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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘मुझे तो इनसे पहले भी कभी द्वेष नहीं था और अब भी नहीं है, यदि प्रभु ने इन्‍हें क्षमा कर दिया है, तो ये अब दु:ख से मुक्‍त हो ही गये। देखते-ही-देखते उसका सम्‍पूर्ण शरीर नीरोग हो गया।
इसी प्रकार एक दिन एक और ब्राह्मण संकीर्तन देखने के लिये आया। जब उसने किवाड़ों को भीतर से बंद देखा तब तो वह क्रोध के मारे आगबबूला हो गया और की‍र्तन वालों को खरी-खोटी सुनाता हुआ अपने घर लोट गया। दूसरे दिन गंगा जी के घाटपर जब उसने प्रभु के सहित स्‍नान करते देखा तब तो उसने क्रोध में भरकर प्रभु से कहा- ‘तुम्‍हें अपने कीर्तन का बड़ा अभिमान है। दस-बीस भोले-भाले लोगों को कठपुतलियों की तरह हाथ के इशारे से नचाते रहते हो। लोग तुम्‍हारी पूजा करते हैं, इससे तुम्‍हें बड़ा अहंकार हो गया है। जाओ मैं तुम्‍हें शाप देता हूँ, कि जिस संसारी सुख के मद में तुम इतने भूले हुए हो, वह तुम्‍हारा संसारी सुख शीघ्र ही नष्‍ट हो जाय।’

ब्राह्मण के ऐसे वाक्‍यों को सुनकर सभी भक्‍त आश्‍चर्य के साथ उस ब्राह्मण के मुख की ओर देखने लगे। कुछ लोगों को थोड़ा क्रोध भी आ गया, प्रभु ने उन सबको रोकते हुए हंसकर उन ब्राह्मण देवता से कहा- ‘विप्रदेव! आपके चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। आपका शाम मुझे सहर्ष स्‍वीकार है।’

कुछ देर के पश्‍चात ब्राह्मण का क्रोध शांत हो गया। तब उसने अपने वाक्‍यों पर पश्‍चात्ताप प्रकट करते हुए विनीतभाव से कहा- ‘प्रभो! मैंने क्रोध के वशीभूत होकर आपसे ऐसे कुवाक्‍य कह दिये। आप मेरे अपराध को क्षमा करें।’

प्रभु ने उसे आश्‍वासन देते हुए कहा- ‘विप्रवर! आपने मेरा कुछ भी अपकार नहीं किया और न आपने मुझसे कोई कुवाक्‍य ही कहा। आपने शाप न देकर यह तो मुझे वरदान ही दिया है! श्रीकृष्‍ण-प्राप्ति में संसारी सुख ही तो बंधन के प्रधान कारण हैं। आपने मुझे उनसे मुक्‍त होने का जो वरदान प्रदान कर दिया, इससे मेरा कल्‍याण ही होगा। आप इसके लिये कुछ भी चिंता न करें।’ ऐसा कहकर प्रभु ने उस ब्राह्मण को प्रेमपूर्वक आंलिगन किया और वे भक्‍तों के सहित अपने स्‍थान को चले आये। इसी का नाम है विद्वेष करने करने वालों के प्रति भी शुद्ध भाव रखना। ऐसा व्‍यवहार महाप्रभु-जैसे महापुरुषों के ही द्वारा सम्‍भव भी हो सकता है।

महाप्रभु की नम्रता बड़ी ही अलौकिक थी। वे रास्‍तें में कैसे भी चलें, स्त्रियों से कभी दृष्टि नहीं मिलाते थे। बड़े लोगों से सदा दीनता और सम्‍मान के सहित भाषण करते थे। भावावेश के समय तो वे अपने स्‍वरूप को ही भूल जाते थे। भावावेश के अतिरिक्‍त समय में यदि उनकी कोई पूजा या चरण-वंदना करता तो वे उससे बहुत अधिक असंतुष्‍ट होते। भावावेश अनन्‍तर यदि कोई कहता कि हमें आपके दुर्गारूप में, कृष्‍णरूप में, रामरूप में अथवा बलदेव, वामन, नृसिंह के रूप में दर्शन क्‍यों हुए थे तो आप कह देते- ‘तुम सदा उसी रूप का चिंतन करते रहते हो। तुम्‍हारे इष्‍टदेव में सभी सामर्थ्‍य है, वह जिसके शरीर में भी चाहें प्रवेश होकर तुम्‍हें दर्शन दे जायं। इसमें तुम्‍हारी भावना ही प्रधान कारण है। तुम्‍हें अपनी शुद्ध भावना से ही ऐसे रूपों के दर्शन होते हैं।

