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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
137-

निहाल हो जाते हैं, धन्‍य हो जाते हैं, लज्‍जा, घृणा तथा भय से रहित होकर वे भी पागलों की भाँति प्रलाप करने लगते हैं। उन पागलों के चरित्र में कितना आनन्‍द है, कैसा अपूर्व रस है। उनकी मार-पीट,गाली-गलौज, स्‍तुति-प्रार्थना, भोजन तथा शयन सभी कामों में प्रेम का सम्‍पुट लगा होने से ये सभी काम दिव्‍य और अलौकिक- से प्रतीत होते हैं। उनके श्रवण से सहृदय पुरुषों को सुख होता है, वे भी उस प्रेमासव के लिये छटपटाने लगते हैं और उसी छटपटाहट के कारण वे अंत में प्रभु-प्रेम के अधिकारी बनते हैं।महाप्रभु अब भक्‍तों के साथ लेकर नित्‍यप्रति बड़ी ही मधुर-मधुर लीलाएँ करने लगे। जब से जगाई-मधाई का उद्धार हुआ और वे अपना सर्वस्‍व त्‍यागकर श्रीवास पण्डित के यहाँ रहने लगे, तब से भक्‍तों का उत्‍साह अत्‍यधिक बढ़ गया है। अन्‍य लोग भी संकीर्तन के महत्त्व को समझने लगे हैं। अब संकीर्तन की चर्चा नवद्वीप में पहले से भी अधिक होने लगी है। निंदक अब भाँति-भाँति से कीर्तन को बदनाम करने की चेष्‍टा करने लगे हैं।
मुरारी गुप्‍त प्रभु के सहपाठी थे, वे प्रभु से अवस्‍था में भी बड़े थे। प्रभु उन्‍हें अत्‍यधिक प्‍यार करते और उन्‍हें अपना बहुत ही अंतरंग भक्‍त समझते। मुरारी का भी प्रभु के चरणों में पूर्णरीत्‍या अनुराग था। वे रामोपासक थे, अपने को हनुमान समझकर कभी-कभी भावावेश में आकर हनुमान जी की भाँति हुंकार भी मारने लगते। वे सदा अपने को प्रभु का सेवक ही समझते। एक दिन प्रभु ने विष्‍णु-भाव में ‘गरुड़’-‘गरुड़’ कहकर पुकारा। बस, उसी समय मुरारी ने अपने वस्‍त्र को दोनों ओर पंखों की तरह फैलाकर प्रभु को जल्‍दी से अपने कंधे पर चढ़ा लिया और आनन्‍द से इधर-उधर आंगन में घूमने लगे। यह देखकर भक्‍तों के आनन्‍द का ठिकाना नहीं रहा। उन्‍हें प्रभु साक्षात चतुर्भुज नारायण की भाँति गरुड़ पर चढ़े हुए और चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म इन चारों वस्‍तुओं को लिये हुए-से प्रतीत होने लगे। भक्‍त आनन्‍द के सहित नृत्‍य करने लगे। मालती देवी तथा शची माता आदि अन्‍य स्‍त्रियाँ प्रभु को मुरारी के कंधे पर चढ़ा हुआ देखकर भयभीत होने लगीं। कुछ काल के अनन्‍तर प्रभु को बाह्यज्ञान हुआ और वे मुरारी के कंधे से नीचे उतरे।

मुरारी रामोपासक थे। प्रभु उनकी ऐकान्ति की निष्‍ठा से पुर्णरीत्या परिचित थे। भक्तों को उनका प्रभाव जताने के निमित्त प्रभु ने एक दिन उनसे एकान्त में कहा- ‘मुरारी! यह बात बिलकुल ठीक है कि श्रीराम और श्रीकृष्‍ण दोनों एक ही हैं। उन्हीं भगवान के अनन्त रूपों में से ये भी हैं। भगवान के किसी भी नाम तथा रूप की उपासना करो, अन्त में सबका फल प्रभु-प्राप्ति ही है, किंतु श्रीरामचन्द्र जी की लीलाओं की अपेक्षा श्रीकृष्‍ण-लीलाओं में अधिक रस भरा हुआ है। तुम श्रीराम रूप की लीलाओं की अपेक्षा श्रीकृष्‍ण-लीलाओं का आश्रय ग्रहण क्यों नहीं करते? हमारी हार्दिक इच्छा है कि तुम निरन्तर श्रीकृष्‍ण-लीलाओं का ही रसास्वादन किया करो। आज से श्रीकृष्‍ण को ही अपना सर्वस्व समझकर उन्हीं की अर्चा-पूजा तथा भजन-ध्‍यान किया करो।‘

