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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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उसी समय उन्‍होंने सभी भक्तों को बुला लिया। भक्‍त आ-आकर नित्‍यानंद जी के चारों बैठने लगे। प्रभु ने नित्‍यानंद जी से प्रार्थना की- ‘श्रीपाद! अपनी प्रसादी लंगोटी कृपा करके हमें प्रदान कीजिये।’ नित्‍यानंद जी ने जल्‍दी से सिरपर लंगोटी खोलकर फेंक दी। प्रभु ने वह लंगोटी अत्‍यंत ही भक्तिभाव के साथ सिरपर चढ़ायी और फिर उसके छोटे-छोटे बहुत-से टुकड़े किये। सभी भक्‍तों को एक-एक टुकड़ा देते हुए प्रभु ने कहा- ‘इस प्रसादी चीर को आप सभी लोग खूब सुरक्षित रखना।' प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके सभी ने उस प्रसादी चीर को गले में बांध लिया, किसी-किसी ने उसे मस्‍तक पर रख लिया।
इसके अनन्‍तर प्रभु ने निताई के पादपद्मों में स्‍वयं ही सुगंधित चंदन का लेप किया, पुष्‍प चढ़ाये और उनके चरणों को अपने हाथों से पखारा। निताई का पादोदक सभी भक्‍तों को वितरित किया गया। सभी ने बड़ी श्रद्धा-भक्ति के साथ उसका पान किया। शेष जो बचा उन सबको प्रभु पान कर गये और पान करते हुए बोले- ‘आज हम कृतकृत्‍य हुए। आज हमारा जन्‍म सफल हुआ। आज हमें यथार्थ श्रीकृष्‍ण-भक्ति की प्राप्ति हुई। श्रीपाद के चरणामृतपान से आज हम धन्‍य हुए।'

इस प्रकार सभी भक्‍तों ने अपने-अपने भाग्‍य की सराहना की। भाग्‍य की सराहना तो करनी ही चाहिये, भगवान की यथार्थ पूजा तो आज की हुई। भगवान अपनी पूजा से उतने संतुष्‍ट नहीं होते, जितने अपने भक्‍तों की पूजा से संतुष्‍ट होते हैं। उनका तो कथन है, जो केवल मेरे ही भक्‍त हैं, वे तो भक्‍त ही नहीं, यथार्थ भक्‍त तो वही है जो मेरे भक्‍तों का भक्त हो। भगवान स्‍वयं कहते हैं-
 
ये मे भक्‍तजना: पार्थ न मे भक्‍ताश्‍च ते जना:।
मद्भक्‍तानां च ये भक्‍तास्‍ते में भक्‍ततमा मता:।
क्‍योंकि भगवान् को तो भक्‍त ही अत्‍यंत प्रिय है। जो उनके प्रियजनों की अवहेलना करके केवल उन्‍हीं का पूजन करेंगे वे उन्‍हें किसी प्रकार हो सकेंगे? इसलिये सब प्रकार के आराधनों से विष्‍णुभगवान् का आराधन श्रेष्‍ठ जरूर है, किंतु विष्‍णुभगवान् के आराधन से भी श्रेष्‍ठ विष्‍ण-भक्‍तों का आराधन है।

भगवत-भक्‍तों की महिमा प्रकाशित करने के निमित्त ही प्रभु ने यह लीला की थी। सभी भक्‍तों को निताई के पादोदकपान से एक प्रकार की आंतरिक शांति-सी प्रतीत हुई।
अब निताई को कुछ-कुछ होश हुआ। वे बालकों की भाँति चारों ओर देखते हुए शचीमाता से दीनता के साथ बच्‍चों की तरह कहने लगे- ‘अम्‍मा! बड़ी भूख लगी है, कुछ खाने के लिये दो।' माता यह सुनकर जल्‍दी से भीतर गयी और घर की बनी सुदंर मिठाई लाकर इनके हाथों पर रख दी। ये बालकों की भाँति जल्‍दी-जल्‍दी कुछ खाने लगे, कुछ पृथ्‍वी पर फेंकने लगे। खाते-खाते ही वे माता के चरण छूने को दौड़े। माता डरकर जल्‍दी से घर में घुस गयी। इस प्रकार उस दिन निताई अपनी अद्भुत लीला से सभी को आनन्दित किया।

घर-घर में हरिनाम का प्रचार...

