cc108

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
108-

दर्शनार्थी बिना आये रहेंगे नहीं और यहाँ आने पर सभी को शारीरिक कष्ट होता है। इसलिये आप हम लोगों का ही खयाल करके इस स्थान को त्याग दीजिये।’
हरिदासजी ने सबके आग्रह करने पर उस स्थान को छोड़ना मंजूर कर लिया और उन लोगों को आश्वासन देते हुए कहा- ‘आप लोगों को मेरे कारण कष्ट हो, यह मैं नहीं चाहता। यदि कल तक सर्प यहाँ से चला नहीं गया तो मैं कल शाम को ही इस स्थान का परित्याग कर दूँगा। कल या तो यहाँ सर्प ही रहेगा या मैं ही रहूँगा, अब दोनों साथ-ही-साथ यहाँ नहीं रह सकते।’

इनके ऐसे निश्चय को सुनकर लोगों को बड़ा भारी आनन्द हुआ और सभी अपने-अपने स्थानों को चले गये। दूसरे दिन बहुत-से भक्त एकत्रित होकर हरिदास जी के समीप श्रीकृष्ण-कीर्तन कर रहे थे कि उसी समय सब लोगों को उस अँधेरे स्थान में बड़ा भारी प्रकाश-सा मालूम पड़ा। सभी भक्त आश्चर्य के साथ उस प्रकाश की ओर देखने लगे। सभी ने देखा कि एक चित्र-विचित्र रंगों का बड़ा भारी सर्प वहाँ से निकलकर गंगाजी की ओर जा रहा है। उसके मस्तक पर एक बड़ी-सी मणि जड़ी हुई है। उसी का इतना तेज प्रकाश है। सभी ने उस भयंकर सर्प को देखकर आश्चर्य प्रकट किया। सर्प धीरे-धीरे गंगा जी के किनारे-किनारे बहुत दूर चला गया। उस दिन से आश्रम में आने वाले किसी भी दर्शनार्थी के शरीर में खुजली नहीं हुई।

भक्तों का ऐसा ही प्रभाव होता है, उनके प्रभाव के सामने अजगर तो क्या, कालकूट को हजम करने वाले देवाधिदेव महादेव जी तक भी भय खाते हैं। यह सब भगवान की भक्ति का ही माहात्म्य है।

इस प्रकार महात्मा हरिदास जी फुलिया में रहते हुए श्रीभागीरथी का सेवन करते हुए आचार्य अद्वैत के सत्संग का निरन्तर आनन्द लूटते रहे।

अद्वैताचार्य ही इनके गुरु, पिता, आश्रयदाता अथवा सर्वस्व थे। उनके ऊपर इनकी बड़ी भारी भक्ति थी। जिस दिन महाप्रभु का जन्म नवद्वीप में हुआ था, उस दिन आचार्य के साथ ये आनन्द में विभोर होकर नृत्य कर रहे थे। आचार्य का कहना था कि ये जगन्नाथतनय कालान्तर में गौरांग रूप से जनोद्धार तथा सम्पूर्ण देश में श्रीकृष्ण-कीर्तन का प्रचार करेंगे। आचार्य के वचनों पर हरिदास जी को पूर्ण विश्वास था, इसलिये वे भी गौरांग के प्रकाश की प्रतीक्षा में निरन्तर श्रीकृष्ण-संकीर्तन करते हुए कालयापन करने लगे।
उस समय सप्तग्राम में हिरण्य और गोवर्धन मजूमदार नामक दो धनिक जमींदार भाई निवास करते थे। उनके कुलपुरोहित परम वैष्णव शास्त्रवेत्ता पं. बलराम आचार्य थे। आचार्य महाशय वैष्णवों का बड़ा ही आदर-सत्कार किया करते थे। आचार्य महाशय वैष्णवों का बड़ा ही आदर-सत्कार किया करते थे। अद्वैताचार्य जी से उनकी अत्यन्त ही घनिष्ठता थी। दोनों ही विद्वान थे, कुलीन थे, भगवद्भक्त और देशकाल के मर्मज्ञ थे, इसी कारण हरिदास जी भी कभी-कभी सप्तग्राम में जाकर बलराम आचार्य के यहाँ रहते थे। आचार्य इनकी नाम-निष्ठा और भगवद्भक्ति देखकर बड़े ही प्रसन्न होते और सदा इन्हें पुत्र की भाँति प्यार किया करते थे। गोवर्धन मजूमदार के पुत्र रघुनाथदास जब पढ़ने के लिये आचार्य के यहाँ आते थे, तो हरिदास जी को सदा नाम-जप करते ही पाते। इसीलिये वे मन-ही-मन इनके प्रति बड़ी श्रद्धा रखने लगे। एक दिन आचार्य इन्हें मजूमदार की सभा में ले गये। मजूमदार महाशय अपने कुलगुरु के चरणों में अत्यन्त ही श्रद्धा रखते थे, वैष्णव भक्तों का भी यथेष्ठ आदर करते थे। अपने कुलगुरु के साथ हरिदास जी को आया देखकर हिरण्य और गोवर्धन दोनों भाइयों ने आचार्य के सहित हरिदास जी की उठकर अभ्यर्चना की और शिष्टाचार प्रदर्शित करते हुए उन्हें बैठने के लिये सुन्दर आसन दिया। हरिदास जी बिना रुके जोरों से इसी मन्त्र का जप कर रहे थे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

