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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा- ‘मुरारी! तुम्हारे भक्त होने में यही एक अपूर्णता है, तुम शुष्क वाद-विवाद करना त्याग दो। अध्यात्मशास्त्रों में भक्तिग्रन्थों को ही प्रधानता दो।’
मुरारी गुप्त ने कहा- ‘मैं वाद-विवाद और तर्क-वितर्क और कहाँ करता हूँ, केवल विद्वानों के समीप कुछ प्रसंग चलने पर कह देता हूँ।’
प्रभु ने कहा- ‘अद्वैताचार्य के साथ तुम तर्क-वितर्क नहीं किया करते? क्या उनसे तुम अद्वैतवेदान्त की बातें नहीं बघारा करते?’ इस पर अद्वैताचार्य ने प्रभु से पूछा- ‘प्रभो! क्या अद्वैतवेदान्त की बातें करना बुरा काम है?’
प्रभु ने कुछ मुसकराते हुए कहा- ‘बुरा काम कौन बताता है? बहुत अच्छा है, किंतु जिन्होंने भक्ति-पथ का अनुसरण किया हे, उन्हें इसप्रकार की सिद्धियों और प्रक्रियाओं के चक्कर में पड़ने का प्रयोजन ही क्या है?’ यह कहकर प्रभु गम्भीर घोष से इस श्लोक को पढ़ने लगे-
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता।।
प्रभु की ऐसी आज्ञा सुनकर मुरारी चुप हो गये। इस पर प्रभु ने कहा- ‘मुरारी! तुम्हें ब्रह्म की सिद्धि के लिये प्रक्रियाओं की शरण लेने की क्या आवश्यकता है? तुम्हारे भगवान तो जन्मसिद्ध हैं। तुम तो प्रभु के जन्म-जन्मान्तरों के भक्त हो। हनुमान के समान तुम्हारा भाव और विग्रह है। तुम साक्षात हनुमान ही हो। अपने रूप का तो स्मरण करो।’
मुरारी रामभक्त थे, प्रभु के स्मरण दिलाने पर वे अपने इष्टदेव का ध्यान करने लगे। उन्हें ऐसा भान हुआ कि मैं साक्षात हनुमान ही हूँ और अपने इष्टदेव के चरणों में बैठा हुआ उनकी पूजा कर रहा हूँ। उन्होंने ऊपर को आँख उठाकर प्रभु की ओर देखा। उन्हें प्रभु का रूप अपने इष्टदेव सीता-राम के ही रूप में दिखायी देने लगा। अपने इष्टदेव को प्रभु के श्रीविग्रह के रूप में देखकर मुरारी गद्गदकण्ठ से स्तुति करने लगे और बार-बार भूमि पर लोटकर साष्टांग प्रणाम करने लगे।
प्रभु के वरदान माँगने की आज्ञा पर हाथ जोड़े हुए मुरारी ने अविचल श्रीराम-भक्ति की ही प्रार्थना की, जिसे प्रभु ने उनके मस्तक पर अपने पादपद्म रखकर प्रेमपूर्वक प्रदान की।
इसके अनन्तर एक-एक करके सभी भक्तों की बारी आयी। अद्वैत, श्रीवास, वासुदेव सभी ने प्रभु से अहैतु की भक्ति की ही प्रार्थना की। हरिदास अपने को बहुत ही दीन-हीन, कंगाल और अधम समझते थे। उन्हें प्रभु के सम्मुख होने में संकोच होता था, इसलिये वे सबसे दूर भक्तों के पीछे छिपे हुए बैठे थे। प्रभु ने गम्भीर-भाव से कहा- ‘हरिदास! हरिदास कहाँ है? उसे हमारे सामने लाओ।’ सभी भक्त चारों ओर हरिदास जी को खोजने लगे, हरिदास जी सबसे पीछे सिकुड़े हुए बैठे थे। भक्तों ने उन्हें प्रभु के सम्मुख होने को कहा- किंतु वे तो प्रेम में बेसुध थे। भक्तों ने उन्हें उठाकर प्रभु के सम्मुख किया।
हरिदास को सम्मुख देखकर प्रभु उनसे कहने लगे- ‘हरिदास! तुम अपने को नीच मत समझो। तुम सर्वश्रेष्ठ हो, मेरी तुम्हारी एक ही जाति है। जो तुम्हारा स्मरण-ध्यान करते हैं, वे मानो मेरी ही पूजा करते हैं। मैं सदा ही तुम्हारे साथ रहता हूँ। तुम्हारी पीठ पर जब बेंत पड़ रहे थे, तब भी मैं तुम्हारे साथ ही था, वे बेंत तो मेरी ही पीठ पर पड़ रहे थे। देख लो, मेरी पीठ पर अभी तक निशान बने हुए हैं। सभी भक्तों के कष्टों को मैं अपने ऊपर ही झेलता हूँ। इसलिये भारी-से-भारी कष्ट पड़ने पर भी भक्त दुःखी नहीं होते। कारण कि जो लोग भक्तों को कष्ट देते हैं, वे मानो मुझे ही कष्ट पहुँचाते हैं। इसीलिये अब मैं दुष्टों का संहार न करके उद्धार करूँगा। तुमने मुझसे दुष्टों के संहार की प्रार्थना नहीं की थी। किंतु उनकी बुद्धि-शुद्धि और कल्याण की ही प्रार्थना की थी। इसलिये अब मैं अपने सुमधुर नाम-संकीर्तन द्वारा दुष्टों का उद्धार कराऊँगा। मेरे इस कार्य में जाति-वर्ण या ऊँच-नीच का विचार न रहेगा। मेरे नाम-संकीर्तन से सभी पावन बन सकेंगे। अब तुम अपना अभीष्ट वर मुझसे माँगो!’
