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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जिस मुहल्‍ले में इनका डेरा पड़ जाता, उस मुहल्‍ले के लोगों के प्राण सूख जाते। कोई भी इनके सामने होकर नहीं निकलता था, सभी आँख बचाकर निकल जाते। इस प्रकार इनके पाप पराकाष्‍ठापर पहुँच गये थे। उस समय ये नवद्वीप में अत्‍याचारों के लिये रावण-कंस की तरह, व‍क्रदंत-शिशुपाल की तरह, नादिरशाह-गजनी की तरह तथा डायर-आडायर की तरह प्रसिद्ध हो चुके थे।एक दिन ये मदिरा के मद में उन्‍मत्त हुए पागलों की भाँति प्रलाप-सा करते हुए लाल-लाल आँखें किये जा रहे थे। रास्‍ते में नित्‍यानंद जी और हरिदास जी ने इन्‍हें देखा। इनकी ऐसी शोचनीय और विचित्र दशा देखकर नवद्वीप में नये ही आये हुए नित्‍यानंद जी लोगों से पूछने लगे- ‘क्‍यों जी! ये लोग कौन हैं और इस प्रकार पागलों की तरह क्‍यों बकते जा रहे हैं? वेषभूषा से तो ये कोई सभ्‍य पुरुष-से जान पड़ते हैं!’

लोगों ने कुछ सूखी हंसी हंसते हुए उत्तर दिया- ‘मालूम पड़ता है अभी आपको इनसे पाला नहीं पड़ा है। तभी ऐसी बातें पूछ रहे हैं। ये यहाँ के साक्षात यमराज हैं। पापियों को भी सम्भवतया यमराज से इतना डर न लगता होगा जितना कि नवद्वीप के नर-नारियों को इन नराधमों से लगता है। इन्होंने जन्म तो ब्राह्मण के घर में लिया है, किंतु वे काम चाण्‍डालों से भी बढ़कर करते हैं। देखना, आप कभी इनके सामने होकर नहीं निकलना। इन्हें साधुओं से बड़ी चिढ़ है। यदि इन्होंने आपलोगों को देख भी लिया तो खैर नहीं है। परदेशी समझकर हमने यह बात आपको समझा दी है।’

लोगों के मुख से ऐसी बात सुनकर नित्यानन्द जी को इनके ऊपर दया आयी। वे सोचने लगे- ‘जो लोग नाम में श्रद्धा रखते हैं और सदा सत्कर्मों को करने की चेष्‍टा करते रहते हैं, यदि ऐसे लोग हमारे कहने से भगवन्नाम का कीर्तन करते हैं, इसमें तो हमारे प्रभु की विशेष बड़ाई नहीं है। प्रंशसा की बात तो यह है कि ऐसे पापी भी पाप छोड़कर भगवन्नाम का आश्रय ग्रहण करके प्रभु की शरण में आ जायं। भगवन्नाम का असली महत्त्‍व तो तभी प्र‍कट होगा। ऐसे लोग ही सबसे अधिक कृपा के पात्र हैं। ऐसे ही लोगों के लिये तो भगवन्नाम-उपदेश की परम आवश्‍यकता है। किसी प्रकार इन लोगों का उद्धार होना चाहिये।’ इस प्रकार नित्यानन्द जी मन-ही-मन विचार करने लगे। जिस प्राणी के लिये महात्माओं के हृदय में शुभकामना उत्पन्न हो जाय, महात्मा जिसके भले के लिये विचारने लगें, समझना चाहिये उसका तो कल्‍याण हो चुका। फिर उसके उद्धार में देरी नहीं हो सकती। महात्माओं की यथार्थ इच्छा अथवा सत्संकल्प होते ही पापी-से-पापी प्राण भी पवन पावन और पुण्‍यवान बन सकता है। जब निताई के हृदय में इन दोनों भाइयों के उद्धार के निमित्त चिन्ता होने लगी, तभी समझना चाहिये, इनके पापों के क्षय होने का समय अत्यन्त ही समीप आ पहुँचा। मानों अब इनका सौभाग्‍य-सूर्य कुछ ही काल में उदय होने वाला हो।नित्यानन्द जी ने अपने मनोगत विचार हरिदास जी पर प्रकट किये। हरिदास जी ने कहा- ‘आप तो बिना सोचे ही बर्रों के छत्ते में हाथ डालना चाहते हैं। अभी सुना नहीं, लोगों ने क्या कहा था?’
नित्यानन्द जी ने कुछ गम्भीरता के साथ कहा- ‘सुना तो सब कुछ, किंतु इतने से ही हमें डर जाना तो न चाहिये। हमें तो भगवन्नाम का प्रचार करना है।’ हरिदास जी ने कहा- ‘मैं यह कब कहता हूँ कि भगवन्नाम का प्रचार बंद कर दीजिये? चलिये, जैसे कर रहे हैं दूसरी ओर चलकर नाम का प्रचार करें। इन सोते सिंहों को जगाने से क्या लाभ?’

