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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु ने इन्हें भाँति-भाँति से आश्‍वासन दिलाया। जगाई तो प्रभु के आश्‍वासन से थोड़ा-बहुत शान्त भी हुआ, किंतु मधाई का पश्‍चात्ताप कम न हुआ। उसे रह-रहकर वह घटना याद आने लगी, जब उसने निरपराध नित्यानन्द जी के मस्तक पर निर्दयता के साथ प्रहार किया था। इसके स्मरण मात्र से उसके रोंगटे खडे़ हो जाते और वह जोरों के साथ रुदन करने लगते। ‘हाय! मैंने कितनी बड़ी निचता की थी। ए‍क महापुरुष को अ‍कारण ही इतना भारी कष्‍ट पहुँचाया। यदि उस समय भगवान का सुदर्शनचक्र आकर मेरा सिर काट लेता या नित्यानन्द जी ही मेरा वध कर डालते तो मैं कृतकृत्य हो जाता। वध करना या कटुवाक्‍य कहना तो अलग रहा, वे महामहिम अवधूत तो उलटे मेरे कल्‍याण के निमित्त प्रभु से प्रार्थना ही करते रहे और प्रसन्नचित्त से भगवन्नाम का कीर्तन करते हुए हमारा भला ही चाहते रहे। इस प्रकार वह सदा इसी सोच में रहता।

एक दिन एकान्त में मधाई ने जाकर श्रीपाद नित्यानन्द जी ने चरण पकड़ लिये और रोते-रोते प्रार्थना की- ‘प्रभो! मैं अत्यन्त ही नीच और पामर हूँ। मैंने घोर पाप किये हैं। उन सब पापों को तो भुला भी सकता हूँ। किंतु आपके ऊपर जो प्रहार किया था, वह तो भूलाने से भी नहीं भूलता। जितना ही उसे भुलाने की चेष्‍टा करता हूं, उतना ही वह मेरे हृदय में और अधिक भीतर गड़ता जाता है। इसकी निष्‍कृतिका का मुझे कोई उपाय बताइये। जब तक आप इसके लिये मुझे कोई उपाय न बतावेंगे, तब तक मुझे आन्तरिक शान्ति कभी भी प्राप्त न हो सकेगी।'
मधाई की बात सुनकर नित्यानन्द जी ने कहा- ‘भाई! मैं तुमसे सत्य-सत्य कहता हूं, मेरे मन में तुम्हारें प्रति लेशमात्र भी किसी प्रकार का दुर्भाव नहीं। मैंने तो तुम्हारे ऊपर उस समय भी क्रोध नहीं किया था। यदि तुम्हारे हृदय में दु:ख है तो इसके लिये तप करो। तप से ही सब प्रकार के संताप नष्‍ट हो जाते हैं और तप से ही दु:ख, भय, शोक तथा मन:क्षोभ आदि सभी विकार दूर हो जाते हैं। तपस्वी भक्‍त ही यथार्थ में भगवन्नाम का अधिकारी होता है। तुम गंगा जी का एक सुन्दर घाट बनवा दो, जिस पर सभी नर-नारी स्नान किया करें और तुम्हें शुभाशीर्वाद दिया करें। तुम वहीं रहकर अमानी तथा नम्र बनकर तप करते हुए निवास करो।‘

नित्यानन्द प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके मधाई ने स्वयं अपने हाथों से परिश्रम करके गंगा जी का एक सुन्दर घाट बनाया। उसी पर एक कुटी बनाकर वह रहने लगा। वहाँ घाट पर स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध, मूर्ख-‍पण्ड़ित, चाण्‍डाल-पतित जो भी स्नान करने आता, मधाई उसी के चरण पकड़कर अपने अपराधों के लिये क्षमा-याचना करता। वह रोते-रोते कहता- ‘हमने जानमें, अनजान में आपका कोई भी अपराध किया हो, हमारे द्वारा आपको कभी भी कैसा भी कष्‍ट हुआ हो, उसके लिये हम आपके चरणों में नम्र होकर क्षमा-याचना करते हैं।’ सभी उसकी इस नम्रता को देखकर रोने लगते और उसे गले से लगाकर भाँति-भाँति के आशीर्वाद देते।