हाथ जोड़े हुए दीनभाव से हरिदास जी ने कहा- ‘हे वर देने वालों में श्रेष्ठ! हे दयालो! हे प्रेमावतार! यदि आपकी इच्छा मुझे वरदान ही देने की है, तो मुझे यही वरदान दीजिये कि मैं सदा दीन-हीन, कंगाल तथा निष्किंचन अमानी ही बना रहूँ। मुझे प्रभु के दास होने के अतिरिक्त् अन्य किसी भी प्रकार का अभिमान न हो, मैं सदा वैष्णवों की पदधूलि को अपने मस्तक का परम भूषण ही समझता रहूँ, वैष्णवों के चरणों में मेरी सदा प्रीति बनी रहे। इसी वरदान की मैं प्रभु के निकट से याचना करता हूँ।
इनकी इस प्रकार की वर-याचना को सुनकर भक्तमण्डली में चतुर्दिक् से आनन्दध्वनि होने लगी। सभी हरिदास जी की भक्ति-भावना की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। मुकुन्ददत्त से भी पाठक अपरिचित न होंगे। वे भी वहाँ उपस्थित थें किंतु अपने को प्रभु-दर्शन का अनधिकारी समझकर दूर ही बैठे रो रहे थे। श्रीवास पण्डित ने डरते-डरते प्रार्थना की- ‘प्रभो! ये मुकुन्द आपके अत्यन्त ही प्रिय हैं, इनके ऊपर भी कृपा होनी चाहिये। ये अपने को प्रभु के दर्शन तक का अधिकारी नहीं समझते।’
प्रभु ने कुछ रोष के स्वर में गम्भीर-भाव से कहा- ‘मुकुन्द के ऊपर कृपा नहीं हो सकती। ये अपने को वैसे तो भक्त करके प्रसिद्ध करते हैं, किंतु बातें सदा तार्किकों-सी किया करते हैं। वैष्णव-लीलाओं को पण्डित-समाज में बैठकर बाजीगर का खेल बताते हैं और अपने को बड़ा भारी विद्वान और ज्ञानी समझते हैं। इन्हें भगवान के दर्शन न हो सकेंगे?’
रोते-रोते मुकुन्द ने श्रीवास के द्वारा पुछवाया, हम कभी भी भगवत-कृपा के अधिकारी न बन सकेंगे? इनके कहने पर श्रीवास पण्डित ने पूछा- ‘प्रभो! मुकुन्द जिज्ञासा कर रहे हैं कि हम कभी भगवत-कृपा के अधिकारी बन भी सकेंगे?’
प्रभु ने कुछ उपेक्षा-भाव से उत्तर देते हुए कहा- ‘हाँ, कोटि जन्मों के बाद अधिकारी बन सकते हो।’ इतना सुनते ही मुकुन्द आनन्द में विभोर होकर नृत्य करने लगे और प्रेम में पुलकित होकर गद्गदकण्ठ से यह कहते हुए कि ‘कभी होंगे तो सही, कभी होंगे तो सही’ नृत्य करने लगे। वे स्वयं ही कहते जाते, कोटि जन्मों की क्या बात है। थोड़े ही काल में कोटि जन्म बीत जायँगे।
क्रमशः
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