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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इस बात को सुनकर आचार्य ने प्रभु के चरणों में बार-बार प्रणाम किया।
अब भक्तों ने भगवदावेश में आसन पर बैठे हुए प्रभु की संध्या-आरती का आयोजन किया। एक बहुत बड़ी आरती सजायी गयी। भक्त अपने हाथों से शंख, घडि़याल, झाँझ तथा अन्य भाँति-भाँति के व बजाने लगे। श्रीवास पण्डित ने शचीमाता के हाथ में आरती देकर उनसे आरती करने को कहा। श्रीवास की पत्नी की सहायता से वृद्धा माता ने अपने काँपते हुए हाथों से प्रभु की आरती की। उस समय सभी भक्त आनन्द में उन्मत्त होकर वाद्य बजा रहे थे। जैसे-तैसे आरती समाप्त की गयी। श्रीवास पण्डित ने शचीमाता को घर भेज दिया। अब सभी भक्तों के वरदान की बारी आयी। प्रायः प्रभु के सभी अन्तरंग भक्त उस समय वहाँ उपस्थित थे, किंतु उनके परम प्रिय भक्त श्रीधर वहाँ नहीं थे।
भक्त श्रीधर से तो पाठक परिचित ही होंगे। ये केला के खोल और दोना बेचने वाले वे ही भाग्यवान भक्त हैं, जिनसे प्रभु सदा छेड़खानी किया करते थे और घड़ी-दो-घड़ी तंग करके ही आधे दामों पर इनसे खोल लेते थे। केले की गहर के डंठल के नीचे केले में जो मोटी-सी डंठी शेष रह जाती है, उसी को बंगाल में खोल कहते हैं। बंगाल में उसका शाक बनता है। प्रभु के भोजनों में जब तक श्रीधर के खोल का साग नहीं होता था, तब तक उन्हें अन्य पदार्थ स्वादिष्ट ही नहीं लगते थे। केले के ऊपर जो कोमल-कोमल खोपटा होता है, उसे काट-काटकर और उसके थाल से बनाकर बहुत गरीब दूकानदार उन्हें भी बेचते हैं। उसमें स्त्रियाँ तथा पुरुष पूजन की सामग्री रखकर पूजा करने के निमित्त ले जाते हैं।
श्रीधरजी इन्हीं चीजों को बेचकर अपना जीवन निर्वाह करते थे। इनसे जो आमदनी हो जाती, उसमें से आधी से तो देवपूजन तथा गंगापूजन आदि करते और आधी से जिस किसी प्रकार पेट भरते। दिन-रात ये उच्च स्वर से हरिनाम-कीर्तन करते रहते। इसलिये इनके पास में रहने वाले मनुष्य इनसे बहुत ही नाराज रहते। उनका कहना था कि- ‘यह बूढ़ा रात्रि में किसी को सोने ही नहीं देता!’ इस गरीब दूकानदार की सभी उपेक्षा करते। कोई भी इन्हें भक्त नहीं समझता, किंतु प्रभु का इन पर हार्दिक स्नेह था। वे इनकी भगवत-भक्ति को जानते थे, इसीलिये उन्होंने भगवत-भाव में भी इन्हें स्मरण किया।श्रीधर का घर बहुत दूर नगर के दूसरे कोने पर था। सुनते ही चार-पाँच भक्त दौड़े गये। उस समय श्रीधर आनन्द में पड़े हुए श्रीहरि के मधुर नामों का संकीतन कर रहे थे। लोगों ने जाकर किवाड़ खटखटाये। ‘श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव’ कहते-कहते ही इन्होंने कहा- ‘कौन है?’
