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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु की हुंकार और गर्जना को सुनकर सभी लोग भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। लोगों को भयभीत देखकर श्रीवास पण्डित ने प्रभु से भाव-संवरण करने की प्रार्थना की। श्रीवास की प्रार्थना पर प्रभु मूर्च्छित होकर गिर पड़े और थोड़ी देर में प्रकृतिस्‍थ हो गये।
एक बार वनमाली आचार्य नाम का एक कर्मकाण्‍डी की ब्राह्मण अपने पुत्र सहित प्रभु के पास आया और उनके पादपद्मों में प्रणाम करके उसने अपनी निष्‍कृति का उपाय पूछा। प्रभु ने उसके ऊपर कृपा प्रदर्शित करते कहा- ‘इस कलिकाल में कर्मकाण्‍ड की क्रियाओं का सांगोपांग होना बड़ा दुस्‍साध्‍य है। अन्‍य युगों की भाँति इस युग में द्रव्‍य-शुद्धि, शरीरशुद्धि बन ही नहीं सकती। इसलिये इस युग में तो बस, एकमात्र भगवन्‍नाम ही आधार है।’ जैसा कि सभी शास्‍त्रों में बताया गया है-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्‍त्‍येव नास्‍त्‍येव नास्‍त्‍येव गतिरन्‍यथा।

प्रभु के उपदेशानुसार वह कर्मकाण्‍डी ब्राह्मण परम भागवत वैष्‍णव बन गया।
एक दिन प्रभु विष्‍णु-मण्‍ड पर बैठकर बलदेव जी के आवेश में आकर ‘मधु लाओ, मधु लाओ’ इस प्रकार कहने लगे। नित्‍यानंद जी समझ गये कि प्रभु को बलदेव जी का आवेश हो आया है, इसलिये उन्‍होंने एक घड़ा गंगाजल लाकर प्रभु के सम्‍मुख रख दिया। जल पीकर प्रभु जोरों के साथ नृत्‍य करने लगे और जिस प्रकार बलदेव जी ने यमुनाकर्षण-लीला की थी, उसी का अभिनय करने लगे। उस समय वनमाली आचार्य को प्रभु के हाथ में सोने के हल और लांगल दिखायी देने लगे। चन्‍द्रशेखर आचार्य को प्रभु बलराम के रूप में दीखने लगे।
इस प्रकार प्रभु अपने अन्‍तरंग भक्‍तों को भाँति-भाँति की अलौकिक और प्रेममय लीलाएँ दिखाने लगे।

भगवत्-भजन में बाधक भाव…..

भगवन्‍नाम सभी प्रकार के सुखों को देने वाला है। इसमें अधिकारी-अनधिकारी का कोई भी भेद-भाव नहीं। सभी वर्ण के, सभी जाति के, सभी प्रकार के स्‍त्री-पुरुष भगवन्‍नाम का सहारा लेकर भगवान के पाद्पद्मों तक पहुँच सकतें हैं। देख, काल, स्‍थान, विधि तथा पात्रापात्र का भगवन्‍नाम में कोई नियम नहीं। सभी देशों में, सभी समय में, सभी स्‍थानों में शुद्ध-अशुद्ध कैसी भी अवस्‍था में हो, चाहे भले ही जप करने वाला बड़ा भारी दुराचारी ही क्‍यों न हो, भगवन्‍नाम में इन बातों का भेदभाव नहीं। नाम-जप तो सभी को, सभी अवस्‍थाओं में कल्‍याणकारी ही है। फिर भी भगवन्‍नाम में दस बड़े भारी अपराध बताये गये हैं। पूर्वजन्‍मों के शुभकर्मों से, महात्‍माओं के सत्‍संग से अथवा भगवत्‍कृपा से जिसकी भगवन्‍नाम में निष्‍ठा जग गयी हो, उसे बड़ी सावधानी के साथ इन दस अपराधों से बचे रहना चाहिये।

