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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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बहुत काल में भी बीतें, तो भी तो अन्त में हमें प्रभु-कृपा प्राप्त हो सकेगी। बस, भगवत-कृपा प्राप्त होनी चाहिये, फिर चाहे वह कभी क्यों न प्राप्त हो? इनकी ऐसी आनन्द-दशा को देखकर सभी भक्तों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ। वे इनकी ऐसी दृढ़ निष्ठा को देखकर अवाक रह गये। अन्त में प्रभु ने इन्हें प्रेमालिंगन प्रदान करते हुए कहा- ‘मुकुन्द! तुमने अपनी इस अविचल निष्ठा से मुझे खरीद लिया। सचमुच तुम परम वैष्णव हो, तुम्हारी ऐसी दृढ़ निष्ठा के कारण मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। तुम भगवत-कृपा के सर्वश्रेष्ठ अधिकारी हो। तुमने ऐसी बात कहकर मेरे आनन्द को और लक्षों गुणा बढ़ा दिया। मुकुन्द! तुम्हारे-जैसा धैर्य, तुम्हारी-जैसी उच्च निष्ठा साधारण लोगों में होनी अत्यन्त ही कठिन है। तुम भगवत-कृपा के अधिकारी बन गये। मेरे तेजोमय रूप के दर्शन करो। यह कहकर प्रभु ने उन्हें अपने तेजोमय रूप के दर्शन कराये और मुकुन्द उस अलौकिक रूप के दर्शन से मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। फिर सभी भक्तों ने अपनी-अपनी भावना के अनुसार श्यामवर्ण, मुरलीमनोहर, सीता-राम, राधा-कृष्ण, देवी-देवता तथा अन्य भगवत-रूपों के प्रभु के शरीर में दर्शन किये।

भगवद्भाव की समाप्ति....

संसार में यह नियम है, जो मनुष्‍य जितना बोझ ले जा सकता है, समझदार लोग उसके ऊपर उतना ही बोझ लादते हैं। यदि कोई अज्ञानवश किसी के ऊपर उसकी शक्ति से अधिक बोझ लाद दे तो या तो वह उस बोझ को बीच में ही गिरा देगा या उससे मूर्च्छित होकर स्‍वयं ही भूमि पर गिर पड़ेगा। इस प्रकार भगवान अपने सम्‍पूर्ण तेज अथवा प्रेम को कहीं भी प्रकट नहीं करते। जहाँ जैसा अधिकारी देखते हैं वहाँ वैसा ही अपना रुप बना लेते हैं। भगवान के तेज की तो बात ही दूसरी है, मनुष्‍यों में जो सदाचारी, तपस्‍वी, कर्मनिष्‍ठ, संयमी, सच्चरित्र तथा तेजस्‍वी पुरुष होते हैं उनके सामने भी क्षुद्र प्रकृति के असंयमी और इन्द्रियलोलुप पुरुष अधिक देरतक बैठकर बातें नहीं कर सकते। उनके तेज के सम्‍मुख उन्‍हें अधिक देर ठहरना असह्य हो जाता है। किसी विशेष कारणवश उन्‍हें वहाँ ठहरना भी पड़े तो वह समय भार-सा मालूम पड़ता है। इसीलिये भगवान के असली तेज के दर्शन तो मायाबद्ध जीवन को इस पांचभौतिक शरीर से हो ही नहीं सकते। उन्‍हें भगवान के माया विशिष्‍ट तेज के ही दर्शन होते हैं, तभी तो भगवान ने अर्जुन को विश्‍वरूप दिखाने पर भी पीछे से संकेत कर दिया था कि यह तो रूप तुझे दिखाया था, यह भी एक प्रकार से मायिक ही है।

