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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु की ऐसी दशा देखकर सभी भक्तों को बड़ा भारी भय-सा प्रतीत होने लगा।
वे बार-बार प्रभु के इस वाक्य को स्मरण करने लगे- ‘अच्छा तो लो अब हम जाते हैं।’ बहुत-से तो इससे अनुमान लगाने लगे कि प्रभु सचमुच हमें छोड़कर चले गये। बहुत-से कहने लगे- ‘यह बात नहीं, वह तो प्रभु के ऐश्वर्य और तेज के संबंध का भाव था, हमारे गौरहरि तो थोड़ी देर में चैतन्य लाभ कर लेंगे। किंतु उनका यह अनुमान ठीक होता दिखायी नहीं देता था, प्रात:काल से प्रतीक्षा करते-करते दोपहर हो गया, किंतु प्रभु की दशा में कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ। वे उसी भाँति संज्ञाशून्य पड़े रहे।
ज्येष्ठ का महीना था, भक्तों को बैठे-बैठे तीस घंटे हो गये। प्रभु की दशा देखकर सभी व्याकुल हो रहे थे। सभी उसी भाव से प्रभु को घेरे हुए बैठे थे, न कोई शौच-स्नान को गया और न किसी को भूख-प्यास की सुधि रही, सभी प्रभु के भाव में अधीर हुए चुपचाप बैठे थे। बहुतों ने तो निश्चय कर लिया था कि यदि प्रभु को चेतना लाभ न हुई तो हम भी यहीं बिना खाये-पीये प्राण त्याग देंगे। इसी उद्देश्य वे बिना रोये-पीटे धैर्य के साथ प्रभु के चारों ओर बैठे थे। कल प्रात:काल श्रीवास पण्डित के घर के किवाड़ जो बंद किये गये थे, वे ज्यों-के-त्यों बंद ही थे, प्रात:काल कोई भी निकलकर बाहर नहीं गया। इस घटना की सूचना शचीमाता को भी देना उचित नहीं समझा गया। क्योंकि वहाँ तो प्राय: सब-के-सब अपने-अपने प्राणों की बाजी लगाये हुए बैठे थे। इसी बीच एक भक्त ने कहा- ‘अनेकों बार जब प्रभु मूर्च्छित हुए हैं, तो संकीर्तन की सुमधुर ध्वनि सुनकर ही सचेत हुए हैं। क्यों नहीं प्रभु को चैतन्यता लाभ कराने के निमित्त संकीर्तन किया जाय।’ यह बात सभी को पसंद आयी और सभी ओर से प्रभु को घेरकर संकीर्तन करने लगे। सभी भक्त अपने कोमल कण्ठों से करुणामिश्रित स्वर तालस्वर के साथ-वाद्य बजाकर-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
इस महामंत्र का संकीर्तन करने लगे। संकीर्तन की नवजीवन-संचारी प्राणों से भी प्यारी धुनि को सुनकर प्रभु के शरीर में रोमांच-से होने लगे। सभी को प्रभु का शरीर पुलकित-सा प्रतीत होने लगा। अब तो भक्तों के आनंद की सीमा नहीं रही। वे नाम-संकीर्तन छोड़कर प्रेम में विह्वल हुए पद-संकीर्तन करने लगे। प्रभु के शरीर की पुन: परीक्षा करने के निमित्त अद्वैताचार्य ने उनकी नासिका पर अपना हाथ रखा। उन्हें श्वासों का गमनागमन प्रत्यक्ष प्रतीत होने लगा। इतने में ही प्रभु ने एक जोर की हुंकार मारी। हुंकार को सुनते ही भक्तों की विषण्ण मण्डली में आनंद की बाढ़-सी आ गयी। वे उन्मत्तभाव से जोरों की जय-ध्वनि करने लगे। आकाशव्यापी तुमुल ध्वनि के कारण दिशाएं गूंजने लगीं।भक्तोंके पदाघात से पृथ्वी हिलने लगी, वायु स्थिर-सी प्रतीत होने लगी। चारों ओर प्रसन्नता-ही-प्रसन्नता छा गयी। प्रेम में उन्मत्त होकर कोई नृत्य करने लगा, कोई आनंद के वेग को न सह सकने के कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। कोई शंख बजाने लगा, कोई शीतल जल लेकर प्रभु के श्रीमुख में धीरे-धीरे डालने लगा। इस प्रकार श्रीवास जी का सम्पूर्ण घर उस समय आनंद का तरंगित सागर ही बन गया। जिसमें भक्तों की प्रसन्नता की हिलोरें उठ-उठकर दिशाओं को गुँजाती हुई भीषण शब्द कर रही थीं।
थोड़ी ही देर के अनन्तर प्रभु आँखें मलते हुए निद्रा से जागे हुए मनुष्य की भाँति उठे और अपने चारों ओर भक्तों को एकचित और बहुत-सी अभिषेक की सामग्रियो को पड़ी हुई देखकर आश्चर्य के साथ पूछने लगे-‘हैं, यह क्या है? हम कहाँ आ गये? आप सब लोग यहाँ क्यों एकत्रित हैं? आप सब लोग इस प्रकार विचित्र भाव से यहाँ क्यों बैठे हुए हैं?’
