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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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आनन्‍द क्‍या है? कोई मीठी चीज हो तो मंगाओ, दूध के पश्‍चात मीठा मुंह होगा!”
आम के रस को चूसते हुए नित्‍यानंद जी ने कहा- ‘प्रभों! ये लोग वाममार्गी हैं। मदिरा को ‘आनन्‍द’ कहकर पुकारते हैं। यह सुनकर प्रभु को बड़ा दु:ख हुआ। वे चारों ओर घिरे हुए सिंह की भाँति देखने लगे। इतने में ही स्‍त्री के बुलाने पर संन्‍यासी महाशय भीतर चले गये। उसी समय प्रभु जलपान के बीच में से ही उठकर दौड़ पड़े। नित्‍यानंद जी भी पीछे-पीछे दौड़े। इन दोनों को जलपान के बीच में ही भागते देखकर संन्‍यासी जी भी इन्‍हें लौटाने के लिये चले। प्रभु जल्‍दी से गंगा जी में कूद पड़े और तैरते हुए शांतिपुर की ओर चलने लगे। नित्‍यानंद जी तो तैरने के आचार्य ही थे, वे भी प्रभु के पीछे-पीछे तैरने लगे। गंगा जी के बीच में ही प्रभु का आवेश आ गया। दो कोस के लगभग तैरकर ये शांतिपुर के घाटपर पहुँचे और घाट से सीधे ही आचार्य के घर पहुँचे। दूर से ही हरिदास जी ने प्रभु को देखकर उनकी चरण-वंदना की, किंतु प्रभु को कुछ होश नहीं था, वे सीधे अद्वैताचार्य के ही समीप पहुँचे। उन्‍हें देखते ही प्रभु ने कहा- ‘क्‍यों! फिर सूत्र ज्ञान बघारने लगे।’
आचार्य ने कहा- ‘सूखा ज्ञान कैसे है, ज्ञान तो सर्वश्रेष्‍ठ है। भक्ति तो स्त्रियों के लिये है।’ इतना सुनते ही प्रभु जोरों से अद्वैताचार्य जी को पीटने लगे। सभी लोग आश्‍चर्य के साथ इस अद्भुत लीला को देख रहे थे। किसी की भी हिम्‍मत नहीं होती थी कि प्रभु की इस काम से निवारण करे। प्रभु भी बिना कुछ सोचे- विचारे बूढ़े आचार्य की पीठ पर थप्‍पड़– घूंसे मार रहे थे। ज्‍यों-ज्‍यों मार पड़ती, त्‍यों-ही-त्‍यों अद्वैत और अधिक प्रसन्‍न होते। मानों प्रभु अपने प्रेम की मारद्वारा ही अद्वैताचार्य के शरीर में प्रेम का संचार कर रहे हैं।
अद्वैताचार्य के चेहरे पर दु:ख, शोक या विषण्णता अणुमात्र भी नहीं दिखायी देती थी। उलटे वे अधिकाधिक हर्षोन्‍नमत्त- से होते जाते थे। खटपट और मार की आवाज सुनकर भीतर से आचार्य की धर्मपत्‍नी सीता देवी भी निकल आयीं। उन्‍होंने प्रभु को आचार्य के शरीर पर प्रहार करते देखा तो घबड़ा गयीं और अधीर होकर कहने लगीं-‘हैं, हैं, प्रभु! आप यह क्‍या कर रहे हैं। बूढ़े आचार्य के ऊपर आपको दया नहीं आती।’ किंतु प्रभु किसी की कुछ सुनते ही न थे।

