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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इतने में ही क्या देखते हैं कि हाथ में वीणा लिये हुए पीले वस्त्र पहने सफेद दाढ़ी वाले नारद जी अपने शिष्य के सहित रंग-मंच पर ‘श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव’ इस पद को गाते हुए धीरे-धीरे घुम रहे हैं। उस समय श्रीवास नारद-वेश में इतने भले मालूम पड़ते थे कि कोई उन्हें पहचान ही नहीं सकता था कि ये श्रीवास पण्डित हैं। शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी,रामनामी दुपट्टा ओढे़ कमण्डलु हाथ में लिये नारद जी के पीछे-पीछे घूम रहे थे।
स्त्रियाँ श्रीवास के इस रूप को देखकर विस्मित हो गयीं! शचीमाता ने हंसकर मालिनी देवी से पूछा- ‘क्यों? यही तुम्हारे पति हैं न? मालिनी देवी ने कुछ मुसकराते हुए कहा- ‘क्या पता तुम ही जानो!’
श्रीवास पण्डित ने वेश ही नारद का नहीं बना रखा था, सचमुच उन्हें उस समय नारद मुनि का वास्तविक आवेश हो आया था। उसी आवेश में आपने अपने साथ के शिष्य से कहा- ‘ब्रह्मचारी! क्या बात है? यहाँ तो नाटक का कोई रंग-ढंग दिखायी नहीं पड़ता?’ उसी समय सूत्रधार के साथ सुप्रभा के सहित गोपीवेश में गदाधर ने प्रवेश किया।
इन्हें देखकर नारद जी ने पूछा- ‘तुम कौन हो?’
सुप्रभा (ब्रह्मानन्द) ने कहा- ‘भगवन! हम ग्वालिनी हैं, वृन्दावन में गोपेश्वर भगवान के दर्शन के निमित्त जा रहीं हैं। आप महाराज कौन हैं? और कहाँ जा रहें हैं?’
नारदजी ने कहा- ‘मैं श्रीकृष्ण का एक अत्यन्त ही अंकिचन किंकर हूँ, मेरा नाम नारद है!’
‘नारद’ इतना सुनते ही सुप्रभा के साथ सखी ने तथा अन्य सभी ने देवर्षि नारद को साष्टांग प्रणाम किया। गोपी (गदाधर) नारद जी के चरणों को पकड़कर रोते-रोते कहने लगी- ‘हे भक्तभयहारी भगवन ! जिन श्रीकृष्ण ने अपना काला रंग छिपाकर गौर वर्ण धारण कर लिया है, उन अपने प्राण प्यारे प्रियतम के प्रेम की अधिकारिणी मैं कैसे बन सकूँगी? यह कहते-कहते गोपी (गदाधर) नारद के पैरों को पकड़कर जोरों के साथ रुदन करने लगी। उसके कोमल गोल कपोलों पर से अश्रुओं की धारा को बहते देखकर सभी भक्त-दर्शन रुदन करने लगे।‘
नारद जी गोपी को आश्वासन देते हुए कहने लगे- ‘तुम तो श्रीकृष्ण की प्राणों से भी प्यारी सहचरी हो। तुम व्रजमण्डल के घनश्याम की मनमोहिनी मयूरी हो। तुम्हारे नृत्य को देखकर वे ऊपर रह ही नहीं सकते। उसी क्षण नीचे उतर आयेंगे। तुम अपने मनोहर सुखमय नृत्य से मेरे संतप्त हृदय को शीतलता प्रदान करो।’
गोपी इतना सुनने पर भी रुदन ही करती रही। दूसरी ओर सुप्रभा अपने नृत्य के भावों से नारद के मन को मुदित करने लगी। उधर सूत्रधार (हरिदास) भी सुप्रभा के ताल-स्वर में ताल-स्वर मिलाते हुए कंधे पर लट्ठ रखकर नृत्य करने लगे। वे सम्पूर्ण आँगन में पागल की तरह घूम-घूमकर ‘कृष्ण भज कृष्ण भज कृष्ण भज बावरे। कृष्ण के भजन बिनु खाउगे क्या पामरे।।‘ इस पद को गा-गाकर जोरों से नाचने लगे। पद गाते-गाते आप बीच में रुककर इस दोहे को कहते जाते-
रैनि गंवाई सोइके, दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल था कौड़ी बदले जाय।।
