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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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निताई के ऐसी प्रार्थना करने पर भी प्रभु का क्रोध शांत नहीं हुआ। इधर प्रभु को क्रुद्ध देखकर सभी भक्त विस्मित-से हो गये। सभी आश्चर्य के साथ प्रभु के कुपित मुख की ओर संभ्रमभाव से देखने लगे। सभी को प्रतीत होने लगा कि आज संसार में महाप्रलय हो जायगा। सम्पूर्ण संसार प्रभु के प्रकोप से भस्मीभूत हो जायगा। प्रभु की ऐसी दशा देखकर कुछ भक्त अपने-आपको न रोक सके। मुरारी गुप्त आदि वीर भक्त महावीर के आवेश में आकर उन दोनों पापी भाइयों के संहार के निमित्त स्वयं उद्यत हो गये। उस समय भक्तों के हृदयों में एक प्रकार की भारी खलबली-सी मची हुई थी। उत्तेजित भक्त मण्डली को देखकर जगाई-मधाई के सभी सेवक डर के कारण थर-थर कांपने लगे। हजारों नर-नारी घटनास्थल पर आ-आकर एकत्रित हो गये। सम्पूर्ण नगर में एक प्रकार का कोलाहल-सा मच गया। नित्यानंद जी उत्तेजित हुए मुरारी गुप्त आदि भक्तों के पैरों में गिर-गिरकर उनसे शांत होने के लिये कह रहे थे। प्रभु से भी वे बार-बार शांत होने की प्रार्थना कर रहे थे। वे दोनों भाई डरे हुए-से चुपचाप खड़े थे। उन्हें कुछ सूझता ही नहीं था कि अब क्या करना चाहिये। इतने ही में उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो आकाश में से सुदर्शन चक्र उनके संहार के निमित्त उतर रहा है।सुदर्शन चक्र के दर्शन से वे बहुत ही अधिक भयभीत हुए और डर के कारण थर-थर कांपने लगे। नित्यानंद जी ने इनकी मनोगत अवस्था को समझकर चक्र से आकाश में ही रुके रहने की प्रार्थना की और दीनभाव से पुन: प्रभु से प्रार्थना करने लगे-‘प्रभो! यदि आप ही इस युग में पापियों को दण्ड देंगे, तो फिर पापियों का उद्धार कहाँ हुआ? यह तो संहार ही हुआ। हरिदास जी को आपने आश्वासन दिया था कि हम पतितों का संहार न करके उद्धार करेंगे। समाने खड़े हुए इन दोनों पतित पातकियों का उद्धार करके आप अपने पतितपावन नाम को सार्थक क्यों नही करते? फिर दण्ड ही देना है, तो एक मधाई को ही दीजिये। जगाई ने तो आपका कोई अपराध नहीं किया। इसने तो उल्टे मधाई को प्रहार करने से निवारण किया है। दूसरी बार प्रहार करने से जगाई ने ही मधाई को रोका है। प्रभो! जगाई तो मेरी रक्षा करने वाला है, वह तो सर्वथा निर्दोष है।’
‘जगाई ने श्रीपाद की रक्षा की है, उन्हें मधाई के द्वितीय प्रहार से बचाया है’ इस बात को सुनते ही प्रभु की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। उनका सम्पूर्ण शरीर पुलकित हो उठा। प्रेम के कारण जगाई को प्रभु ने गले से लगा लिया और वे गद्गदकण्ठ से कहने लगे- ‘तुमने मेरे भाई को बचाया है, तुम मेरे भाई के रक्षक हो। तुमसे बढ़कर मेरा प्यारा और कौन हो सकता है? आओ, मेरे गले लगकर मेरे अनुजतप्त हृदय को शीतलता प्रदान करो।' प्रभु का प्रेमालिंगन पाते ही जगाई मूर्च्छित हो गया, वह अचेत होकर प्रभु के चरणों में लोटने लगा। आज उस भाग्यवान ब्राह्मणबंधु का जन्म सफल हो गया। उसके सभी पाप क्षय हो गये। उसके हृदय में पाप-पुंजों का समूह जमे हुए हिम के समान प्रेमरूपी अग्नि की आंच पाने से पिघल-पिघलकर आँखों के द्वारा बहने लगा। प्रभु के चरणों में पड़ा हुआ जगाई जोरों के साथ फूट-फूटकर रोने लगा।
