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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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धन, जन, सेना तथा अधिकार सभी के मद में वे अपने को ही कर्ता समझे बैठे थे, इसलिये प्रभु भी इनसे दूर ही रहे आते थे। जिस क्षण ये अपने सभी प्रकार के अधिकार और बलों को भुलाकर निर्बल और निष्किंचन बन गये उसी समय प्रभु ने इन्‍हें अपनी शरण में ले लिया। उस क्षणभर के ही उपशम से वे उम्रभर के पुराने पापी सभी वैष्‍णवों के कृपाभाजन बन गये। प्रपन्‍नता और शरणागति में ऐसा ही जादू है। जिस क्षण ‘तेरा हूँ’ कहकर सच्‍चे दिल से उनसे प्रार्थना करो उसी क्षण वे अपना लेते हैं, वे तो भक्तों के लिये भूखे-से बैठे रहते हैं। लोगों के मुख की ओर ताकते रहते हैं कि कोई अब कहे कि ‘मैं तुम्‍हारा हूँ’, यहाँ तक कि अजामिलने झूठे ही पुत्र के बहाने ‘नारायण’ शब्‍द कह दिया। बस, इतने से ही उसकी रक्षा की और उसके जन्‍मभर के पाप क्षमा कर दिये।भक्‍तगण जगाई-मधाई दोनों भाइयों को साथ लेकर प्रभु के यहाँ आये। सभी भक्त यथास्‍थान बैठ गये। एक उच्‍चासर पर प्रभु विराजमान हुए। उनकें दायें-बायें गदाधर और नित्‍यानंद जी बैठे। सामने वृद्धआचार्य अद्वैत विराजमान थे। इनके अतिरिक्‍त पुण्‍डरीक, विद्यानिधि, हरिदास, गरुड़, रमाई पण्डित, श्रीनिवास, गंगाधर, वक्रेश्‍वर, चन्‍द्रशेखर आदि अनेकों भक्त प्रभु के चारों ओर बैठे हुए थे। बीच में ये दोनों भाई-जगाई और मधाई नीचा सिर किये आँखों में से अश्रु बहा रहे थे। इनके अंग-प्रत्‍यंग से विषण्‍णता और पश्‍चात्ताप की जवाला-सी निकलती हुई दिखायी दे रही थी। दोनों का शरीर पुलकित हो रहा था। दोनों ही नित्‍यानंद और प्रभु की भारी कृपा के बोझ से दबे-से जा रहे थे। उन्‍हें अपने शरीर का होश नहीं था। प्रभु ने उन्‍हें इस प्रकार विषादयुक्‍त देखकर उनसे कहा- ‘भाइयो! तुम पर श्रीपाद नित्‍यानंद जी ने कृपा कर दी, अब तुम लोग शोक-मोह छोड़ दो, अब तुम निष्‍पाप बन गये। भगवान ने तुम्‍हारे ऊपर बड़ी कृपा की है।'