एक बार ये भक्‍तों के सहित लेटे हुए थे कि एक ब्राह्मणी ने आकर इनके चरणों में अपना मस्‍तक रखकर इन्‍हें भक्तिभाव से प्रणाम किया। ब्राह्मणी को अपने चरणों में मस्तक रखते देखकर इन्‍हें बड़ा दु:ख हुआ और उसी समय दौड़कर गंगा जी में कूद पड़े। सभी भक्त इन्‍हें इस प्रकार गंगा जी में कूदते देखकर हाहाकार करने लगे। शचीमाता छाती पीट-पीटकर रुदन करने लगीं। उसी समय नित्‍यानंद जी और हरिदास भी प्रभु के साथ गंगा जी में कूद पड़े और इन्‍हें निकालकर किनारे पर लाये।

इस प्रकार वे अपने जीवन को रागद्वेषादि से बचाते हुए, क्षमा को धारण करते हुए, अभिमान से रहित होकर, पापियों के साथ भी प्रेम का बर्ताव करते हुए तथा विद्वेषियों से भी सुंदर व्‍यवहार करते हुए अपनी सज्‍जनता, सहृदयता,सहनशीलता और सच्‍चरित्रता से भक्‍तों के लिये एक उच्‍चादर्श का पाठ पढ़ाते हुए अपने आचरणों द्वारा सबको आनन्दित करने लगे।

श्रीकृष्‍ण–लीलाभिनय……

यदि एक शब्‍द में कोई हमसे भक्‍त की परिभाषा पूछे तो हम उसके सामने ‘लोकबाह्म’ इसी शब्‍द को उपस्थित कर देंगे। इस एक ही शब्‍द में भक्‍त-जीवन की, भक्तिमार्ग के पवित्र पथ के पथिक की पूरी परिभाषा परिलक्षित हो जाती है। भक्‍तों के सभी कार्य अनोखे ही होते हैं। उन्‍हें लोक की परवा नहीं। बालकों की भाँति वे सदा आनन्‍द में मस्‍त रहते हैं, उन्‍हें रोने में भी मजा आता है और हंसने में भी आनन्‍द आता है। वे अपने प्रियतम की स्‍मृति में सदा बेसुध-से बने रहते हैं। जिस समय उन्‍हें कोई उनके प्‍यारे प्रीतम की दो-चार उलटी-सीधी बातें सुना दे, अहा, तब तो उनको आनन्‍द का कहना ही क्‍या है? उस समय तो उनके अंग-प्रत्‍यंगों में सभी सात्त्विक भावों का उदय हो जाता है। यथार्थ स्थिति का पता तो उसी समय लगता है। आइये, प्रेमावतार श्रीचैतन्‍य के शरीर में सभी भक्‍तों के लक्षणों का दर्शन करें।

एक‍ दिन श्री वासपण्डित के घर में प्रभु ने भावावेश में आकर ‘वंशी-वंशी’ कहकर अपनी वही पुरानी बांस की बांसुरी मांगी। कुछ हंसते हुए श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘यहाँ बांसुरी कहा? आपकी बांसुरी तो गोपिकाएँ हर ले गयी।’ बस, इतना सुनना था कि प्रभु प्रेम में विह्वल हो गये, उनके सम्‍पूर्ण अंगों में सात्त्विक भावों का उद्दीपन होने लगा। वे गद्गदकण्‍ठ से बार-बार श्रीवास पण्डित कहते- ‘हाँ, सुनाओ। कुछ सुनाओ। वंशी की लीला सुनाते क्‍यों नही? उस बेचारी पोले बांस की बांसुरी ने उन गोपिकाओं का क्‍या बिगाड़ा था, जिससे वे उसे हर ले गयीं। पण्डित! तुम मुझे उस कथा-प्रसंग को सुनाओं।’ प्रभु को इस प्रकार आग्रह करते देखकर श्रीवास कहने लगे- ‘आश्विन का महीना था, शरद-ॠतु थी। भगवान निशानाथ अपनी सम्‍पूर्ण कलाओं से उदित होकर आकाशमण्‍डल को आलोकमय बना रहे थे। प्रकृति शांत थी, विहंगवृंद अपने-अपने घोंसलों में पड़े शयन कर रहे थे। वृंदावन की निकुंजों में स्‍तब्‍धता छायी हुई थी।
क्रमशः

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