प्रभु के इस प्रश्नों को सुनकर भक्त एक-दूसरे की ओर देखकर मुसकराने लगे। प्रभु के इन प्रश्नों का किसी ने भी कुछ उत्तर नहीं दिया। इसपर प्रभु ने श्रीवास पण्डित को संबोधन करके पूछा- ‘पण्डित जी! बताइये न, असली बात क्या है? हमसे कोई चंचलता तो नहीं हो गयी, अचेतनावस्था में हमसे कोई अपराध तो नहीं बन गया? मामला क्या है, ठीक-ठीक बताते क्यों नहीं?’
अपनी हंसी को रोकते हुए श्रीवास पण्डित कहने लगे- ‘अब हमें बहकाइये नहीं। बहुत बनने की चेष्टा न कीजिये। अब यहाँ कोई बहकने वाला नहीं है।‘
प्रभु ने दुगुना आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा- ‘कैसा बहकाना, बताते क्यों नहीं? बात क्या है?’
इस पर बात को टालते हुए श्रीवास जी ने कहा-‘कुछ नहीं, आप संकीर्तन में अचेत हो गये थे, इसलिये आपको चैतन्य लाभ कराने के निमित्त सभी भक्त मिलकर कीर्तन कर रहे थे।‘
इस बात को सुनकर कुछ लज्जित होते हुए प्रभु ने कहा- ‘अच्छा, तो ठीक है। आप लोगों को हमारे कारण बड़ा कष्ट हुआ। आप सभी लोग हमें क्षमा करें। बहुत समय बीत गया। अब चलकर स्नान-संध्या-वन्दन करना चाहिये। मालूम होता है अभी प्रात:काल संध्या भी नहीं हुई।’ यह सुनकर सभी भक्त स्नान-संध्या के निमित्त गंगा जी की ओर चले गये।
प्रेमोन्मत्त अवधूत का पादोदकपान...
जिन्हें भगवत-भक्ति की प्राप्ति हो गयी है, जो प्रभु-प्रेम में मतवाले बन गये हैं, उनके सभी कर्म लोक-बाह्य हो जाते हैं। जो क्रिया किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये की जाती है, उसे कर्म कहते हैं, किंतु वैसे ही निरुद्देश्यरूप से केवल करने के ही निमित्त जो चेष्टाएँ या क्रियाएँ होती हैं, उन्हें लीला कहते हैं। बालकों की सभी चेष्टाएँ ऐसी ही होती हैं, उनमें कोई इन्द्रिय-जन्य सुख-स्वार्थ या कोई उद्देश्य नहीं होता। वे तो वैसे ही निरुद्देश्य भाव से होती हैं। भक्तों की सभी चेष्टाएं इसी प्रकार की होती हैं, इसीलिये उन्हें कर्म न कहकर लीला ही कहने की प्राचीन परिपाटी चली आयी है। भक्तों की लीलाएं प्राय: बालको की लीलाओं से बहुत ही अधिक मिलती-जुलती हैं। जहाँ लोक-लज्जा का भय है, जहाँ किसी वस्तु के प्रति आश्लीलता के कारण घृणा के भाव हैं और जहाँ दूसरों से भय की सम्भावना है, वहाँ असली प्रेम नहीं।
क्रमशः
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