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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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वे कलिकाल में श्रीभगवन्‍नाम को ही मुख्‍य समझते थे और सभी कर्मों को गौण मानते हुए भी उन्‍होंने गार्हस्‍थ्‍य-जीवन में न तो स्‍वयं ही उन सबका परित्‍याग किया और न कभी उनका खण्‍डन ही किया। वे स्‍वयं दोनों कालों की संख्‍या, तर्पण, पितृश्राद्ध, पर्व, उत्‍सव, तीर्थ, व्रत एवं वैदिक संस्‍कारों को करते तथा मानते थे, उन्‍होंने अपने आचरणों और चेष्‍टाओं द्वारा भी इन सबकी कहीं उपेक्षा नहीं की। श्रीवास, अद्वैताचार्य, मुरारी गुप्‍त, रमाई पण्डित, चन्‍द्रशेखर आचार्य आदि उनके सभी अंतरंग भक्‍त भी परम भागवत होते हुए इन सभी मर्यादाओं का पालन करते थे।

भावावेश के समय को छोड़कर वे कभी भी किसी के सामने अपनी बड़ाई की कोई बात नहीं कहते थे। अपने से बड़ों के सामने वे सदा नम्र ही बने रहते। श्रीवास, नंदनाचार्य, चन्‍द्रशेखराचार्य, अद्वैताचार्य आदि अपने सभी भक्‍तों को वे वृद्ध समझकर पहले से प्रणाम करते थे।
संसार का एक नियम होता है कि किसी एक ही वस्‍तु के जब बहुत-से इच्‍छुक होते हैं, तो वे परस्‍पर में विद्वेष करने लगते हैं, हमें उस अपनी इष्‍ट वस्‍तु के प्राप्‍त होने की तनिक भी आशा चाहे न हो तो भी हम इसके दूसरे इच्‍छुकों से अकारण द्वेष करने लगेंगे, ऐसा स्‍वाभाविक नियम है। संसार में इन्द्रियों के भोग्‍य-पदार्थों की और कीर्ति की सभी को इच्‍छा रहती है। इसीलिये जिनके पास इन्द्रियों के भोग्‍य-पदार्थों की प्रचुरता होती है और जिनकी संसार में कीर्ति होने लगती है, उनसे लोग स्‍वाभाविक हो द्वेष-सा करने लगते हैं। सज्‍जन पुरुष तो सुखी लोगों के प्रति मैत्री, दु:खियों के प्रति करुणा, पुण्‍यवानों के प्रति प्रसन्‍नता और पापियों के प्रति उपेक्षा के भाव रखते हैं।सर्वसाधारण लोग धनिकों और प्रतिष्ठितों के प्रति उदासीन-से बने रहते हैं और अधिकांश दुष्‍ट -प्रकृति के लोग तो सदा धनी-मानी सज्‍जनों की निंदा ही करते रहते हैं। जहाँ चार लोगों ने किसी की प्रशंसा की, बस उसी समय उनकी अंदर छिपी ईर्ष्‍या भभक उठती है और वे झूठी-सच्‍ची बातों को फैलाकर जनता में उनकी निंदा करना आरंभ कर देते हैं। ऐसे निंदकों के दल से अवतारी पुरुष भी नहीं बचने पाये हैं। गौरांग महाप्रभु की भी बढ़ती हुई कीर्ति और उनके चारों और जनता में फैले हुए यश-सौरभ से क्षभित होकर निन्दक लोग उनकी भाँति-भाँति से निन्दा करने लगे। कोई तो उन्हें वाममार्गी बताता, कोई उन्हें ढोंगी कहकर अपने हृदय की कालिमा को प्रकट करता और कोई-कोई तो उन्हें धूर्त और बाजीगर तक कह देता। प्रभु सब‍की सुनते और हंस देते। उन्होंने कभी अपने निन्दकों की किसी बात का विरोध नहीं किया। उलटे वे स्वयं निन्दकों की प्रशंसा ही करते रहते। उनकी सहनशीलता और विद्वेष करने वालों के प्रति भी करुणा के भावों का पता नीचे की दो घटनाओं से भली-भाँति पाठकों को लग जायगा।

