार में दौड़े गये और बहुत-सी सुन्दर-सुन्दर मालाएँ जल्दी से खरीद लाये। सभी ने एक-एक करके प्रभु के गले में मालाएँ पहनायीं। भक्तों के चढ़ाये हुए पुष्पों से प्रभु के पादपद्म एकदम ढक गये और मालाओं से सम्पूर्ण गला भर गया। प्रभु ने सभी भक्तों को अपने करकमलों से प्रसादीमाला प्रदान की। प्रभु की उस प्रसादीमाला को पाकर भक्त आनन्द के साथ नृत्य करने लगे।
श्रीवास तो बेसुध थे। उनकी दशा ऐसी हो गयी थी मानो किसी जन्म के दरिद्री को पारसमणि मिल गयी हो। उनका हृदय तड़ रहा था कि प्रभु की इस अलौकिक छवि के दर्शन किसे-किसे करा दूँ? जब कोई प्रिय वस्तु देखने को मिल जाती है, तब हृदय में यह इच्छा स्वाभाविक ही उत्पन्न होती है, इसके दर्शन अपने सभी प्रियजनों को करा दूँ। यह सोचकर उन्होंने अद्वैताचार्यजी के कान में कहा- ‘शचीमाता मुझे बहुत चिढ़ाया करती हैं। वे मुझसे बार-बार कहती हैं कि तुम सभी ने मिलकर मेरे निमाई को बिगाड़ दिया। पहले वह कितना सीधा-सादा था, अब तुम्हीं सब न जाने उसे क्या-क्या सिखा देते हो? आज माता को लाकर दिखाऊँ कि देख तेरा निमाई असल में यह है। यह तेरा पुत्र नहीं है, किंतु सम्पूर्ण जगत का पिता है। यदि आपकी अनुमति हो तो मैं शचीमाता को बुला लाऊँ।’
आचार्य ने श्रीवास की बात का समर्थन करते हुए कहा- ‘हाँ, हाँ, अवश्य। शचीमाता को जरूर दर्शन कराना चाहिये।’
इतना सुनते ही श्रीवास पण्डित जल्दी से दौड़कर शचीमाता को बुला लाये। शचीमाता को देखते ही अद्वैताचार्य कहने लगे- ‘माता! यह सामने देखो, जिन्हें तुम अपना बताती थी, वे अब तुम्हारे पुत्र नहीं रहे। अब तुम इनके दर्शन करो और अपने जीवन को सफल बनाओ।’
माता भौचक्की-सी चुपचाप खड़ी ही रही। उसे कुछ सूझा ही नहीं कि मुझे क्या करना चाहिये। श्रीवास पण्डित ने माता की ऐसी दशा देखकर दीन-भाव से प्रार्थना की- ‘प्रभो! ये जगन्माता शची देवी सामने खड़ी हैं। इन्हें आपकी माता होने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इनके ऊपर कृपा होनी चाहिये। इन्हें आपके असली स्वरूप के दर्शन हों यही हमारी प्रार्थना है।’
प्रभु ने हुँकार देते हुए कहा- ‘शचीमाता के ऊपर कृपा नहीं हो सकती। यह सदा वैष्णवों को बुरा बताया करती हैं कि सभी वैष्णवों ने मिलकर मेरे निमाई को बरबाद कर दिया।’
प्रभु की ऐसी बात सुनकर अद्वैताचार्य ने कहा- ‘प्रभो! माता का आपके प्रति वात्सल्य-भाव है। वह जो भी कुछ कहती है वात्सल्य स्नेह के वशीभूत होकर ही कहती है। वैष्णवों के प्रति इसके हृदय में द्वेष के भाव नहीं हैं। इसकी उपासना वात्सल्य-भाव की ही है। इसके ऊपर अवश्य कृपा होनी चाहिये।’
अद्वैताचार्य यह प्रार्थना कर ही रहे थे कि धीरे से श्रीवास पण्डित ने माता के कान में कहा- ‘तुम प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम करो।’ माता पुत्र के लिये प्रणाम करने में कुछ हिचकने लगी, तब आचार्य ने जोर देते हुए कहा- ‘माँ! अब तुम निमाई के भाव को भुला दो। इन्हें भगवत-बुद्धि से प्रणाम करो। देर करने का काम नहीं है।’
वृद्ध आचार्य के ऐसा आग्रह करने पर माता ने आगे बढ़कर प्रभु के पादपद्मों में साष्टांग प्रणाम किया।
क्रमशः
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