मायाबद्ध जीव को शुद्ध स्‍वरूप के दर्शन हो ही कैसे सकते हैं, इतने पर भी उसके पूर्ण तेज को अधिक देर सहन करने की देवताओं तक में शक्ति नही। फिर मनुष्‍यों की तो बात ही क्‍या? भक्‍तों के हृदय में एक प्रकार की अपूर्व ज्‍योति निरंतर जलती रहती है, किंतु प्रत्‍यक्षरूप से उन्‍हें भी अधिक कालतक भगवान का तेजोमय स्‍वरूप असह्य हो जाता है। हां, मधुर भाव से तो वे निरंतर अपने प्रियतम के साथ क्रीड़ा करते ही रहते हैं। वह भाव दसरा है, उसमें तेज, ऐश्‍वर्य तथा महत्ता का अभाव होता है। उसके बिना तो भक्‍त जी ही नहीं सकते। वह मधुर भाव ही भक्‍तों को सर्वस्‍व है। उच्‍च भक्‍त तो ऐश्‍वर्य अथवा तेजोमय रूप के दर्शनों की इच्‍छा ही नहीं करते। भगवत-इच्‍छा से कभी स्‍वत: ही हो जाय तो यह बात दूसरी है।
प्रभु को भगवत-भाव में पूरे सात प्रहर बीत गये। दिन गया, रात्रि का भी अंत होने को आया, किंतु प्रभु के तेज अथवा ऐश्‍वर्य में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं दिखायी दिया। भक्‍त ज्‍यों-के-त्‍यों बैठे थे, न तो कोई कहीं अन्‍यत्र भोजन करने गया और न कोई पैर फैलाकर सोया। चारों ओर से प्रभु को घेरे हुए बैठे ही रहे। रात्रि के अंत होने पर प्रभात का समय हो गया। अद्वैतचार्य ने देखा सभी भक्‍त घबड़ाये हुए- से हैं। वे अब अधिक देर तक प्रभु के अलौकिक तेज को सहन नहीं कर सकते। अत: उन्‍होंने श्रीवास पण्डित के कान में कहा- ‘हम साधारण संसारी लोग प्रभु के इस असह्य तेज को और अधिक देर तक सहन करने में असमर्थ हैं, अत: कोई ऐसा उपाय करना चाहिये जिससे प्रभु के इस भाव को शमन हो जाय।’
श्रीवास पण्डित को अद्वैताचार्य की सम्‍मति बहुत युक्तियुक्‍त प्रतीत हुई। उनकी बात का समर्थन करते हुए वे बोले- ‘हाँ, आप ठीक कहते हैं। इस ऐश्‍वर्यमय रूप की अपेक्षा तो हमें गौररूप की प्रिय है। हम सभी मिलकर प्रभु से प्रार्थना करें कि प्रभो! अब इस अपने अद्भुत अलौकिक भाव को संवरण कीजिये ओर हम लोगों को फिर उसी गौररुप से दर्शन दीजिये।’ श्रीवास जी की यह बात सभी को पसंद आयी और सभी हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे- ‘प्रभो! अब अपने इस ऐश्‍वर्य को अप्रकट कर लीजिये। इस तेज से हम संसारी जीव जल जायँगे। हममें इसे अधिक काल सहन करने की शक्ति नहीं है। अब हमें अपना वही असली गौररूप दिखाइये। ‘भक्तों की ऐसी प्रार्थना सुनकर प्रभु ने बड़े जोर के साथ एक हुंकार मारी। हुंकार मारते ही उन्‍हें एकदम मूर्छा आ गयी और मूर्छा आने पर यह कहते हुए कि ‘अच्‍छा तो लो अब हम जाते हैं’ अचेतन होकर सिंहासन पर से भूमिपर गिर पड़े। भक्तों ने जल्‍दी से उठाकर प्रभु को एक सुंदर से आसन पर लिटाया, प्रभु मूर्च्छित दशा में ज्‍यों–के-त्‍यों ही पड़े रहे। तनिक भी इधर-उधर को नहीं हिले-डुले।   प्रभु को मुर्छित देखकर सभी भक्‍त विविध भाँति के उपचार करने लगे। कोई पंखा लेकर प्रभु को वायु करने लगे। सुगंधित तैल अथवा शीतल लेप प्रभु के मस्तक पर लेपन करने लगे, किंतु प्रभु की मूर्छा भंग नहीं हुई। प्रभु की परीक्षा के निमित्त अद्वैत और श्रीवास आदि प्रमुख भक्तों ने प्रभु ने प्रभु के सम्‍पूर्ण शरीर की परीक्षा की। उनकी नासिका के सामने बहुत देरतक हाथ रखे रहे, किंतु सांस बिलकुल चलता हुआ मालूम नहीं पड़ता था। हाथ-पैर तथा शरीर के सभी अंग-प्रत्‍यंग संज्ञाशून्‍य-से बने हुए थे। जिस अंग को जैसे भी डाल देते, वह वैसे ही पड़ा रहता, किसी प्रकार की चैतन्‍यपने की चेष्‍टा किसी भी अंग से प्रतीत नहीं होती थी।
क्रमशः

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