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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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बड़ों को भक्तिभाव से प्रणाम करते, छोटों से कुशल-क्षेम पूछते और बराबरवालों को गले से लगाते। मूर्ख-पण्डित, धनी-दरिद्र, ऊंच-नीच तथा छोटे-बड़े सभी प्रकार के लोग प्रभु को आदर की दृष्टि से देखने लगे। इधर भक्‍तों का उत्‍साह भी अब अधिकाधिक बढ़ने लगा।नित्‍यानंद जी और हरिदास जी के प्रतिदिन के प्रचार का प्रभाव प्रत्‍यक्ष ही दृष्टिगोचर होने लगा। पाठशाला जाते हुए बच्‍चे स्‍वर से हरि का कीर्तन करते हुए जाने लगे। गाय-भैंसों को ले जाते हुए ग्‍वाले महामंत्र को गुनगुनाते जाते थे। गंगा-स्‍नान को जाते हुए यात्री हरि कीर्तन करते हुए जाते थे। उत्सव तथा पर्वों में स्त्रियां मिलकर हरिनाम का ही गायन करती हूई निकलती थीं। लोगों ने पुरुषों की तो बात ही क्‍या, स्त्रियों तक को बाजारों में हरिनाम-संकीर्तन करते तथा ऊपर हाथ उठाकर प्रेम से नृत्‍य करते हुए देखा। चारों ओर ये ही शब्‍द सुनायी देने लगे-

कृष्‍ण केशव कृष्‍ण केशव कृष्‍ण केशव पाहि माम्।
राम राघव राम राघव राम राघव रक्ष माम्।
रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्‍ण हरे कृष्‍ण कृष्ण कृष्‍ण हरे हरे।
श्रीकृष्‍ण! गोविंद! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!

जगाई-मधाई की क्रूरता....

यदि इस स्वार्थपूर्ण संसार में साधु पुरुषों का अस्तित्व न होता, यदि इस पृथ्‍वी को परमार्थी महापुरुष अपनी पद-धूलि से पावन न बनाते, यदि इस संसार में सभी लोग अपने-अपने स्वार्थ की ही बात सोचने वाले होते तो यह पृथ्‍वी रौरव नरक के समान बन जाती। इस दु:खमय जगत को परमार्थी साधुओं ने ही सुखमय बना रखा है, इस निरानन्द जगत को अपने नि:स्वार्थभाव से महात्माओं ने ही आनन्द का स्वरूप बना रखा है। स्वार्थ में चिन्ता है, परमार्थ में उल्लास। स्वार्थ में सदा भय ही बना रहता है, परमार्थ-सेवन से प्रतिदिन अधिकाधिक धैर्य बढ़ता जाता है। स्वार्थ में सने रहने से ही दीनता आती है, परमार्थी निर्भिक और निडर होता है। इतना सब होने पर भी क्रूर पुरुषों का असितत्त्व रहता ही है। यदि अविचारी पाप कर्म करने वाले क्रूर पुरुष न हों तो महात्माओं की दया, सहनशीलता, नम्रता, सहिष्‍णुता, सरलता, परोपकारिता तथा जीवमात्र के प्रति अहैतु की करुणा का प्रकाश किस प्रकार हो? क्रूर पुरुष अपनी क्रूरता करके महापुरुषों को अवसर देते हैं कि वे अपनी सद्वृत्तियों को लोगों के सम्मुख प्रकट करें, जिनका अनुसरण करके दु:खी और चिन्तित पुरुष अपने जीवन को सुखमय और आनन्दमय बना सकें। इसीलिये तो सृष्टि के आदि में ही मधु-कैटभ नाम के दो राक्षस ही पहले-पहल उत्पन्न हुए। उन्हें मारने पर ही तो भगवान मधु-कैटभारि बन सके। रावण न होता तो राम जी के पराक्रम को कौन पहचानता? पूतना न होती तो प्रभु की असीम दयालुता का परिचय कैसे मिलता? शिशुपाल यदि गाली देकर भगवान के हाथ से मरकर मुक्ति-लाभ न करता तो ‘क्रोधोअपि देवस्य वरेण तुल्य:’