कृष्ण भज कृष्ण भज कृष्ण भज बावरे।
कृष्ण के भजन बिनु खाउगे क्या पामरे।।
गोपी नारद के चरणों को छोड़ती ही नहीं थीं, सुप्रभा (ब्रह्मानन्द)- ने गोपी (गदाधर)- से आग्रहपूर्वक कहा- ‘सखि! पूजन के लिये बड़ी वेला हो गयी। सभी हमारी प्रतीक्षा में होंगी, चलो चलें।‘
सुप्रभा की ऐसी बात सुनकर सखी ने नारद जी की चरणवन्दना की और उनसे जाने की अनुमति मांगकर सुप्रभा के सहित दूसरी ओर चली गयी। उनके दूसरी ओर जाने पर नारद जी अपने ब्रह्मचारी से कहने लगे- ‘ब्रह्मचारी! चलो हम भी वृन्दावन की ही ओर चलें। वहीं चलकर श्रीकृष्ण भगवान की मनोहर लीलाओं के दर्शन से अपने जन्म को सफल करें।’
जो आज्ञा’ कहकर ब्रह्मचारी नारद जी के पीछे-पीछे चलने लगा। घर के भीतर महाप्रभु भुवन मोहिनी लक्ष्मी देवी का वेष धारण कर रहे थे। उन्होंने अपने सुन्दर कमल के समान कोमल युगल चरणों में महावर लगाया। उन अरुण रंग के तलुओं में महावर लालिमा फीकी-फीकी-सी प्रतीत होने लगी। पैरों की उंगलियों में आपने छल्ली और छल्ला पहने, खड़ला, छडे़ और झाँझनों के नीचे सुन्दर घुंघरू बांधे। कमर में करधनी बांधी। एक बहुत ही बढ़िया लहँगा पहनी। हाथों की उंगलियों में छोटी-छोटी छल्ली और अंगुठे में बड़ी-सी आरसी पहनी। गले में मोहन माला पचमनिया, हार, हमेल तथा अन्य बहुत-सी जड़ाऊ और कीमती मालाएँ धारण कीं। कानों में कर्णफूल और बाजुओं में सोने की पहुँची पहनी।
आचार्य वासुदेव ने बड़ी ही उत्तमता से प्रभु के लम्बे-लम्बे घुंघराले बालों में सीधी मांग निकाली और पीछे से बालों का जूड़ा बांध दिया। बालों के जूडे़ में मालती, चम्पा और चमेली आदि के बड़ी ही सजावट के साथ फूल गूंथ दिये। एक सुन्दर-सी माला जूडे़ में खोंस दी। माँग में बहुत ही बारीकी से सिन्दूर भर दिया। माथे पर बहुत छोटी-सी रोली की एक गोल बिन्दी रख दी। सुगन्धित पान प्रभु के श्रीमुख में दे दिया। एक बहुत ही पतली कामदार ओढ़नी प्रभु को उढा़ दी गयी। श्रृंगार करते-करते ही प्रभु को रुक्मिणी का आवेश हो आया। वे श्रीकृष्ण के विरह में रुक्मिणी भाव से अधीर हो उठे।
रूक्मिणी कि पिता की इच्छा थी कि वे अपनी प्यारी पुत्री का विवाह श्रीकृष्णचन्द्र जी के साथ करें, किंतु उनके बड़े पुत्र रुक्मी ने रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल के साथ करने का निश्चय किया था। इससे रुक्मिणी अधीर हो उठी। वह मन-ही-मन श्रीकृष्णचन्द्र जी को अपना पति बना चुकी थी। उसने मन से अपना सर्वस्व भगवान वासुदेव के चरणों में समर्पित कर दिया था। वह सोचने लगी- ‘हाय! वह नराधम शिशुपाल कल बारात सजाकर मेरे पिताकी राजधानी में आ जायगा। क्या मैं अपने प्राणप्यारे पतिदेव को नहीं पा सकूँगी? मैंने तो अपना सर्वस्व उन्हीं के श्रीचरणों में समर्पण कर दिया है। वे दीनवत्सल हैं, अशरणशरण हैं, घट-घटकी जानने वाले हैं। क्या उनसे मेरा भाव छिपा होगा? वे अवश्य ही जानते होंगे। फिर भी उन्हें स्मरण दिलाने को एक विनय की पाती तो पठा ही दूँ। फिर आना-न-आना उनके अधीन रहा? या तो इस प्राणहीन शरीर को शिशुपाल ले जायगा या उसे ख़ाली हाथों ही लौटना पड़ेगा।
क्रमशः
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