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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु के बैठ जाने पर मुरारी ने विनीतभाव से इस प्रकार असमय में पधारने का कारण जानना चाहा। प्रभु ने कुछ हंसते हुए कहा- ‘तुम्हीं तो वैद्य होकर आफल कर देते हो। लाओ कुद ओषधि तो दो।’ आश्चर्य प्रकट करते हुए मुरारी ने पूछा- ‘प्रभो! ओषधि कैसी? किस रोग की ओषधि चाहिये? रातभर में ही क्या विकार हो गया?
प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘तुम्हें मालूम नहीं है क्या विकार हो गया? अपनी स्त्री से तो पूछो। रात को तुमने मुझे कितना घृतमिश्रित दाल-भात खिला दिया। तुम प्रेम से खिलाते जाते थे, मैं भला तुम्हारे प्रेम की उपेक्षा कैसे कर सकता था? जितना तुमने खिलाया, खाता गया। अब अजीर्ण हो गया है और उसकी ओषधि भी तुम्हारे पास ही रखी है। यह देखो, यही इस अजीर्ण की ओषधि है।’ यह कहते हुए प्रभु वैद्य की खाट के समीप रखे हुए उनके उच्छिष्ट पात्र का जल पान करने लगे। मुरारी यह देखकर जल्दी से प्रभु को ऐसा करने से निवारण करने लगे। किंतु तब तक प्रभु आधे से अधिक जल पी गये। यह देखकर मुरारी प्रेम के रोते-रोते प्रभु के पादद्मों में लोटने लगे।
एक दिन प्रभु ने अत्यंत ही स्नेह के सहित मुरारी गुप्त ने कहा- ‘मुरारी! तुमने अपनी अहैतु की भक्ति द्वारा श्रीकृष्ण को अपने वश में कर लिया है। अपनी प्रेमरूपी डोरी से श्रीकृष्ण को इस प्रकार कसकर बांध लिया है कि यदि वे उससे छूटने की भी इच्छा करें तो नहीं छूट सकते।’
इतना सुनते ही कवि-हृदय रखने वाले मुरारी गुप्त ने अपनी प्रत्युत्पन्नमति से उसी समय वह श्लोक पढ़कर प्रभु को सुनाया-
क्वाहं दरिद्र: पापीयान् क्व कृष्ण: श्रीनिकेतन:।
ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भित:।
सुदामा की उक्ति है।सुदामा भगवान की दयालुता और असीम कृपा का वर्णन करते हुए कह रहे हैं- ‘भगवान की दयालुता तो देखिये-कहाँ तो मैं सदा पापकर्मों में रत रहने वाला दरिद्र ब्राह्मण और कहाँ सम्पूर्ण ऐश्वर्य के मूलभूत निखिल पुण्याश्रय श्रीकृष्ण भगवान! तो भी उन्होंने केवल ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न हुए मुझ जातिमात्र के ब्राह्मण को अपनी बाहुओं से आलिंगन किया। इसमें मेरा कुछ पुरुषार्थ नहीं है। कृपालु कृष्ण की अहैतु की कृपा ही इसका एकमात्र कारण है।’ इस प्रकार प्रभु विविध प्रकार से मुरारी के सहित प्रेम प्रदर्शित करते हुए अपना मनोविनोद करते रहते थे और मुरारी को उसके द्वारा अनिर्वचनीय आनन्द प्रदान करते रहते थे। अब अद्वैतचार्य के संबंध की भी बातें सुनिये।
अद्वैताचार्य प्रभु से ही अवस्था में बड़े नहीं थे, किंतु सम्भवतया प्रभु के पूज्य पिता श्रीजगन्नाथ मिश्र से भी कुछ बड़े होंगे। विद्या में तो ये सर्वश्रेष्ठ समझे जाते थे। प्रभु ने जिनमें मन्त्र-दीक्षा ली थी, वे ईश्वरपुरी आचार्य के गुरुभाई थे, इस कारण वयोवृद्ध, विद्यावृद्ध, कुलवृद्ध और संबंध वृद्ध होने के कारण प्रभु इनका गुरु की ही तरह आदर-सत्कार किया करते थे। यह बात आचार्य के लिये असह्य थी। वे प्रभु को अपने चरणों में नत होकर प्रणाम करते देखकर बड़े लज्जित होते और अपने को बार-बार धिक्कारते। वे प्रभु से दास्य-भाव के इच्छक थे। प्रभु उनके ऊपर दास्य-भाव न रखकर गुरु-भाव प्रदर्शित किया करते थे, इसी कारण वे दु:खी होकर हरिदास जी के साथ शांतिपुर चले गये और वहीं जाकर विद्यार्थियों को अद्वैत-वैदांत पढ़ाने लगे और भक्ति-शास्त्र अभ्यास छोड़कर ज्ञानचर्चा करने लगे।