प्रभु की आज्ञा मुरारी ने शिरोधार्य कर ली। पर उनके हृदय में खलबली-सी मच गयी। वे जन्म से ही रामोपासक थे। उनका चित्त तो रामरूप में रमा हुआ था, प्रभु उन्हें कृष्‍णोपासना करने के लिये आज्ञा देते हैं। इसी असमंजस में पड़े हुए वे रात्रि भर आंसू बहाते रहे। उन्हें क्षणभर के लिये भी नींद नहीं आयी। पूरी रात्रि रोते-रोते ही बितायी। दूसरे दिन उन्होंने प्रभु के समीप जाकर दीनता और नम्रता के साथ निवेदन किया- ‘प्रभो! यह मस्तक तो मैंने राम को बेच दिया है। जो माथा श्रीराम के चरणों में बिक चुका है, वह दूसरे किसी के सामने कैसे नत हो सकता है? नाथ! मैं आत्माघात कर लूंगा, मुझसे न तो रामोपासना का परित्याग होगा और न आपकी आज्ञा का ही उल्लघंन करने की मुझमें सामर्थ्‍य है।’ इतना कहकर मुरारी फूट-फूटकर रुदन करने लगे। प्रभु इनकी ऐसी इष्‍टनिष्‍ठा देखकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और जल्दी से इनका गाढ़ आलिगंन करते हुए गद्गद कण्‍ठ से कहने लगे- ‘मुरारी! तुम धन्य हो, तुम्हें अपने इष्‍ट में इतनी अधिक निष्‍ठा है, हमें भी ऐसा ही आशीर्वाद दो कि हमारी भी श्रीकृष्‍ण के पादपद्मों में ऐसी ही ऐकान्तिक दृढ़ निष्‍ठा हो।’ एक दिन प्रभु ने मुरारी से किसी स्तोत्र का पाठ करने के लिये कहा। मुरारी ने बड़े ही लय और स्वर के साथ स्वरचित रघुवीराष्‍टक को सुनाया। उसके दो श्‍लोक यहाँ दिये जाते हैं-

राजत्किरीटमणिदीधितिदीपिताश-
मुद्यद्बृहस्पतिकवि प्रतिमे वहन्तम्।
द्वे कुण्‍डलेऽंकरहितेन्दुसमानवक्‍त्रं 
रामं जगत्त्रयगुरुं सततं भजामि।।
उद्यद्विभाकरमरीचिविरोधिताब्ज-
नेत्रं सुबिम्बदशनच्छदचारुनासम्।
शुभ्रांशुरश्मिपरिनिर्जितचारुहासं 
रामं जगत्त्रयगुरुं सततं भजामि।

प्रभु इनके इस स्तोत्र पाठ से अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और इनके मस्तक पर ‘रामदास’ शब्द लिख दिया। निम्न-श्‍लोक में इस घटना का कैसा सुन्दर और सजीव वर्णन है-

इत्‍थं निशम्‍य रघुनंदनराजसिंह-
श्‍लोकाष्‍टकं स भगवान चरणं मुरारे:।
वैद्यस्‍य मूर्ध्नि विनिधाय लिलेख भाले
त्‍वं ‘रामदास’ इति भो भव मत्‍प्रसादात्।

वे प्रभु राजसिंह श्रीरामचन्‍द्र जी के इन आठ श्‍लोकों को सुनकर बड़े प्रसन्‍न हुए और वैद्यवर मुरारी गुप्‍त के मस्‍तक पर अपने श्रीचरणों को रखकर उनसे कहने लगे-‘तुम्‍हें मेरी कृपा से श्रीरामचन्‍द्र जी की अविरल भक्ति प्राप्‍त हो।’ ऐसा कहकर प्रभु ने उनके मस्‍तक पर ‘रामदास’ ऐसा लिख दिया।
इस प्रकार प्रभु का असीम अनुग्रह प्राप्‍त करके आनन्‍द में विभोर हुए मुरारी घर आये। आते ही इन्‍होंने भावावेश में अपनी पत्‍नी से खाने के लिये दाल-भात माँगा। पतिव्रता साध्‍वी पत्‍नी ने उसी समय दाल-भात परोस कर इनके सामने रख दिया। अब तो ये ग्रासों में घी मिला-मिलाकर जो भी बाल-बच्‍चा अथवा कोई भी दीखता, उसे ही प्रेमपूर्वक खिलाते जाते और स्‍वयं भी खाते जाते। बहुत-सा अन्‍न पृथ्‍वी पर भी गिरता जाता। इस प्रकार से ये कितना खा गये, इसका इन्‍हें कुछ भी पता नहीं। इनकी स्‍त्री ने जब इनकी ऐसी दशा देखी तब वह चकित रह गयी, किंतु उस पतिप्राणा नारी ने इनके काम में कुछ हस्‍तक्षेप नहीं किया। इसी प्रकार खा-पीकर सो गये। प्रात:काल जब उठे तो क्‍या देखते हैं, महाप्रभु इनके सामने उपस्थित हैं। इन्‍होंने जल्दी से उठकर प्रभु की चरण-वंदना की और उन्‍हें बैठने के लिये एक सुंदर आसन दिया।
क्रमशः

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