यह तो पाठकों को पता ही है कि श्रीवास पण्डित के घर संकीर्तन सदा किवाड़ बंद करके ही होता था। साल भर तक सदा इसी तरह संकीर्तन होता रहा। बहुत-से विद्वेषी और तमाशबीन देखने आते और किवाड़ों को बंद देखकर संकीर्तन की निन्दा करते हुए लौट जाते। उन्हीं ईर्ष्‍या रखने वाले विद्वेषियों में गोपाल चापाल नाम का एक क्षुद्र प्रकृति का ब्राह्मण था। वह प्रभु की बढ़ती हुई कीर्ति से क्षुभित-सा हो उठा, उसने संकीर्तन को बदनाम करने का अपने मन में निश्‍चय किया।

एक दिन रात्रि में वह श्रीवास पण्डित के द्वार पर पहुँचा। उस समय द्वार बंद था और भीतर संकीर्तन हो रहा था। चापाल ने द्वार के सामने थोड़ी-सी जगह लीपकर वहाँ चण्‍डी की पूजा की सभी सामग्री रख दी। एक हांडी में लाल, पीली, काली बिन्दी लगाकर उसको सामग्री के समीप रख दिया। एक शराब का पात्रतथा एक पात्र में मांस भी रख दिया। यह सब रखकर वह चला गया। दूसरे दिन जब संकीर्तन करके भक्‍त निकले तो उन्होंने चण्‍डीपूजन की सामग्री देखी। खलों का भी दल आकर एकत्रित हो गया और एक-दूसरे को सुनाकर कहने लगे- ‘हम तो पहले ही जानते थे, ये रात्रि में किवाड़-बंद करके और स्त्रियों को साथ लेकर जोर-जोर से तो हरिध्‍वनि करते हैं और भीतर-ही-भीतर वाममार्ग की पद्धति से भैरवी-चक्र का पूजन करते हैं। ये सामने काली की पूजा की सामग्री प्रत्यक्ष ही देख लो। जो लोग सज्जन थे, वे समझ गये कि यह किसी धूर्त का कर्तव्य है। सभी एक स्वर से ऐसा करने वाले धूर्त की निन्दा करने लगे।श्रीवास ताली पीट-पीट कर हंसने लगे और लोगों से कहने लगे- ‘देखो भाई! हम रात्रि में ऐसे ही चण्‍डी पूजा किया करते हैं। भद्रपुरुषों को आज स्पष्‍ट ही ज्ञात हो गया! भक्‍तों ने उन सभी सामान को उठाकर दूर फेंक दिया और उस स्थान को गोमय से लीपकर और गंगाजल छिड़ककर शुद्ध किया।

दूसरे ही दिन लोगों ने देखा गोपाल चापाल के सम्पूर्ण शरीर में गलित कुष्‍ठ हो गया है। उसके सम्पूर्ण शरीर में से पीब बहने लगा। इतने पर भी घाव खुजाते थे, खुजली के कारण वह हाय-हाय करके सदा चिल्लाता रहता था। नगर के लोगों ने उसे मुहल्ले में से निकाल दिया, क्यों‍कि कुष्‍ठ छूत की बिमारी होती है, वह बेचारा गंगा जी के किनारे एक नीम के पेड़ के नीचे पड़ा रहता था।

एक दिन प्रभु को देखकर उसने दीन-भाव से कहा- ‘प्रभो! मुझसे बड़ा अपराध हो गया है। क्‍या मेरे इस अपराध को तुम क्षमा नहीं कर सकते? तुम जगत का उद्धार कर रहे हो, इस पापी का भी उद्धार करो। गांव-नाते से तुम मेरे भानजे लगते हो, अपने इस दीन-हीन मामा के ऊपर तुम कृपा क्‍यों नहीं करते? मैं बहुत दु:खी हूँ। प्रभो! मेरा दु:ख दूर करो।

प्रभु ने कहा- ‘कुछ भी हो, मैं अपने अपराधी को तो क्षमा कर सकता हूँ; किंतु तुमने श्रीवास पण्डित का अपराध किया है। इसलिये तुम्‍हें क्षमा करने की मुझमें सामर्थ्‍य नहीं है।’ बेचारा चुप हो गया और अपनी नीचता तथा दुष्‍टता फल कुष्‍ठ के दु:ख से दु:खी होकर वेदना के सहित भोगता रहा।

थोड़े दिनों के पश्‍चात जब प्रभु संन्‍यास लेकर कुलिया में आये और यह कुष्‍ठी फिर इनके शरणापन्‍न हुआ तब इन्‍होंने उसे श्रीवास पण्डित के पास भेज दिया।
क्रमशः

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