सभी-के-सभी लोग सम्भ्रम-भाव से इन्हीं की ओर एकटक-भाव से देख रहे थे। इनके निरन्तर के नाम-जप को देखकर उन दोनों जमींदार भाइयों को इनके प्रति स्वाभाविक ही बड़ी भारी श्रद्धा हो गयी। उनके दरबार में बहुत-से और भी पण्डित बैठे हुए थे। भगवन्नाम-जप का प्रसंग आने पर पण्डितों ने नम्रता के साथ पूछा- ‘भगवन्नाम- जप का अन्तिम फल क्या है? इससे किस प्रकार की सुख की प्राप्ति होती है? क्या हरि-नाम-स्मरण से सभी दुःखों का अत्यन्ताभाव हो सकता है? क्या केवल नाम-जप से ही मोक्ष मिल सकता है?’

हरिदास जी ने नम्रतापूर्वक हाथ जोड़े हुए पण्डितों को उत्तर दिया- ‘महानुभावो! आप शास्त्रज्ञ हैं, धर्म के मर्म को भलीभाँति जानते हैं। आपने सभी ग्रन्थों तथा वैष्णव-शास्त्रों का अध्ययन किया है। मैं आपके सामने कह ही क्या सकता हूँ, किंतु भगवन्नाम के माहात्म्य से आत्मा में सुख मिलता है, इसीलिये कुछ कहने का साहस करता हूँ।

भगवन्नाम का सर्वश्रेष्ठ फल यही है कि इसके जप से हृदय में एक प्रकार की अपूर्व प्रसन्नता प्रकट होती है, उस प्रसन्नताजन्य सुख का आस्वादन करते रहना ही भगवन्नाम का सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्तम फल है। भगवन्नाम का जप करने वाला साधक मोक्ष या दुःखों के अत्यन्ताभाव की इच्छा ही नहीं करता। वह सगुण-निर्गुण दोनों के ही चक्कर से दूर रहता है। उसका तो अन्तिम ध्येय भगवन्नाम का जप ही होता है। कहीं भी रहें, कैसी भी परिस्थिति में रहें, कोई भी योनि मिले, निरन्तर भगवन्नाम का स्मरण बना रहे। क्षणभर को भी भगवन्नाम से पृथक न हो। यही नाम-जप के साधक का अन्तिम लक्ष्य है। भगवन्नाम के साधक का साध्य और साधन भगवन्नाम ही है। भगवन्नाम से वह किसी अन्य प्रकार के फल की इच्छा नहीं रखता। मैं तो इतना ही जानता हूँ, इससे अधिक यदि आप कुछ और जानते हों तो मुझे बतावें।’
इनकी ऐसी युक्तियुक्त और सारगर्भित मधुर वाणी को सुनकर सभी को परम प्रसन्नता हुई। उसी सभा में गोपालचन्द्र चक्रवर्ती नाम का इन्हीं जमींदार का एक कर्मचारी बैठा था। वह बड़ा तार्किक था, उसने हरिदास की बात का खण्डन करते हुए कहा- ‘ये तो सब भावुकता की बातें हैं, जो पढ़-लिख नहीं सकते, वे ही इस प्रकार जोरों से नाम लेते फिरते हैं। यथार्थ ज्ञान तो शास्त्रों के अध्ययन से ही होता है।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90