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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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बिना असली प्रेम के विशुद्ध लीला हो ही नहीं सकती। अत: लज्‍जा, घृणा और भय-ये स्‍वार्थजन्‍य मोह के द्योतक भाव हैं। भक्‍तों में तथा बालकों में ये तीनों भाव नहीं होते तभी उनका हृदय विशुद्ध कहा जाता है।प्रेम में उन्‍मत्त हुआ भक्‍त कभी तो हंसता है, कभी रोता है, कभी गाता है और कभी संसार की लोक-लाज छोड़कर दिगम्‍बरवेश से ताण्‍डवनृत्‍य करने लगता है। उसका चलना विचित्र है, वह विलक्षण-भाव से हंसता है, उसकी चेष्‍टा में उन्‍माद है, उसके भाषण में निरर्थकता है और उसकी भाषा संसारीभाषा से भिन्‍न ही है। वह बालकों की भाँति सबसे प्रेम करता है, उसे किसी से भय नहीं, किसी बात की लज्‍जा नहीं नंगा रहे तो भी वैसा और वस्‍त्र पहने रहे तो भी वैसा ही। उसे बाह्य वस्‍त्रों की कुछ अपेक्षा नहीं, वह संसार के विधि-निषेध का गुलाम नहीं।

अवधूत नित्‍यानंद जी की भी यही दशा थी। बत्तीस वर्ष की अवस्‍था होने पर भी वे सदा बाल्‍यभाव में ही रहते। मालती देवी के सूखे स्‍तनों को मुंह में लेकर बच्‍चों की भाँति चूसते, अपने हाथ से दाल-भात नहीं खाते, तनिक-तनिक-सी बातों पर नाराज हो जाते और उसी क्षण बालाकें की भाँति हंसने लगते। श्रीवास को पिता कहकर पुकारते और उनसे बच्‍चों की भाँति हठ करते। गौरांग इन्‍हें बार-बार समझाते; किंतु ये किसी की एक भी नहीं सुनते। सदा प्रेम-वारूणी पान करके उसी के मद में मत्त-से बने रहते। शरीर का होश नहीं, वस्‍त्र गिर गया है, उसे उठाने तक की भी सुध नहीं है। नंगे हो गये हैं तो नंगे ही बाजार में धूम रहे है। खेल कर रहे है तो घंटों तक उसी में लगे हुए हैं। कभी बालकों के साथ खेलते, कभी भक्‍तों के साथ क्रीड़ा करते, कभी-कभी गौर को भी अपने बाल-कौतूहल से सुखी बनाते। कभी मालतीदेवी को ही वात्‍सल्‍य सुख पहुँचाते, इस प्रकार ये सभी को अपनी सरलता निष्‍कपटता, सहृदयता और बाल-चपलता से सदा आनन्दित बनाते रहते थे।
एक दिन ये श्रीवास पण्डित के घर के आंगन में खड़े-ही-खडे़ कुछ खा रहे थे, इतने में ही एक कौआ ठाकुर जी के घृत के दीपपात्र को उठा ले गया। इससे मालती देवी को बड़ा दु:ख हुआ। माता को दु:खी देखकर ये बालकों की भाँति कौए को टुकड़ा दिखाते हुए कहने लगे। बार-बार कौए को पुचकारते हुए गायन के स्‍वर में सिर हिला-हिलाकर कह रहे थे-
 
कौआ भैया आ जा, दूध बतासे खा जा।
मेरा दीपक दे जा, अपना टुकड़ा ले जा।
अम्‍मा बैठी रोवे, आंसू से मुंह धोवे।
उनको धीर बंधा जा, कौआ भैया आ जा।
दूध बतासे खा जा, आ जा प्‍यारे आ जा।

सचमुच में इतनी बात सुनकर कौआ जल्‍दी से आकर उस पीतल के पात्र को इनके समीप डाल गया। माता को इससे बड़ी प्रसन्‍नता हुई और वह इनमें ईश्‍वरभाव का अनुभव करने लगी। तब आप बड़े जोरों से खिलखिलाकर हंसने लगे और ताली बजा-बजाकर कहने लगे-

कौआ मेरा भैया, मेरी प्‍यारी मैया ।
मेरा वह प्‍यारा, बेटाहै तुम्‍हार।
मैंने पात्र मंगाया है, उससे जल्‍द मंगाया है।
अब दो मुझे मिठाई, लड्डू बालूसाई।