अपने भाई को इस प्रकार प्रेम में अधीर होकर रुदन करते देखकर मधाई के हृदय में भी पश्चात्ताप की ज्वाला जलने लगी। उसे भी अपने कुकृत्य पर लज्जा आने लगी। अब वह अधिक कालतक स्थिर न रह सका। आँखों में आंसू भरकर गद्गदकण्ठ से उसने कहा- ‘प्रभो! हम दोनों ही भाइयों ने मिलकर समानरूप से पाप किये है। हम दोनों ही लोकनिन्दित पात की हैं। आपने एक भाई को ही अपने चरणों की शरण प्रदान की है।नाथ! हम दोनों को ही अपनाइये, हम दोनों की ही रक्षा कीजिये।' यह कहते-कहते मधाई भी प्रभु के चरणों में लौटने लगा। अश्रुओं के वेग से वहाँ की सब धूलि कीचड़ बन गयी थी, वह कीचड़ दोनों भाइयों के अंगों में लिपटा हुआ था। सम्पूर्ण शरीर धूलि और कीच में सना हुआ था। नदिया के बिना तिलक के राजाओं को इस प्रकार धूलि में लोटते देखकर सभी नर-नारी अवाक रह गये। सभी लोग उन पापियों के पापों को भुलाकर उनके ऊपर दया के भाव प्रदार्शित करने लगे। अहा! नम्रता में कितना भारी आकर्षण होता है!
मधाई के ऊपर से प्रभु का रोष अभी भी नहीं गया था। उन्होंने गम्भीर स्वर में कहा- ‘मधाई! मैं तुम्हें क्षमा नहीं कर सकता। मैं अपने अपराध करने वाले के प्रति तो कभी क्रोध नहीं करता, किंतु तुमने श्रीपाद नित्यानंद जी का अपराध किया है, यदि वे तुम्हें क्षमा कर दे, तब तो तुम मेरे प्रिय हो सकते हो। जब तक वे तुम्हें क्षमा नहीं करते, तब तक तुम मेरे सामने दोषी ही हो। जाओ, नित्यानंद जी की शरण लो।'
प्रभु की ऐसी आज्ञा सुनकर मधाई अस्त-व्यस्तभाव से प्रभु के चरणों को छोड़कर नित्यानंद जी के चरणों में जाकर गिर गया और फूट-फूटकर रोने लगा। उसे अपने कुकृत्य पर बड़ी भारी लज्जा आ रही थी। उसी की ग्लानि के कारण वह अधीर होकर दहाड़ मारकर रो रहा था। उसके रुदन की ध्वनि को सुनकर पत्थर भी पसीज उठता था। चारों दिशाओंमें सन्नाटा छा गया, मानों मधाई के रुदन से द्रवीभूत होकर सभी दिशाएं रो रही हों, सभी लोग उन पापियों की ऐसी दशा देखकर अपने आपे को भूल गये। उन्हें उस क्षण कुछ पता ही नहीं चला कि हम स्वर्ग में हैं या मर्त्यलोक में। सभी गौरांग के प्रेम-प्रवाह के वशवर्ती होकर उस अभूतपूर्व दृश्य को देख रहे थे।
मधाई को नित्यानंद जी के पैरों के नीचे पड़ा देखकर नित्यानंद जी से प्रभु कहने लगे- ‘श्रीपाद! इस मधाई ने आपका अपराध किया है, आप ही इसे क्षमा कर सकते हैं, मुझमें इतनी क्षमता नहीं कि मैं आपका अपराध करने वाले को अभय प्रदान कर सकूँ। बोलो क्या कहते हो?’
अत्यंत ही दीन-भाव से नित्यानंद जी ने कहा- ‘प्रभो! यह तो आपकी सदा से ही रीति रही आयी है। आप अपने सेवकों के सिर सदा से सुयश का सेहरा बांधते आये हैं।
क्रमशः
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