आचार्य भी प्रेम में विभोर हुए मार खाते जाते और नाचते-नाचते गौर-गुणवान करते जाते। इस प्रकार थोड़ी देर के पश्‍चात प्रभु को मूर्च्‍छा आ गयी और बेहोश होकर गिर पड़े। बाह्यज्ञान होने पर उन्‍होंने आचार्य को हर्ष के सहित नृत्‍य करते और अपने चरणों में लोटते हुए देख, तब आप जल्‍दी उठकर क‍हने लगे- ‘श्रीहरि, श्रीहरि! मुझसे कोई अपराध तो नहीं हो गया। मैंने अचेतनावस्‍था में कोई चंचलता तो नहीं कर डाली। आप तो मेरे पितृतुल्‍य हैं। मैं तो भाई अच्‍युत के समान आपका पुत्र हूँ। अचेतनावस्‍था में यदि कोई चंचलता मुझसे हो गयी हो, तो उसे आप क्षमा कर दें।’ इतना कहकर ये चारों ओर देखने लगे। सामने सीता देवी को खड़ी हुई देखकर आप उनसे कहने लगे- ‘माता जी! बड़ी जोर की भूख लग रही है। जल्‍दी से भोजन बनाओ।’ यह कहकर आप नित्‍यानंद जी से कहने लगे- ‘श्रीपाद! चलो, जब तक हम जल्‍दी से गंगास्‍नान कर आवें और तब तक माता जी भात बना रखेंगी।’ इनकी बात सुनकर आचार्य हरिदास तथा नित्‍यानंद जी इनके साथ गंगा जी की ओर चल पड़े। चारों ने मिलकर खूब प्रेमपूर्वक स्‍नान किया। स्‍नान करने के अनन्‍तर सभी लौटकर आचार्य के घर आ गये। आचार्य के पूजा-गृह में जाकर प्रभु ने भगवान के लिये साष्‍टांग प्रणाम किया। उसी समय आचार्य प्रभु के चरणों में लोट गये।आचार्य के चरणों में हरिदास जी लोटे। इस प्रकार आचार्य को अपने चरणों में देखकर प्रभु जल्‍दी से कानों पर हाथ रखते हुए उठे और अपने दाँतों से जीभ काटते हुए कहने लगे- ‘श्रीहरि, श्रीहरि! आप यह हमारे ऊपर कैसा अपराध चढ़ा रहे हैं? हम तो आपके पुत्र के समान हैं।

भोजन तैयार था, सभी ने साथ बैठकर बड़े ही प्रेम के साथ भोजन किया। रात्रिभर नित्‍यानंद जी के सहित प्रभु ने आचार्य के घर पर ही निवास किया। दूसरे दिन आप गंगा को पार करके उस पार कालना नामक स्‍थान में पहुँचे। वहाँ पर परम वैष्‍णव गौरीदास जी धरवार छोड़कर एकांत में गंगा जी के किनारे रहकर भजन-भाव करते थे। प्रभु विचित्र वेश से उनके पास पहुँचे। प्रभु के कंधे पर नाव खेने का एक डांड़ रखा हुआ था, वे मल्‍लाओं की तरह हिलते-हिलते गौरीदास जी के समीप पहुँचे। गौरीदास जी ने प्रभु की प्रशंसा तो बहुत दिनों से सुन रखी थी; किंतु उन्‍हें प्रभु के दर्शनों का सौभाग्‍य अभी तक नहीं प्राप्‍त हुआ था। प्रभु का परिचय पाकर उन्‍होंने इनकी पूजा की और अन्‍य सामग्रियों से उनका सत्‍कार किया। प्रभु ने उन्‍हें वह डाँड़ देते हुए कहा- ‘आप इसके द्वारा संसार सागर में डूबे हुए लोगों का उद्धार कीजिये और उन्‍हें संसार सागर से पार उतारिये।’ उसे प्रभु की प्रसादी समझकर उन्‍होंने उसे सहर्ष स्‍वीकार किया। उनके परलोगमन के अनन्‍तर उस डाँड़ के अधिपति उनके पट्टशिष्‍य-श्रीहृदय चैतन्य महाराज हुए। उन्‍होंने उस डांड़ की बड़ी महिमा बढ़ायी उनके उत्‍तराधिकारी महात्‍मा श्री श्‍यामानंद जी ने तो सम्‍पूर्ण उड़ीसा प्रान्‍त में ही गौर-धर्म का बड़ा भारी प्रचार किया। सम्‍पूर्ण उड़ीसा-देश में जो आज गौर-धर्म का इतना अधिक प्रचार है, उसका सब श्रेय महात्‍मा श्‍यामानंद जी को ही है। उन्‍होंने लाखों उड़ीसा-प्रांत निवासियों को गौर-भक्‍त बनाकर उन्‍हें भगवन्‍नामोपदेश किया। सचमुच प्रभु-प्रदत वह डाँड़ लोगों को संसार सागर से पार उतारने का एक प्रधान कारण बन सका। कालना से चलकर प्रभु फिर नवद्वीप में ही आकर रहने लगे। आचार्य भी बीच-बीच में प्रभु के दर्शनों को नवद्वीप आते थे।

इसी प्रकार एक दिन श्रीवास पण्डित अपने घर में पितृश्राद्ध करके पितरों की प्रसन्‍नता के निमित्‍त विष्‍णु सहस्‍त्रनाम का पाठ कर रहे थे। उसी समय प्रभु वहाँ आ उपस्थित हुए। पाठ सुनते-सुनते ही प्रभु को वहाँ फिर नृसिंहावेश हो आया और वे नृसिंहवेश में आकर हुंकार देने लगे और चारों और इधर-उधर दौड़ने लगे।
क्रमशः

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