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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जल्दी से उठकर वे इनकी ओर झपटे। झपटते हुए उन्होंने कहा- ‘कोई है नहीं, इन दोनों बदमाशों को पकड़ तो लो।' बस, इतना सुनना था कि नित्यानन्द जी ने वहाँ से दौड़ लगायी। हरिदास जी भी हांफते हुए उनके पीछे दौड़ने लगे, किंतु शरीर से स्थूल और अधिक अवस्था होने के कारण वे दुबले-पतले चंचल युवक निताई के साथ कैसे दौड़ सकते थे? नित्यानन्द जी ने उनकी बाँह को कसकर पकड़ लिया और उन्हें घसीटते हुए दौड़ने लगे। हरिदास जी किढरते हुए नित्यानन्द जी के साथ जा रहे थे। जगाई-मधाई के नौकर कुछ दूर तो इन्हें पकड़ने के लिये दौडे़, फिर वे यह सोचकर लौट गये कि ये तो नशे में ऐसे बकते ही रहते हैं, हम इन साधुओं को पकड़कर क्या पावेंगे? उन्होंने इन दोनों का बहुत दूर तक पीछा नहीं किया।

हरिदास जी हाँफ रहे थे, वे बार-बार पीछे देखते जाते थे। अन्त में वे बहुत ही अधिक थक गये। झुंझलाकर नित्यानन्द जी से बोले- ‘अजी, अब तो छोड़ दो, दम तो निकला जाता है, क्या प्राण लेकर ही छोड़ोगे? आपने तो मेरी कलाई इतनी कसकर पकड़ ली है कि दर्द के मारे मरा जाता हुँ। अब तो कोई पीछे भी नहीं आ रहा है।'
नित्यानन्द जी ने भागते-भागते कहा- ‘थोड़ी-सी हिम्मत और करो। बस, इस अगले तालाब तक की ही तो बात है।'

हरिदास जी ने कुछ क्षोभ के साथ कहा- ‘भाड़ में गया आपका तालाब! यहाँ तो प्राणों पर बीत रही है, आपको तालाब सूझ रहा है। छोड़ो मेरा हाथ!’ यह कहकर बूढ़े हरिदास जी ने जोर से एक झटका दिया; किंतु भला निताई से वे बांह कैसे छुड़ा सकते थे? तब तो नित्यानन्द जी हंसकर खडे़ हो गये। हरिदास जी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। जोरों से सांस लेते हुए कहने लगे- ‘रहने भी दीजिये, आप तो सदा चंचलता ही करते रहते हैं। मैंने पहले ही मना किया था। आप माने ही नहीं। एक तो जिद्द करके वहाँ गये और दूसरे मुझे खींच-खींचकर अधमरा कर दिया।'  
हंसते हुए नित्यानन्दजी ने कहा- ‘आपकी ही सम्मति से तो हम गये थे। यदि आप सम्मति ने देते तो हम क्यों जाते? आप ही तो हम दोनों में बुजुर्ग हैं।'

हरिदास जी ने कुछ रोष में आकर कहा- ‘बुजुर्ग हैं पत्‍थर! मेरी सम्मति से गये थे तो वहाँ से भाग क्यों आये? तब मेरी सम्मति क्यों नहीं ली?’

जोरों से हंसते हुए नित्यानन्द जी ने कहा- ‘यदि उस समय आपकी सम्मति की प्रतीक्षा करता, तो सब मामला साफ ही हो जाता।' इस प्रकार आपस में एक-दूसरे को प्रेम के साथ ताने देते हुए ये दोनों प्रभु के निकट पहूंचे। उस समय प्रभु भक्तों के साथ बैठे श्रीकृष्‍ण-‍कथा कह रहे थे। इन दोनों प्रचारक तपस्वियों को देखकर वे प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘लो, भाई! युगल-जोड़ी आ गयी। प्रचारक-मण्‍डल के मुखिया आ गये। अब आप लोग इनके मुख से नगर-प्रचार का वृत्तान्त सुनिये।‘

प्रभु के ऐसा कहने पर हरिदास जी ने कहा- ‘प्रभो! श्रीपाद नित्यानन्द जी बड़ी चंचलता करते हैं, इन्हें आप समझा दीजिये कि थोड़ी कम चंचलता किया करें।'