भक्तों ने जल्दी से कहा- ‘किवाड़ तो खोलो, तब स्वयं ही पता चल जायगा कि कौन है? जल्दी से किवाड़ तो खोलो।’
यह सुनकर श्रीधर ने किवाड़ खोले और बड़ी ही नम्रता के साथ भक्तों से आने का कारण पूछा। भक्तों ने जल्दी से कहा- ‘प्रभु ने तुम्हें स्मरण किया है। चलो, जल्दी चलो।’
हम दीन-हीन कंगाल को प्रभु ने स्मरण किया है, यह सुनते ही श्रीधर मारे प्रेम के बेसुध हो गये। वे हाय कहकर एकदम धड़ाम से पृथ्वी पर गिर पड़े। उन्हें शरीर की सुध-बुध भी न रही। भक्तों ने सोचा- यह तो एक नयी आफत आयी, किंतु प्रभु की आज्ञा तो पूर्ण करनी ही है, भक्तों ने मूर्च्छित श्रीधर को कंधों पर उठा लिया और उसी दशा में उन्हें प्रभु के पास लाये। श्रीधर अभी अचैतन्य-दशाही में थे, प्रभु ने अपने कोमल करकमलों से उनका स्पर्श किया।
प्रभु का स्पर्श पाते ही श्रीधर चैतन्य हो गये। श्रीधर को चैतन्य तक देखकर प्रभु उनसे कहने लगे- ‘श्रीधर! तुम हमारे रूप के दर्शन करो। तुम्हारी इतने दिनों की मनःकामना पूर्ण हुई।’ श्रीधर ने रोते-रोते प्रभु के तेजोमय रूप के दर्शन किये। फिर प्रभु ने उन्हें स्तुति करने की आज्ञा दी। श्रीधर हाथ जोड़े हुए गद्गदकण्ठ से कहने लगे- ‘मैं दीन-हीन पतित तथा लोक-बहिष्कृत अधम पुरुष भला प्रभु की क्या स्तुति कर सकता हूँ। प्रभो! मैं बड़ा ही अपराधी हूँ। आपकी यथार्थ महिमा को न समझकर मैं सदा आपसे झगड़ा ही करता रहा। आप मुझे बार-बार समझाते, किंतु माया के चक्कर में पड़ा हुआ मैं अज्ञानी आपके गूढ़ रहस्य को ठीक-ठीक न समझ सका। आज आपके यथार्थरूप के दर्शन से मेरा अज्ञानान्धकार दूर हुआ। अब मैं प्रभु के सम्मुख अपने समस्त अपराधों की क्षमा चाहता हूँ।’
प्रभु ने गद्गदकण्ठ से कहा- ‘श्रीधर! हम तुम्हारे ऊपर बहुत संतुष्ट हैं। तुम अब हमसे अपनी इच्छानुसार वर माँगो! ऋद्धि, सिद्धि, धन, दौलत, प्रभुता जिसकी तुम्हें इच्छा हो वही माँग लो। बोलो, क्या चाहते हो?’
हाथ जोड़े हुए अत्यन्त ही दीनभाव से गद्गदकण्ठस्वर में श्रीधर ने कहा- ‘प्रभो! मैंने क्या नहीं पा लिया? संसार मेरी उपेक्षा करता है। मेरे पूछने पर भी कंगाल समझकर लोग मेरी बात की अवहेलना कर देते हैं, ऐसे तुच्छ कंगाल को आपने अनुग्रह करके बुलाया और अपने देव-दुर्लभ दर्शन देकर मुझे कृतार्थ किया। अब मुझे और चाहिये ही क्या? ऋद्धि-सिद्धि को लेकर मैं करूँगा ही क्या? वह भी तो एक प्रकार की बड़ी माया ही है।’
प्रभु ने आग्रहपूर्वक कहा- ‘नहीं कुछ तो वरदान माँगो ही। ऋद्धि-सिद्धि नहीं तो जो भी तुम्हें प्रिय हो वही माँगो।’
श्रीधर ने उसी दीनता के स्वर में कहा- ‘यदि प्रभु कुछ देना ही चाहते हैं, तो यही वरदान दीजिये कि जो ब्राह्मणकुमार हमसे सदा खोल खरीदते समय झगड़ा करते रहते थे, वे सदा हमारे हृदय में विराजमान रहें।’
श्रीधर की इस निष्किंचनता और निःस्पृहता से प्रभु परम प्रसन्न हुए। श्रीधर भगवान के मुरली-मनोहर रूप के उपासक थे। वे भगवान के ‘श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव’ इन मधुर नामों का सदा संकीर्तन करते रहते थे, इसलिये उन्हें प्रभु ने श्रीकृष्ण-रूप के दर्शन कराये। प्रभु के श्रीविग्रह में अपने इष्टदेव के दर्शन करके श्रीधर कृतार्थ हुए। वे मूर्च्छित होकर गिर पड़े और भक्तों ने एक ओर लिटा दिया।
अब मुरारी गुप्त की बारी आयी। मुरारी परम धार्मिक तथा विशुद्ध वैष्णव तो थे, किंतु उन्हें तर्क-वितर्क और शास्त्रार्थ करने का कुछ व्यसन-भक्तों को भगवान के दर्शन सा था।
क्रमशः
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