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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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माता गद्गदकण्ठ से प्रार्थना करने लगी- ‘भगवन! मैं अज्ञ स्त्री तुम्हारे बारे में कुछ भी नहीं जानती कि तुम कौन हो। तुम जो भी हो, मेरे ऊपर कृपा करो।’ माता को प्रणाम करते देखकर प्रभु ने उसके मस्तक पर अपने चरणों को रखते हुए कहा- ‘जाओ, सब वैष्णव-अपराध क्षमा हुए, तुम्हारे ऊपर पूर्ण कृपा हुई।’ माता यह सुनकर आनन्द में विभोर होकर रुदन करने लगी।
अब तो सभी भक्त क्रमशः प्रभु की भाँति-भाँति की पूजा करने लगे। कोई धूप चढ़ाता, कोई दीप सामने रखता, कोई फल-फूल सामने रखता और कोई-कोई नवीन-नवीन, सुन्दर-सुन्दर वस्त्र लाकर प्रभु के शरीर पर धारण कराता।
इस प्रकार सभी ने अपनी-अपनी इच्छानुसार प्रभु की पूजा की। अब भोग की बारी आयी। सभी अपनी-अपनी इच्छा और रुचि के अनुसार विविध प्रकार के व्यंजन, नाना भाँति की मिठाइयाँ और भाँति-भाँति के फलों को सजा-सजाकर प्रभु के भोग के लिये लाये। सभी प्रसन्नतापूर्वक प्रभु के हाथों में भाँति-भाँति की वस्तुएँ देने लगे। कोई तो मिठाई देकर कहता- ‘प्रभु! इसका भोग लगाइये।’ प्रभु उसे प्रेमपूर्वक खा जाते। कोई फल देकर ही प्रार्थना करता- ‘इसे स्वीकार कीजिये।’ प्रभु चुपचाप फलों को ही भक्षण कर जाते। कोई लड्डू, पेड़ा तथा भाँति-भाँति की मिठाई देते, कोई कटोरों में दूध लेकर ही प्रार्थना करता- ‘प्रभो! इसे आरोगिये।’ प्रभु इसे भी पी जाते। उस समय जिसने जो भी वस्तु प्रेमपूर्वक दी, प्रभु ने उसे ही भक्षण कर लिया। किसी की वस्तु को अस्वीकार नहीं किया। भला अस्वीकार कर भी कैसे सकते थे? उनकी तो प्रतिज्ञा है कि ‘यदि कोई भक्ति से मुझे फल-फूल या पत्ते भी देता है, तो उन फूल-पत्तों को भी मैं खुश होकर खा जाता हूँ।’ फिर भक्तों के प्रेम से दिये हुए नैवेद्य को वह किस प्रकार छोड़ सकते थे।
उस दिन प्रभु ने कितना खाया और भक्तों ने कितना खिलाया इसका अनुमान कोई भी नहीं कर सकता। सबके प्रेम-प्रसाद को पाने के अनन्तर श्रीवास पण्डित ने अपने काँपते हुए हाथों से सुवासित ताम्बूल प्रभु के अर्पण किया। प्रभु प्रेमपूर्वक ताम्बूल चर्बण करने लगे। सभी बारी-बारी से ताम्बूल भेंट करने लगे। प्रभु उन्हें स्पर्श करके भक्तों को प्रसाद के रूप में देते जाते थे। प्रभुदत्त पान को पाकर सभी भक्त अपने भाग्य की सराहना करने लगे।ताम्बूल भक्षण के अनन्तर प्रभु मन्द-मन्द मुस्कान के साथ सभी पर अपनी कृपादृष्टि फेरते हुए कुछ प्रेम की बातें कहने लगे। उस समय उनके मुख से जो भी बातें निकलतीं, वे सभी अमृत-रस से सिंची हुई होती थीं। भक्तों के हृदय में वे एक प्रकार की विचित्र प्रकार की खलबली-सी उत्पन्न करने वाली थीं। प्रभु की उस समय की वाणी में इतना अधिक आकर्षण था कि सभी बिना हिले-डुले, एक आसन से बैठे हुए प्रभु के मुख से निःसृत उपदेशरूपी रसामृत का निरन्तर भाव से पान कर रहे थे। किसी को कुछ पता ही नहीं था कि हम किस लोक में बैठे हुए हैं? उस समय भक्तों के लिये इस दृश्य जगत के प्रपंचों का एक प्रकार से अत्यन्ताभाव ही हो गया था। प्रातःकाल से बैठे-बैठे संध्या हो गयी, भगवान भुवनभास्कर भी प्रभु के भाव-परिवर्तन की प्रतीक्षा करते-करते अस्ताचल को प्रस्थान कर गये, किंतु प्रभु के भाव में अणुमात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ। भक्त भी उसी प्रकार प्रेमपाश में बँधे वहीं बैठे रहे।
श्रीवास पण्डित के सेवकों ने घर में दीपक जलाये, किंतु उन क्षीण दीपकों की ज्योति प्रभु की देह के दिव्य प्रकाश में फीकी-फीकी-सी प्रतीत होने लगी। किसी को पता ही नहीं चला कि दिन कब समाप्त हुआ और कब रात्रि हो गयी। सभी उस दिव्यालोक के प्रकाश में अपने आपे को भूले हुए बैठे थे।
भक्तों को भगवान के दर्शन....
