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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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बुद्धिमन्त खाँ जमीदार और धनवान थे, वे भाँति-भाँति साज-बाज के सामान आचार्यरत्न के घर ले आये। एक ऊंचे चबूतरा पर रंगमंच बनाया गया। दायीं ओर स्त्रियों के बैठने की जगह बनायी गयी और सामने पुरुषों के लिये। नियत समय पर सभी भक्तों की स्त्रियाँ आचार्यरत्न के घर आ गयीं। मालिनी देवी और श्री विष्णुप्रिया के सहित शचीमाता भी नाटयाभिनय को देखने के लिये आ गयीं। सभी भक्त क्रमश: इकट्ठे हो गये। सभी भक्तों के आ जाने पर किवाड़ बंद कर दिये गये और लीला-अभिनय आरम्भ हुआ।
भीतर बैठे हुए आचार्य वासुदेव पात्रों का रंगमंच पर भेजने के लिये सजा रहे थे। इधर पर्दा गिरा। सबसे पहले मंगलाचरण हुआ। अभिनय में गायन करने के लिये पांच आदमी नियुक्त थे। पुण्डरीक, विद्यानिधि, चन्द्रशेखर आचार्यरत्न और श्रीवास पण्डित के रमाई आदि तीनों भाई। विद्यानिधि का कण्ठ बड़ा ही मधुर था। वे पहले गाते थे। उनके स्वर में ये चारों अपना स्वर मिलाते थे। विद्यानिधि ने सर्वप्रथम अपने कोमल कण्ठ से इस श्लोक का गायन किया-
जयति जननिवासो देवकीजन्मवादो
यदुवरपर्षत्स्वैर्दोर्भिरस्यन्नधर्मम्।।
स्थिरचरवृजिनघ्न: सुस्मितश्रीमुखेन
व्रजपुरवनितानां वर्धयन् कामदेवम्।
इसके अनन्तर एक और श्लोक मंगलाचरण में गाया गया, तब सूत्रधार रंग-मंचपर आया। नाटक के पूर्व सूत्रधार आकर पहले नाटक की प्रस्तावना करता है, वह अपने किसी साथी से बातों-ही-बातों में अपना अभिप्राय प्रकट कर देता है, जिस पर वह अपना अभिप्राय प्रकट करता है, उसे परिपार्श्वक कहते हैं। सूत्रधार (हरिदास)– ने अपने परिपार्श्वक (मुकुन्द)- के सहित रंगमंच पर प्रवेश किया। उस समय दर्शकों में कोई भी हरिदास जी को नहीं पहचान सकते थे, उनकी छोटी-छोटी दाढ़ों के ऊपर सुन्दर पाग बंधी हुई थी, वे एक बहुत लम्बा-सा अंगरखा पहने हुए थे और कंधेपर बहुत लंबी छड़ी रखी हुई थी। आते ही उन्होंने अपनी आजीविका प्रदान करने वाली रंगभूमि को प्रणाम किया और दो सुन्दर पुष्पों से उसकी पूजा करते हुए प्रार्थना करने लगे- ‘हे रंगभूमि! तू आज साक्षात वृन्दावन ही बन जाओ’ इसके अनन्तर चारों ओर देखते हुए दर्शकों की ओर हाथ मटकाते हुए वे कहने लगे- ‘बड़ी आपत्ति है, यह नाटक करने का काम भी कितना खराब है। सभी के मन को प्रसन्न करना होता है। कोई कैसी भी इच्छा प्रकट कर दे, उसकी पूर्ति करनी ही होगी।आज ब्रह्मा बाबा की सभा में उन्हें प्रणाम करने गया था। रास्ते में नारद बाबा ही मिल गये। मुझसे कहने लगे- ‘भाई! तुम खूब मिले। हमारी बहुत दिनों से प्रबल इच्छा थी कि कभी वृन्दावन की-श्रीकृष्ण की लीला को देखें। कल तुम हमें श्रीकृष्ण लीला दिखाओ। नारद बाबा भी अजीब हैं। भला मैं वृन्दावन की परम गोप्य रहस्य लीलाओं का प्रत्यक्ष अभिनय कैसे कर सकता हूँ। परिपार्श्वक इस बात को सुनकर (आश्चर्य प्रकट करते हुए) कहने लगा- ‘महाशय! आप आज कुछ नशा-पत्ता तो करके नहीं आ रहें हैं? मालूम पड़ता है, मीठी विजया कुछ अधिक चढ़ा गये हो। तभी तो ऐसी भूली-भूली बातें कर रहें हो? भला नारद- जैसे ब्रह्मज्ञानी, जितेन्द्रिय और आत्माराम मुनि श्रीकृष्ण की श्रृगांरी लीलाओं के देखने की इच्छा प्रकट करें यह तो आप एकदम असम्भव बात कह रहे हैं।’