माता इनकी इस बाल-चपलता से बड़ी ही प्रसन्‍न हुईं। अब आप जल्‍दी से घर से बाहर निकले। बाजार में होकर पागलों की तरह दौड़ते जाते थे, न कुछ शरीर का होश है, न रास्‍ते की सुधि, किधर जा रहे हैं और कहाँ जा रहे हैं, इसका भी कुछ पता नहीं है। रास्‍तें में भागते-भागते लंगोटी खुल गयी, उसे जल्‍दी से सिरपर लपेट लिया, अब नंगे-धड़ंगे, दिगम्‍बर शिव की भाँति ताण्‍डव-नृत्‍य करते जा रहे हैं। रास्‍ते में लड़के ताली पीटते हुए इनके पीछे दौड़ रहे हैं, किंतु किसी की कुछ परवा ही नहीं। जोरों से चौकड़ियां भर रहे हैं। इस प्रकार बिलकुल नग्‍नावस्‍था में आप प्रभु के घर पहुँचे।प्रभु उस समय अपनी प्राणेश्‍वरी विष्‍णुप्रिया जी के साथ बैठे हुए कुछ प्रेम की बातें कर रहे थे, विष्‍णुप्रिया धीरे-धीरे पान लगा-लगाकर प्रभु को देती जाती थीं और प्रभु उनकी प्रसन्‍नता के निमित्त बिना कुछ कहे खाते जाते थे। वे कितने पान खा गये होंगे, इसका न तो विष्‍णुप्रिया जी को ही पता था, न प्रभु को ही। पान का तो बहाना था, असल में तो वहाँ प्रेम का खान-पान हो रहा था। इतने में ही नंगे-घड़ंगे उन्‍मत्त अवधूत पहुँच गये। आँखे लाल-लाल हो रही हैं, सम्‍पूर्ण शरीर धूलिधूसरित हो रहा है। लंगोटी सिर से लिपटी हुई है। शरीर से खूब लंबे होने कारण दिगम्‍बर वेश में ये दूर से देव की तरह दिखायी पड़ते थे। प्रभु के समीप आते ही ये पागलों की तरह हुं-हुं करने लगे। विष्णुप्रिया जी इन्हें नग्न देखकर जल्दी से घर में भाग गयीं और जल्दी से किवाड़ बंद कर लिये। शचीमाता भीतर बैठी हुई चर्खा चला रही थीं, अपनी बहू को इस प्रकार दौड़ते देखकर उन्‍होंने जल्‍दी से पूछा-‘क्‍यों, क्‍यों क्‍या हुआ?’

विष्‍णुप्रिया मुंह में वस्त्र देकर हंसने लगीं। माता ने समझा निमाई ने जरूर कुछ कौतूहल किया है। अत: वे पूछने लगीं- ‘निमाई यहीं है या बाहर चला गया?’

अपनी हंसी को रोकते हुए हांफते-हांफते विष्‍णुप्रिया जी ने कहा- ‘अपने बड़े बेटे को तो देखो, आज तो वे सचमुच ही अवधूत बन आये हैं।’ यह सुनकर माता बाहर गयीं और निताई की इस प्रकार की बाल-क्रीड़ाको देखकर हंसने लगी।
प्रभु ने नित्‍यानंद जी से पूछा- ‘श्रीपाद! आज तुमने यह क्‍या स्‍वांग बना लिया है? बहुत चंचलता अच्‍छी नहीं। जल्‍दी से लंगोटी बांधो।’ किंतु किसी को लंगोटी की सुधि हो तब तो उसे बांधे। उन्‍हें पता ही नहीं कि लंगोटी कहाँ है और उसे बांधना कहाँ होगा? प्रभु ने इनकी ऐसी दशा देखकर जल्दी से अपना पट्ट-वस्‍त्र इनकी कमर में स्‍वयं ही बांध दिया और हाथ पकड़कर अपने पास बिठाकर धीरे-धीरे पूछने लगे- ‘श्रीपाद! कहाँ से आ रहे हो? तुम्‍हें हो क्‍या गया है? यह धूलि सम्‍पूर्ण शरीर में क्‍यों लगा ली है।'

श्रीपाद तो गर्क थे, उन्‍हें शरीर का होश कहाँ, चारों ओर देखते हुए पागलों की तरह ‘हुँ-हुँ’ करने लगे। प्रभु इन की प्रेम की इतनी उँची अवस्‍था को देखकर अत्‍यंत ही प्रसन्‍न हुए।
क्रमशः

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