शास्त्रों में बताया है, जिसे अपने पापों पर हृदय से पश्‍चात्ताप होता है, उसके चौथाई पाप तो पश्‍चात्ताप करते ही नष्‍ट हो जाते हैं। यदि आप‍के पापकर्मों को लोगों के सामने खूब प्रकट कर दे तो आधे पाप प्रकाशित करने से नष्‍ट हो जाते हैं और जो पापियों के पापों को अपने मन की प्रसन्नता के लिये कथन करते हैं, चौथाई पाप उनके ऊपर चले जाते हैं। इस प्रकार पाप करने वाला पश्‍चात्ताप से तथा लोगों के सामने अमानी बनकर सत्यता के साथ पाप प्रकट करने से निष्‍पाप बन जाता है।इस प्रकार मधाई में दीनता और महापुरुषों की अहैतु की कृपा से भगवद्भक्‍तों के सभी गुण आ गये। भगवद्भक्‍त शीत, उष्‍ण आदि द्वन्द्वों को सहन करने वाले, सभी प्राणियों के ऊपर करुणा के भाव रखने वाले, सभी जीवों के सुहृद्, किसी से शत्रुता न करने वाले, शान्त तथा सत्कर्मों का सदा करते रहने वाले होते हैं।वे विषय-भोगों की इच्छा भूलकर भी कभी नहीं करते। उनमें सभी गुण आप-से-आप ही आ जाते हैं। क्यों न आवें, भगवद्भक्ति का प्रभाव ही ऐसा है। हृदय में भगवद्भक्ति का संचार होते ही सम्पूर्ण सद्गुण आप-से-आप ही भगवद्भक्‍त के पास आने लगते हैं। जैसा कि श्रीमद्भागवत में कहा है-

यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिंचना 
सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुरा:।
हरावभक्‍तस्य कुतो महद्गुणा
मनोरथेनासति धावतो बहि:।

इस प्रकार थोडे़ ही दिनों में मधाई की भगवद्भक्ति की दूर-दूर तक ख्‍याति हो गयी। लोग उसके पुराने पापों को ही नहीं भूल गये, किंतु उसके पुराने मधाई नाम का भी लोगों को स्मरण नहीं रहा। मधाई अब ‘ब्रह्मचारी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये। अहा! भगवद्भक्ति मे कितनी भारी अमरता है? भगवन्नाम पापों की क्षय करने की कैसी अचूक ओषधि है? इस रसायन के पान करने से पापी-से-पापी भी पुण्‍यात्मा बन सकता है। नवद्वीप में ‘मधाईघाट’ आजतक भी उस महामहिम परम भागवत मधाई के नाम को अमर बनाता हुआ भगवान के इस आश्‍वासन-वाक्‍य का उच्च स्वर से निर्घोष कर रहा है-

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:।

चाहे कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, उसने चाहे सभी पापों का अन्त ही क्यों न कर डाला हो, वह भी यदि अनन्‍य होकर-और सभी आश्रय छोड़कर एकमात्र मेरे में ही मन लगाकर मेरा ही स्‍मरण-ध्‍यान करता है तो उसे सर्वश्रेष्‍ठ साधु ही समझना चाहिये। क्‍योंकि उसकी भलीभाँति मुझमें ही स्थिति हो चुकी है।

सज्‍जन-भाव…

महाप्रभु गौरांग देव में भगवत-भाव की भावना तो उनके कतिपय अंतरंग भक्‍त ही रखते थे, किंतु उन्‍हें परम भागवत वैष्‍णव विद्वान और गुणवान सज्‍जन पुरुष तो सभी लोग समझते थे। उनके सद्गुणों के सभी प्रशंसक थे। जिन लोगों का अकारण ईर्ष्‍या करना ही स्‍वभाव होता है, ऐसे खल पुरुष तो ब्रह्मा जी की भी बुराई करने से नहीं चूकते। ऐसे मलिन-प्रकृति के निंदक खलों को छोड़कर अन्‍य प्रकार के लोग प्रभु के उत्तम गुणों के ही कारण उन पर आसक्‍त थे। उन्‍होंने अपने जीवने में किसी भी शास्‍त्र–मर्यादा का उल्‍लंघन नहीं किया। सर्वसमर्थ होने पर भी वे सभी लौकिक तथा वैदिक क्रियाओं को स्‍वयं करते थे और लोगों को भी उनके लिये प्रोत्‍साहित करते थे।
क्रमशः

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