प्रभु इनके मनोगत भावों को समझ गये। एक दिन आपने नित्यानंद जी से कहा- ‘श्रीपाद! आचार्य इधर बहुत दिनों से नवद्वीप नहीं पधारे, चलो शांतिपुर चलकर ही उनके दर्शन कर आवें।’ नित्यानंद जी को भला इसमें क्या आपत्ति होनी थी? दोनों ही शांतिपुर की ओर चल पड़े। दोनों ही एक-से मतवाले थे, जिन्हें शरीर की सुधि नहीं, उन्हें भला रास्ते का क्या पता रहेगा? चलते-चलते दोनों ही रास्ता भूल गये। भूलते-भटकते दोनों गंगा जी के किनारे ललितपुर में पहुँचे। ललितपुर में पहुँचकर गंगा जी के किनारे इन्हें एक घर दिखायी दिया। लोगों से पूछा- ‘क्यों जी, यह किसका घर है?’ लोगों ने कहा- ‘यह घर गृहस्थी संन्यासी का है।’ यह उत्तर सुनकर प्रभु बड़े जोरों से खिलखिलाकर हंस पड़े और नित्यानंद जी से कहने लगे- ‘श्रीपाद! यह कैसे आश्चर्य की बात! गृहस्थी भी और फिर संन्यासी भी। गृहस्थी-संन्यासी तो हमने आजतक कभी नहीं देखा। चलो देखे तो सही, गृहस्थी-संन्यासी कैसे होते हैं? नित्यानंद जी यह सुनकर उसी घर की ओर चल पड़े। प्रभु भी उनके पीछे-पीछे चलने लगे। उस घर के द्वार पर पहुँचकर दोनों ने काषाय-वस्त्र पहने संन्यासी वेषधारी पुरुष को देखा।नित्यानंद जी ने उन्हें नमस्कार किया। प्रभु ने संन्यासी समझकर उन्हें श्रद्धा सहित प्रणाम किया। संन्यासी के सहित एक परम सुंदर तेजस्वी तेईस वर्ष के ब्राह्मण-कुमार को अपने घर पर आते देखकर संन्यासी जी ने उनकी यथायोग्य अभ्यर्चना की और बैठने को आसन दिया। परस्पर में बहुत-सी बातें होती रहीं। प्रभु तो सदा प्रेम के भूखे ही बने रहते थे। उन्होंने चारो ओर देखते हुए संन्यासी जी से कहा- ‘संन्यासी महाराज! कुछ कुटिया में हो तो जलपान कराइये।’ संन्यासी जी के घर में दो स्त्रियाँ थी। उनसे संन्यासी जी ने जलपान लाने के लिये कहा। तब तक नित्यानंद जी के सहित प्रभु जल्दी से गंगा-स्नान करके आ गये और अपने-अपने आसनों पर दोनों ही बैठ गये। आषाढ़ का महीना था।
संन्यासी जी की स्त्री सुंदर-सुंदर आम और छिले हुए कटहल के कोये दो पात्रों में सजाकर लायीं। दो कटोरों में सुंदर दुग्ध भी था। प्रभु जल्दी-जल्दी कटहल और आमों को खाने लगे। वे संन्यासी महाशय वाममार्गी थे। यह हम पहले ही बता चुके हैं, उस समय बंगाल में वाममार्ग-पन्थ का प्राबल्य था। स्त्री ने पूछा- ‘क्या ‘आनन्द’ भी थोड़ी-सी लाऊं? संन्यासी जी ने संकेत द्वारा उसे मना कर दिया। स्त्री भीतर चली गयी। एक बड़े आम को खाते हुए प्रभु ने नित्यानंद जी से पूछा- ‘श्रीपाद! ‘आनन्द’ क्या वस्तु होता है? क्या संन्यासीयों की भाषा पृथक होती है? या गृहस्थी-संन्यासीयों की यह भाषा है। तुम तो गृहस्थी–संन्यासी नहीं हो फिर भी जानते ही होगे।’
प्रभु के इस प्रश्न से नित्यानंद जी हंसने लगे। प्रभु ने फिर पूछा- ‘श्रीपाद! हंसते क्यों हो, ठीक-ठीक बताओं?
क्रमशः
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