इस महामन्त्र का प्रचार कैसे होता? अजामिल-जैसा नीच कर्म करने वाला पापी पुत्र के बहाने ‘नारायण’ नाम लेकर सद्गति प्राप्‍त न करता तो भगवन्नाम की इतनी अधिक महिमा किस प्रकार प्रकट होती? अत: जिस प्र‍कार संसार को महात्मा और सत्पुरुषों की आवश्‍यकता होती है, उसी प्रकार दुष्‍टों की क्रूरता से भी उसका बहुत कुछ काम चलता है। भगवान तो अवसर तब धारण करते हैं जब पृथ्‍वी पर बहुत-से क्रूर कर्म करने वाले पुरुष उत्पन्न हो जाते हैं। क्रूरकर्मा पुरुष अपनी क्रूरता करने में पीछे नहीं हटते और महात्मा अपने परमार्थ और परोपकार के धर्म को नहीं छोड़ते। अन्त में विजय धर्म की ही होती है; क्योंकि ‘यतो धर्मस्ततो जय:।'

महाप्रभु गौरांगदेव की समय में भी नवद्वीप में जगाई-मधाई (जगन्नाथ-माधव) नाम के दो क्रूरकर्मा ब्राह्मण‍कुमार निवास करते थे। ‘राक्षसा: कलिमाश्रित्य जायन्ते ब्रह्मयोनिषु’ अर्थात ‘कलियुग आने पर राक्षस लोग ब्राह्मणों के रूप में पृथ्‍वी पर उत्पन्न हो जायंगे।’ शास्त्र के इस वाक्य का प्रत्यक्ष प्रमाण जगाई-मधाई दोनों भाइयों के जीवन में दृष्टिगोचर होता था। वे उस समय गौडे़श्‍वर की ओर से नदिया के कोतवाल बनाये गये थे। कोतवाल क्या थे, प्रजा का संहार करने वाले एक प्रकार से नवद्वीप के बिना छत्र के बादशा‍ह ही थे। इनसे ऐसा कोई भी दुष्‍कर्म नहीं बचा था, जिसे ये न करते हों। मनुष्‍य के विनाश के जितने लक्षण बताये हैं, वे सब इनके नित्‍य-नैमित्तिक कर्म थे। भगवान ने विनाश के लक्षणों का स्‍वयं वर्णन किया है-

यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु।
धर्मे मयि च विद्वेष: स वा आशु विनश्‍यति।

भगवान कहते हैं- ‘जिस समय मनुष्‍य देवताओं से, वैदिक कर्मों से, गौओं से, ब्राह्मणों से, साधु-महात्‍माओं से, धार्मिक कृत्‍यों से और मुझसे विद्वेष करने लगता है, तो उसका शीघ्र ही नाश हो जाता है।’ इनसे कोई भी बात नहीं बची थी। देवताओं के म‍ंदिर में जाना तो उन्होंने जन्‍म से ही नहीं सीखा था, ब्राह्मण होने पर भी ये वेद का नाम तक नहीं जानते थे। मांस तो इनका नित्‍यप्रति का भोजन ही था, साधु-ब्राह्मणों की अवज्ञा कर देना तो इनके लिये साधारण-सी बात थी। जिसे भी चाहते बाजार में खड़ा करके जूतों से पिटवा देते। किसी का सम्‍मान करना तो ये जानते ही नहीं थे। अच्‍छे-अच्‍छे कर्मकाण्‍डी और विद्वान ब्राह्मण इनके नाम से थर-थर कांपने लगते थे। किसी को इनके सामने तक जाने की हिम्‍मत नहीं होती थी।

धर्म किस चिड़िया का नाम है और वह कहाँ रहती है, इसका तो इन्‍हें पता ही नहीं था। धनिकों के यहाँ डाका डलवा देना, लोगों को कत्‍ल करा देना, पतिव्रताओं के सतीत्‍व को नष्‍ट करा देना, यह तो इनके लिये साधारण-से कार्य थे। न किसी से सीधी बात करना और न किसी के पास बैठना, बस, खूब मदिरा-पान करके उसी के मद में मतवाले हुए ये सदा पापकर्मों में प्रवृत्त रहते थे। ये नगर के क़ाज़ी को खूब धन दे देते, इसलिये वह भी इनके विरुद्ध कुछ नहीं कहता था। वैसे इनका घर तो भगवती भागीरथी के तटपर ही था, किंतु ये घर में नहीं रहते थे। सदा डेरा-तम्‍बू लेकर एक मुहल्‍ले से दूसरे मुहल्‍ले में दौरा करते। अब के इस मुहल्‍ले में इनका डेरा पड़ा है तो अब के उसमे। इसी प्रकार ये मुहल्‍ले-मुहल्‍ले में दस-दस, बीस-बीस दिन रहते।
क्रमशः

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