प्रभु ने पूछा- ‘क्यों-क्यों? बात क्या है, क्‍या हुआ? आज कोई नयी चंचलता कर डाली क्‍या? हाँ, आज आपलोग दोनों ही बहुत थके हुए-से मालूम पड़ते हैं। सब सुनाइये।‘

प्रभु के पूछने पर हरिदास जी ने सब वृत्तांत सुनाते हुए कहा- ‘लोगों ने बार-बार उन दोनों भाइयों के पास जाने से मना किया था, किंतु ये माने ही नहीं। जब उन्‍होंने डांट लगायी, तब वहाँ से बालकों की भाँति भाग छूटे। लोग कह रहे थे, अब की‍र्तन वालों की खैर नहीं। ये राक्षस-भाई कीर्तन वालों को बंधवा मंगावेंगे। लोग परस्‍पर में ऐसी ही बातें कह रहे थे।‘
हरिदास जी की बात सुनकर हंसते हुए प्रभु ने नित्‍यानंद जी से कहा- ‘श्रीपाद! उन लोगों के समीप जाने की आपको क्‍या आवश्‍यकता थी? थोड़ी कम चंचलता किया कीजिये। ऐसा चांचल्‍य किस काम का?’

कुछ बनावटी प्रेम-कोप प्रदर्शित करते हुए नित्‍यानंद जी ने कहा- ‘इस प्रकार मुझसे आपका यह काम नहीं होने का। आप तो घर में बैठे रहते हैं, आपको नगर-प्रचार की कठिनाइयों का क्‍या पता? एक बार तो कहते हैं सभी को नाम का प्रचार करो। ब्राह्मण से चाण्‍डालपर्यंन्‍त और पापी से लेकर पुण्‍यात्‍मा तक सभी भगवन्‍नाम के अधिकारी हैं और अब कहते हैं, उनके पास क्‍यों गये? सबसे बड़े अधिकारी तो वही हैं। हम तो जन्‍म से ही घर-बार छोड़कर टुकड़े मांगते फिरते हैं, हमारा उद्धार करने में आपकी कौन-सी बड़ाई है? आपका पतित पावन नाम तो तभी सार्थक हो सकता है, जब ऐसे-ऐसे भयंकार क्रूर कर्म करने वाले पापियों का उद्धार करें। अब यों घर में बैठे रहने से काम न चलेगा। ऐसे घोर पापियों को जब तक हरि-नाम की शरण में लाकर भक्त न बनावेंगे, तब तक लोग हरि-नाम का महत्त्व ही कैसे समझ सकेंगे।'

कुछ हंसते हुए प्रभु भक्तों से कहने लगे- ‘श्रीपाद जिनके उद्धार की इतनी भारी चिंता है, वे महाभागवत पुरुष कौन हैं?’

पास ही में बैठे हुए श्रीवास और गंगादास भक्तों ने कहा- ‘प्रभो! वे महाभागवत नहीं है, वे तो ब्राह्मण-कुल-कण्‍टक अत्‍यंत क्रूर प्रकृति के राक्षस हैं। सम्‍पूर्ण नगर में उनका आतंक छाया हुआ है।' यह कहकर उन लोगों ने जगाई-मधाई की बहुत-सी क्रूरताओं का वर्णन किया।

प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘अब वे कितने दिनों तक क्रूरता कर सकते हैं? श्रीपाद के जिन्‍हें दर्शन हो चुके और इनके मन में जिनके उद्धार का विचार आ चुका, वे क्‍या फिर पापी ही बने रह सकते हैं? श्रीपाद जिसे चाहें उसे भक्त बना सकते हैं, फिर चाहे वह कितना भी बड़ा पापी क्‍यों न हो।'   इस प्रकार निताई ने संकेत से ही प्रभु के समीप जगाई-मधाई के उद्धार की प्रार्थना कर दी और प्रभु ने भी संकेत द्वारा ही उन्‍हें उन दोनों भाइयों के उद्धार का आश्‍वासन दिला दिया। सचमुच महात्‍माओं के हृदयों में दूसरों के प्रति स्‍वाभाविक ही दया उत्‍पन्‍न हो जाती है। उनके समीप आकर कोई दया की प्रार्थना करे तभी वे दया करें यह बात नहीं है।
क्रमशः

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