श्री कृष्ण भगवान ने जब बलदेव जी के साहित कंस के रंगमण्डप में प्रवेश किया था, तब वहाँ पर विभिन्न प्रकृति के मनुष्य बैठे हुए थे। उन्होंने अपनी-अपनी भावना के अनुसार भगवान के शरीर में भिन्न-भिन्न रूपों के दर्शन किये थे। इसलिये वहाँ के उपस्थित नर-नारियों को अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार नवों रसों का अनुभव हुआ। कोई तो भगवान के रूप को देखकर डर गये, कोई काँपने लगे, कोई घृणा करने लगे, कोई हँसने लगे, किसी के हृदय में प्रेम उत्पन्न हुआ और किसी को क्रोध उत्पन्न हुआ। स्त्रियों को तो वे साक्षात कामदेव ही प्रतीत हुए। किंतु यहाँ प्रभु के प्रकाश के समय सभी एक ही प्रकृति के भगवद्भक्त ही थे। इसलिये प्रभु के महाभाव से सभी को समानभाव से आनन्द ही हुआ, सभी ने उनके प्रकाश के आलोक में सुख का ही अनुभव किया, सभी ने उनमें भगवत्ता के ही दर्शन किये, किंतु सबके इष्ट भिन्न-भिन्न होने के कारण, एक ही भगवान उन्हें विभिन्न भाव से दिखायी दिये। सभी ने प्रभु के शरीर में अपने-अपने इष्टदेव का ही स्वरूप देखा।
सबसे पहले बातों-ही-बातों में प्रभु ने श्रीवास पण्डित के ऊपर कृपा की। आपने श्रीवास पण्डित को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘श्रीवास! तुम हमारे परम कृपापात्र हो, हम सदा ही तुम्हारी देख-रेख करते हैं। तुम्हें वह घटना याद है, जब देवानन्द पण्डित के यहाँ तुम बहुत-से अन्य शिष्यों के सहित श्रीमद्भागवत कापाठ सुन रहे थे। पाठ सुनते-सुनते तुम बीच में ही भावावेश में आकर मूर्च्छित हो गये थे। उस समय तुम्हारे भावावेश को न तो पण्डित जी ही समझ सके थे और न उनके शिष्य ही समझ सके थे। शिष्य तुम्हें कन्धों पर लादकर तुम्हारे घर पहुँचा गये थे। उस समय मैंने ही तुम्हें होश में किया था, मैंने ही तुम्हारी मूर्च्छा भंग की थी।’
प्रभु के मुख से अपनी इस गुप्त घटना को सुनकर श्रीवास पण्डित को परम आश्चर्य हुआ। उन्होंने यह घटना किसी के सम्मुख प्रकट नहीं की थी। इसके अनन्तर प्रभु अद्वैताचार्य को लक्ष्य करके कहने लगे- ‘आचार्य! तुम्हें उस दिन की याद है जब तुम्हें श्रीमद्भगवद्गीता के निम्न श्लोक पर शंका हो गयी थी-
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।
और तुम उस दिन बिना ही भोजन किये सो गये थे, इस पर मैंने ही ‘पाणिपादं तत्’ की जगह ‘पाणिपादान्तः’ यह प्रकृत पाठ बताकर तुम्हारी शंका का निवारण किया था।’
क्रमशः
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