नित्यानन्द जी ने कहा- ‘आपकी बात तो ठीक है, किंतु प्रभु की तो आज्ञा है कि भगवन्नाम-वितरण में पात्रापात्र का ध्‍यान मत रखना, सभी को समानभाव से उपदेश करना। पापी हो या पुण्‍यात्मा, भगवन्नाम ग्रहण करने के तो सभी अधिकारी हैं। इसलिये इन्हें भगवन्नाम का उपदेश क्यों न किया जावे?’

हरिदास जी ने कुछ नम्रता के स्वर में कहा- ‘यह तो ठीक है। आपके सामने जो भी पड़े उसे ही भगवन्नाम का उपदेश करो, किंतु इन्हीं को विशेष-रूप से उद्देश्‍य करके इनके पास चलना ठीक नहीं। इन्हीं के पास हठपूर्वक क्यों चला जाय? भगवन्नाम का उपदेश करने के लिये और भी बहुत-से मनुष्‍य पड़े हैं। उन्हें चलकर उपदेश कीजिये‘

नित्यानन्द जी ने कुछ दृढ़ता के साथ कहा- ‘देखिये, जो अधिक बीमार होता है, जिसे अन्य रोगियों की अपेक्षा ओषधि की अधिक आवश्‍यकता होती है, बुद्धिमान वैद्य सबसे पहले उसी रोगी की चिकित्सा करता है और उसे ओषधि देकर तब दूसरे रोगी की नाड़ी देखता है। अन्य लोगों की अपेक्षा भगवन्नाम की इन्हीं लोगों को अधिक आवश्‍यकता है। इनके इतने क्रूर कर्मों का भगवन्नाम से ही प्रायश्चित्त हो स‍कता है। इनकी निष्‍कृतिका दूसरा कोई मार्ग है ही नहीं। क्यों ठीक है न? आप मेरी बात से सहमत हैं न?’ हरिदास जी ने कहा- ‘जैसी आपकी इच्छा, यदि आप इन्हें ही सबसे अधिक भगवन्नाम का अधिकारी समझते हैं तो इसमें कोई आपत्ति नहीं। मैं भी आपके साथ चलने को तैयार हूँ।’ यह कहकर हरिदास जी-

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। 
हरे कृष्‍ण हरे कृष्‍ण कृष्ण कृष्‍ण हरे हरे।

इस महामन्त्र का अपने सुमधुर कण्‍ठ से गान करते हुए जगाई-मधाई के डेरे की ओर चले। इन दोनों को बादशाह की ओर से थोड़ी-सी फौज भी मिली हुई थी। उसे ये सदा साथ रखते थे। ये दोनों संन्यासी निर्भीक होकर भगवन्नाम का गान करते हुए इनके निवास-स्थान के समीप पहुँचे।दैवयोग से ये दोनों भाई सामने ही सुरा के मद में चूर हुए पलंगो पर बैठे थे। इन दोनों को अपने सामने गायन करते देखकर इन‍की ओर लाल-लाल आँखों से देखते हुए वे लोग बोले- ‘तुम लोग कौन हो और क्या चाहते हो?’

नित्यानन्द जी ने बड़े मधुर स्वर में कहा-

‘कृष्‍ण कहो, कृष्‍ण भजो, लेहु कृष्‍ण नाम। 
कृष्‍ण माता, कृष्‍ण पिता, कृष्‍ण धन प्राण।

इसके अनन्तर वे कहने लगे- ‘हम भिक्षुक हैं, आपसे भिक्षा मांगने आये हैं, आप अपने मुख से-

श्रीकृष्‍ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव।।

-भगवान के इन मधुर नामों का उच्चारण करें, यही हम लोगों की भिक्षा है।' इतना सुनते ही ये दोनों भाई मारे क्रोध के लाल हो गये
क्रमशः

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