प्रभु की बात सुनकर गद्गदकण्‍ठ से रोते हुए दोनों भाई बोले- ‘प्रभो! हम पापियों का उद्धार करके आज आपने अपने ‘पतिपावन’ नामको यथार्थ में ही सार्थक कर दिया। आपका पतितपावन नाम तो आज ही सार्थक हुआ। अजामिल को तारने में आपकी कोई प्रशंसा नहीं थी; क्‍योंकि उसने सब पापों को क्षय करने वाला चार अक्षरों का ‘नारायण’ नाम तो लिया था। गणिका सूआ पढ़ाते-पढ़ाते ही राम-नाम का उच्चारण करती थी, कैसे भी सही, भगवन्नाम का उच्चारण तो उसकी जिह्वा से होता था। वाल्मीकि जी ने सहस्रों वर्षों तक उलटा ही सही, नाम-जप तो किया था। खेत में उलटा-सीधा कैसे भी बीज पड़ना चाहिये, वह जम अवश्‍य आवेगा। दन्‍तवक्र, शिशुपाल, रावण, कुम्‍भकर्ण, शकटासुर, शम्‍बरासुर, अघासुर, बकासुर, कंस आदि सभी असुर और राक्षसों ने द्वेषबुद्धि से ही सही, आपके रूप का चिंतन तो किया था। वे उठते-बैठते, सोते-जागते सदा आपका ध्‍यान तो करते रहते थे। इन सबकी मुक्ति तो होनी ही चाहिये, ये लोग तो भगवत-संबंधी होने के कारण मुक्ति के अधिकारी ही थे, किंतु हे दीनानाथ! हे अशरण-शरण! हे पतितों के एकमात्र आधार! हे कृपा के सागर! हे पापियों के पतवार! हे अनाथरक्षक! हम पापियों ने तो कभी भूल से भी आपका नाम ग्रहण नहीं किया था। हम तो सदा मदोन्‍मत्त हुए पापकर्मों में ही प्रवृत्‍त रहते थे। हमें तो आपके संबंध में कुछ ज्ञान भी नहीं था। हमारे ऊपर कृपा करके आपने संसार को प्रत्‍यक्ष ही यह दिखला दिया कि चाहे कोई भजन करे या न करे, कोई कितना ही बड़ा पापी क्‍यों न हो, प्रभु उसके ऊपर भी एक-न-एक दिन अवश्‍य ही कृपा करेंगे। हे प्रभों! हमें अपने पापों का फल भोगने दीजिये। हमें अरबों-खरबों और असंख्‍यों वर्षों तक नरकों की भयंकर यातनाओं को भोगने दीजिये। प्रभों! हम आपकी इस अहैतु की कृपा को सहन न कर सकेंगे। नाथ! हमारा हृदय विदीर्ण हुआ जा रहा है। हम प्रभु के इतने बड़े कृपापात्र बनने के योग्‍य कोटि जन्‍मों में भी न बन सकेंगे, जितनी कृपा प्रभु हमारे ऊपर प्रदर्शित कर रहे हैं।'
कल तक जो मद्यपान के अतिरिक्‍त कुद जानते-समझते ही नहीं थे, उन्‍हीं के मुख से ऐसी अपूर्व स्‍तुति सुनकर सभी भक्‍त चकित रह गये। वे एक-दूसरे की ओर देखकर आश्‍चर्य प्रकट करने लगे। अद्वैताचार्य ने उसी समय इस श्‍लोक को पढ़कर प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया-

मूकं करोति वाचालं पंगुं लड़्धयते गिरिम्।
यत्‍कृपा तमहं वन्‍दे परमानन्‍दमाधवम्।

जगाई-मधाई की ऐसी स्‍तुति सुनकर प्रभु ने उनसे कहा-‘तुम दोनों भाई सभी भक्तों की चरण-वंदना करो। भक्‍तों की पद-धूलि से पापी-से-पापी पुरुष भी परम पावन और पुण्‍यात्‍मा बन सकता है। प्रभु की आज्ञा पाकर दोनों भाई अपने अश्रुओं से भक्‍तों के चरणों को भिगोते हुए उनकी चरण-वंदना करने लगे। सभी भक्‍तों ने उन्‍हें हृदय से परम होने का सर्वोत्त्म आशीर्वाद दिया।

अब महाप्रभु ने उनकी शांति के लिये दूसरा उपाय सोचा। भगवती भागीरथी सभी के पापों को जड़-मूल से उखाड़कर फेंक देनेवाली हैं, अत: आपने भक्‍तों से जाह्नवी के तटपर चलने के लिये कहा। चांदनी रात्रि थी, गर्मी के दिन थे, लोग कुछ तो सो गये थे, कुछ सोने की तैयारी कर रहे थे। उसी समय सभी भक्‍त दोनों भाइयों को आगे करके संकीर्तन करते हुए और प्रेम से नाचते-गाते गंगा-स्‍नान के निमित्त चले। संकीर्तन और जय-जयकारों की तुमुल ध्‍वनि सुनकर सहस्‍त्रों नर-नारी गंगा जी के घाटपर एकत्रित हो गये। बहुत-से तो खाट पर से वैसे ही बिना वस्‍त्र पहने उठकर चले आये, कोई भोजन करते-से ही दौड़े आये।

पत्‍नी पतियों को छोड़ करके, माता पुत्रों का परित्‍याग करके तथा बहुएं अपनी सास-ननदों की कुछ भी परवा न करके संकीर्तन देखने की निमित्त दौड़ी आयी। सभी आ-आकर भक्‍तों के साथ संकीर्तन करने में निमग्‍न हो गये। सभी एक प्रकार के अपूर्व आकर्षण के वशीभूत होकर अपने आपको भूल गये। महाप्रभु ने संकीर्तन बंद करने की आज्ञा दी और इन दोनों भाइयों को साथ लेकर वे स्‍वयं जल में घुसे। उनके साथ नित्‍यानंद, अद्वैताचार्य, श्रीवास तथा गदाधर आदि सभी भक्‍तों ने भी जल में प्रवेश किया। जल में पहुँचकर प्रभु ने दोनों भाइयों से कहा- ‘जगन्‍नाथ (जगाई) और माघव (मधाई)! तुम दोनों अपने-अपने हाथों में जल लो।' 
क्रमशः

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