सतयुग में प्राय: सभी धर्मात्‍मा पुरुष होते थे। धर्म के कारण ठीक समय पर वर्षा होती थी, योगक्षेम की किसी को भी चिंता नहीं होती थी। देश, काल तथा खाद्य पदार्थों में पूर्णरूप से विशुद्धता विराजमान थी। उस समय के लोग ध्‍यान-प्रधान होते थे। सत्‍ययुग में प्रभुप्राप्ति का मुख्‍य साधन ध्‍यान ही समझा जाता था। त्रेतायुग में भोग-सामग्रियों की प्रचुरता थी, इसलिये खूब द्रव्‍य लगाकर उस समय बड़े-बड़े यज्ञ-याग करने की ही प्रथा थी। उस समय भगवत-प्राप्ति का मुख्‍य साधन यज्ञ करना ही समझा जाता था। सकाम तथा निष्‍काम दोनों ही भावों के द्विजातिगण यथाशक्ति, यज्ञ-याग करते थे। द्वापर में भोग-सामग्रियों की न्‍यूनता हो गयी, लोगों के भाव उतने विशुद्ध नहीं रहे। देश, काल तथा खाद्य पदार्थों की सामग्रियों में भी पवित्रता का संदेह होने लगा, इसलिये उस समय का प्रधान साधन भगवत-पूजन तथा आचार-विचार ही माना गया।

कलियुग में न तो पर्याप्‍तरूप से सबके लिये भोग-सामग्री ही है और न अन्‍य युगों की भाँति खाद्य पदार्थों की प्रचुरता ही। पवित्र स्‍थान बुरे लोगों के निवास से दूषित हो गये, धर्मस्‍थान कलह के घर बन गये, लोगों के हृदयों में से धर्म के प्रति आस्‍था जाती रही। लोगों के अधर्मभाव से वायुमण्‍डल दूषित बन गया। वायुमण्‍डल के दूषित हो जाने से देशों में से पवित्रता चली गयी; काल विपरीत हो गया। सत्‍पुरुष, सत्‍शास्‍त्र तथा सत्‍संग का सर्वत्र अभाव-सा ही हो गया। ऐसे घोर समय में भलीभाँति ध्‍यान, यज्ञ-याग तथा पूजा-पाठ का होना भी सबके लिये कठिन हो गया है। इस युग में तो एक भगवन्‍नाम ही मुख्‍य है।[2] उक्‍त धार्मिक कृत्‍यों को जो लोग पवित्रता और सन्निष्‍ठा के साथ कर सकें वे भले ही करें, किंतु सर्वसाधारण के लिये सुलभ, सरल और सर्वश्रेष्‍ठ साधन भगवन्‍नाम ही है। भगवन्‍नाम की ही शरण लेकर कलिकाल में मनुष्‍य सुगमता के साथ भगवत-प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकता है। इसीलिये कलियुग के सभी महात्‍माओं ने नाम के ऊपर बहुत जोर दिया है। महाप्रभु तो नामावतार ही थे। अब तक वे भक्‍तों के ही साथ एकांत भाव से श्रीवास के घर संकीर्तन करते थे, अब उन्‍होंने सभी प्राणियोंको हरिनाम-वितरण करने का निश्‍चय किया।प्रचार का कार्य त्‍यागी महानुभाव ही कर सकते हैं। भक्तिभाव और भजन-पूजन में सभी को अधिकार है, किंतु लोगों को करने के लिये शिक्षा देना तो त्‍यागियों का ही काम है। उपदेशक या नेता तो त्‍यागी ही बन सकते हैं। भगवान बुद्ध राजा बनकर भी धर्म का संगठन कर सकते थे, शंकराचार्य-जैसे परम ज्ञानी महापुरुष को लिंगसंयास और दण्‍डधारण की क्‍या आवश्‍यकता थी? गौरांग महाप्रभु गृहस्‍थी होते हुए भी संकीर्तन का प्रचार कर सकते थे, किंतु इन सभी महानुभावों ने लोगों को उपदेशकरने के ही निमित्त संयासधर्म को स्‍वीकार किया। बिना संयासी बने लोकशिक्षण का कार्य भलीभाँति हो भी तो नहीं सकता। प्रभु के भक्‍तों में दो संयासी थे, एक तो अवधूत नित्‍यानंद और दूसरे महात्‍मा हरिदास जी। अवधूत नित्‍यानंद जी तो लिंगसंयासी थे और महात्‍मा हरिदास अलिंगसंयासी। ब्रह्मणेतर वर्ण के लिये संन्‍यास की विधि तो है, किंतु शास्त्रों में उनके लिये संन्यास के चिह्नों का विधान नहीं है, वे विदुर की भाँति अलिंगसंन्यासी बन सकते हैं या वन में वास करके वानप्रस्थधर्म का आचरण कर स‍कते हैं।
क्रमशः

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