सूत्रधार (हरिदास)- वाह साहब! मालूम पड़ता है, आप शास्त्रों के ज्ञान से एकदम कोरे ही हैं। श्रीमद्भागवत में क्या लिखा है, कुछ खबर भी नहीं है? भगवान के लीलागुणों में यही तो एक भारी विशेषता है कि मोक्ष-पदवीदार पर पहुँचे हुए आत्माराम मुनि तक उनमें भक्ति करते हैं।
परिपार्श्वक- अच्छे आत्माराम हैं, माया से रहित होने पर भी मायिक लीलाओं को देखने की इच्छा करते रहते हैं।
सू०– तुम तो निरे घोंघा वसन्त हो। भला भगवान की लीलाएँ मायिक कैसे हो सकती हैं? वे तो अप्राकृतिक हैं। उनमें तो मायका लेश भी नहीं।
परि०- क्यों जी, माया के बिना तो कोई क्रिया हो ही नहीं सकती, ऐसा हमने शास्त्रज्ञों के मुख से सुना है।
सू०- बस, सुना ही है, विचारा नहीं। विचारते तो इस प्रकार गुड़-गोबर को मिलाकर एक न कर देते। यह बात मनुष्यों की क्रिया के सम्बन्ध में है, जो मायाबद्ध जीव हैं। भगवान् तो मायापति हैं। माया तो उनकी दासी है। वह उनके इशारे से नाचती है। उनकी सभी लीलाएं अप्राकृतिक, बिना प्रयोजन के केवल भक्तों के आनन्द के ही निमित्त होती हैं।
परि०- (कुछ विस्मय के साथ) हाँ, ऐसी बात है? तब तो नारद जी भले ही देखें। खूब ठाट से दिखाओ। सालभर तक ऐसी तैयारी करो कि नारदजी भी खुश हो जायँ। उन्हें ब्रह्मलोक से आने में अभी दस-बीस वर्ष तो लग ही जायँगे।
सू०- तुम तो एकदम अकल के पीछे डंडा लिये ही फिरते रहते हो। वे देवर्षि ठहरे, संकल्प करते ही जिस लोक में चाहें पहुँच सकते हैं।
परि०- मुझे इस बात का क्या पता था, यदि ऐसी बात है, तो अभी लीला की तैयारी करता हूँ। हाँ, यह तो बताओ किस लीला का अभिनय करोगे?
सू०- मुझे तो दानलीला ही सर्वोत्तम जँचती है, तुम्हारी क्या सम्मति है?
परि०- लीला तो बड़ी सुन्दर है, मुझे भी उसका अभिनय पसंद है, किंतु एक बड़ा भारी द्वन्द्व है। अभिनय करने वाली बालिकाएँ लापता हैं।
सू०- (कुछ विस्मय के साथ) वे कहाँ गयीं?
परि०- वे गोपेश्वर शिव का पूजन करने वृन्दावन चली गयी हैं।
सू०- तुमने यह एक नयी आफत की बात सुना दी। अब कैसे काम चलेगा?
परि०- (जल्दी से) आफत काहेकी, मैं अभी जाता हूँ, बात-की-बात में आता हूँ और उन्हें साथ-ही-साथ लिवाकर लाता हूँ। सू०- (अन्यमनस्कभाव से) ये सब अभी हैं बच्ची, उनकी उम्र है कच्ची, वैसे ही बिना कहे चली गयीं, न किसी से कह गयीं, न सुन गयीं। वहाँ का पथ है दुर्गम भारी, कहीं फिरेंगी मारी-मारी। साथ में कोई बड़ी-बूढ़ी भी नहीं है।
परि०- है क्यों नहीं, बड़ाई बूढ़ी कैसी है? सू०- (हंसकर) बूढ़ी को भी पूजन को खूब सूझी, आँखों से दीखता नहीं। कोई धीरे से धक्का मार दे तो तीन जगह गिरेगी, उसे रास्ते का क्या होश? इतने ही में नेपथ्य से वीणा की आवाज सुनायी दी और बड़े स्वर के सहित- ‘श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव’ यह पद सुनायी दिया। सूत्रधार यह समझकर कि नारद जी आ गये, जल्दी से अपने परिपार्श्वक (मुकुन्द) के साथ कन्याओं को बुलाने के लिये दौड़ गये।
क्रमशः
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