महाप्रभु अपने सभी भक्तों को नामापराध से बचे रहने का सदा उपदेश करते रहते थे। वे भक्तों की सदा देख-रेख रखते। किसी भी भक्त को किसी की निंदा करते देखते, तभी उसे सचेत करके कहने लगते- ‘देखो, तुम भूल कर रहे हो। भगवद्भजन में दूसरों की निंदा करना तथा भक्तों के प्रति द्वेष के भाव रखना महान पाप है। जो अभक्त हैं, उनकी उपेक्षा करो, उनके संबंध में कुछ सोचो ही नहीं। उनसे अपना संबंध ही मत रखो और जो भगवद्भक्त हैं, उनकी चरण-रज को सदा अपने सिर का आभूषण समझो। उसे अपने शरीर का सुंदर सुगन्धित अंगराग समझकर सदा भक्तिपूर्वक शरीर में मला करो।’ इसीलिये प्रभु के भक्तों में आपस में बड़ा ही भारी स्‍नेह था। भक्त एक-दूसरे को देखते ही आपस में लिपट जाते। कोई किसी के पैरों को ही पकड़ लेता, कोई किसी की चरण-धूलि को ही अपने मस्‍तक पर मलने लगता और कोई भक्त को दूर से ही देखकर धूलि में लोटकर साष्‍टांग प्रणाम ही करने लगता। भक्तों की शिक्षा के निमित्त वे भगवन्‍नामापराध की बड़ी भारी भर्त्‍सना करते और जब तक जिसके समीप वह अपराध हुआ है, उसके समीप क्षमा न करा लेते तब तक उस अपराधी के अपराध को क्षमा हुआ ही नहीं समझते थे।

गोपाल चापाल ने श्रीवास पण्डित का अपराध किया था, इसी कारण उसके सम्‍पूर्ण शरीर मे गलित कुष्‍ठ हो गया था, वह अपने दु:ख से दु:खी होकर प्रभु ने शरणापन्‍न हुआ और अपने अपराध को स्‍वीकार करते हुए उसने क्षमा-याचना के लिये प्रार्थना की। प्रभु ने स्‍पष्‍ट कह दिया- ‘इसकी एक ही ओषधि है, जिन श्रीवास पण्डित का तुमने अपराध किया है, उन्‍हीं के चरणोदक को पान करो तो तुम्‍हारा अपराध क्षमा हो सकता है। मुझमें वैष्‍णवापराधी को क्षमा करने की सामर्थ्‍य नहीं है।’ गोपाल चापाल ने ऐसा ही किया। श्रीवास के चरणोदक को निष्‍कपट भाव से प्रेमपूर्वक पीने ही से उसका कुष्‍ठ चला गया।
नामापराधी चाहे कोई भी हो प्रभु उसी को यथोचित दण्‍ड देते और अधिकारी हुआ तो उसका प्रायश्चित्त भी बताते थे। यहाँ तक कि अपनी श्रीशची देवी के अपराध को भी उन्‍होंने क्षमा नहीं किया और जब तक जिनका अपराध हुआ था, उनसे क्षमा नहीं करा ली तब तक उन पर कृपा ही नहीं की।

बात यह थी कि महाप्रभु के ज्‍येष्‍ठ भ्राता विश्‍वरूपी अद्वैताचार्य जी के ही पास पढ़ा करते थे। वे आचार्य को ही अपना सर्वस्‍व समझते और सदा उनके ही समीप बने रहते थे, केवल रोटी खाने भर के लिये घर जाते थे। अद्वैताचार्य उन्‍हें ‘योगवासिष्‍ठ’ पढ़ाया करते थे। वे बाल्‍याकाल से ही सुशील, सदाचारी, मेधावी तथा संसारी विषयों से एकदम विरक्‍त थे। योगवासिष्‍ठ के श्रवणमात्र से उनके हृदय का छिपा हुआ त्‍याग-वैराग्‍य एक दम उभड़ पड़ा और वे सर्वस्‍व त्‍यागकर परिव्राजक बन गये। अपने सर्वगुणसम्‍पन्‍न प्रिय पुत्र को असमय में गृह त्‍यागकर सदा के लिये चले जाने के कारण माता को अपार दु:ख हुआ और उसने विश्‍वरूप के वैराग्‍य का मूल कारण अद्वैताचार्य को ही समझा। वात्‍सल्‍य प्रेम के कारण भूली हूई भोली-भाली माता ने सोचा- ‘अद्वैताचार्य ने ही ज्ञान की पोथी पढ़ा-पढ़ाकर मेरे प्राण प्‍यारे पुत्र को परिव्राजक बना दिया।’ जब माता बहुत रुदन करने लगी और अद्वैताचार्य जी के समीप भाँति-भाँति का विलाप करने लगी, तब अद्वैताचार्य जी ने यों ही बातों-ही-बातों में समझाते हुए कह दिया था- ‘शोक करने की क्‍या बात है।विश्‍वरूप ने कोई बुरा काम थोड़े ही किया है, उसने तो अपने इस शुभ काम में अपने कुल की आगे-पीछे की 21 पीढ़ियों को तार दिया। हम तो समझते हैं पढ़ना-लिखना उसी का सार्थक हुआ।
क्रमशः

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