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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इसीलिये हरिदास जी ने किसी भी प्रकार का साधुओं का-सा वेश नहीं बनाया था। प्रभुप्राप्ति के लिये किसी प्रकार का बाह्य वेश बनाने की आवश्यकता भी नहीं है। प्रभु तो अन्तर्यामी हैं, उनसे न तो भीतर के भाव ही छिपे हैं और न वे बाहरी चिह्नों को देखकर धोखा खा सकते हैं। चिह्न धारण करना तो एक प्रकार की लोक-परम्परा है।
प्रभु ने नित्यानन्द और हरिदास जी को बुलाकर कहा- ‘अब इस प्रकार एकान्त में ही संकीर्तन करते रहने से काम नहीं चलेगा। अब हमें नगर-नगर और घर-घर में हरिनाम का प्रचार करना होगा। यह काम आप लोगों के सुपुर्द किया जाता है। आप दोनों ही नवद्वीप के मुहल्ले-मुहल्ले और घर-घर में जाकर हरिनाम का प्रचार करें। लोगों से विनय करके, हाथ जोड़ तथा पैर छूकर आप लोग हरिनाम की भिक्षा मांगें। आप लोग हरिनाम-वितरण करते समय पात्रापात्र अथवा छोटे-बडे़ का कुछ भी खयाल न करें। ब्राह्मण से लेकर चाण्डालपर्यन्त, पण्डित से लेकर मूर्खतक सबको समान-भाव से हरिनाम का उपदेश करें। हरिनामके सभी प्राणी अधिकारी हैं। जो भी जिज्ञासा करे अथवा न भी करे उसी के सामने आपलोग भगवान के सुमधुर नामों का संकीर्तन करें। उससे भी संकीर्तन करने की प्रार्थना करें। जाइये, श्रीकृष्ण भगवान आपके इस कार्य में सहायक होंगे।
प्रभु का आदेश पाकर दोनों ही अवधूत परम उल्लास के सहित नवद्वीप में हरिनाम-वितरण करने के लिये चले। दोनों एक ही उद्देश्य से तथा एक ही काम के लिये साथ-ही-साथ चले थे, किंतु दोनों के स्वभाव में आकाश-पाताल का अन्तर था। नित्यानन्द का रंग गोरा था, हरिदास कुछ काले थे। नित्यानन्द लम्बे और कुछ पतले थे, हरिदास जी का शरीर कुछ स्थूल और ठिगना-सा था। हरिदास गम्भीर प्रकृति के शान्त पुरुष थे और नित्यानन्द परम उद्दण्ड और चंचल प्रकृति के। हरिदास की अवस्था कुछ ढलने लगी थी, नित्यानन्द अभी पूर्ण युवक थे।
घर-घर में हरिनाम का प्रचार....
हरिदास जी नम्रता से काम लेने वाले थे, नित्यानन्द जी किसी के बिना छेडे़ बात ही नहीं करते थे। इस प्रकार यह भिन्न प्रकृति का जोड़ नवद्वीप में नाम-वितरण करने चला। ये दोनों घर-घर जाते और वहाँ जोरों से कहते-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
लोग इन्हें भिखारी समझकर भाँति-भाँति की भिक्षा लेकर इनके समीप आते। ये कहते हम अन्न के भिखारी नहीं हैं, हम तो भगवन्नाम के भिखारी हैं। आप लोग एक बार अपने मुख से श्रीहरि के-
श्रीकृष्ण! गोविंद! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!
इन सुमधुर नामों का उच्चारण करके हमारे हृदयों को शीतल कीजिये, यही हमारे लिये परम भिक्षा है। लोग इनके इस प्रकार के मार्मिक वाक्यों को सुनकर प्राभावान्वित हो जाते और उच्च स्वर से सभी मिलकर हरि नामों का संकीर्तन करने लगते। इस प्रकार ये एक द्वार से दूसरे द्वार पर जाने लगे। ये जहाँ भी जाते, लोगों की एक बड़ी भीड़ इनके साथ हो लेती और ये सभी से उच्च स्वर से हरिकीर्तन करने को कहते। सभी लोग मिलकर इनके पीछे नाम-संकीर्तन करते जाते। इस प्रकार मुहल्ले-मुहल्ले और बाजार-बाजार में चारों ओर भगवान् के सुमधुर नामों की ही गूंज सुनायी देने लगी।
नित्यानंद रास्ते चलते-चलते भी अपनी चंचलता को नहीं छोड़ते थे। कभी रास्ते में साथ चलने वाली किसी लड़के को धीरे से नोंच लेते, वहा चौंककर चारों ओर देखने लगता, तब ये हंसने लगते। कभी दो लड़कों के सिरों को सहसा पकड़कर जल्दी से उन्हें लड़ा देते। कभी बच्चों के साथ मिलकर नाचने ही लगते। छोटे-छोटे बच्चों को द्वार पर जहाँ भी खड़ा देखते उनकी ओर बंदर का-सा मुख बनाकर बंदर की तरह ‘खौ-खौ’ करके घुड़की देने लगते। बच्चा रोता हुआ अपनी माता की गोदी में दौड़ा जाता और ये आगे बढ़ जाते। कोई-कोई आकर इन्हें डांटता, किंतु इनके लिये डांटना और प्यार करना दोनों समान ही था।
उसे गुस्से में देखकर आप उपेक्षा के भाव से कहते ‘कृष्ण-कृष्ण कहो’ ‘कृष्ण-कृष्ण'’। व्यर्थ में जिह्व को क्यों कष्ट देते हो। यह कहकर अपने कोकिल-कूजित कमनीय कण्ठ से गायन करने लगते –
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
गुस्सा करने वालों का सभी रोष काफूर हो जाता और वे भी इनके साथ मिलकर तन्मयता के साथ श्रीकृष्ण का कीर्तन करने लगते। ये निर्भिक भाव से स्त्रियों में घुस जाते और उनसे कहते- ‘माताओ! मैं तुम्हारा पुत्र हूँ, पुत्र की प्रार्थना को स्वीकार कर लो। तुम एक बार भगवान का नाम-संकीर्तन करके मेरे हृदय को आनन्दित कर दो। इनकी इस प्रकार सरल, सरस और निष्कपट प्रार्थना से सभी माताओं का हृदय पसीज जाता और वे सभी मिलकर श्रीकृष्ण-कीर्तन में निमग्न हो जातीं। इस प्रकार ये प्रात:काल से लेकर सांयकाल पर्यन्त द्वार-द्वार घूमते और संकीर्तन का शुभ संदेश सभी लोगों को सुनाते। शाम को आकर प्रचार का सभी वृत्तांत प्रभु को सुनाते। इनकी सफलता की बातें सुनकर प्रभु इनके साहस की सराहना करते और इन्हें विविध भाँति से प्रोत्साहित करते। इन दोनों को ही नाम के प्रचार में बड़ा ही अधिक आनन्द आता। उसके पीछे ये खाना-पीना सभी कुछ भूल जाते।
अब तो प्रभु का यश चारों ओर फैलने लगा। दूर-दूर से लोग प्रभु के दर्शन को आते। भक्त तो इन्हें साक्षात भगवान का अवतार ही बताते, कुछ लोग इन्हें परम भागवत समझकर ही इनका आदर करते। कुछ लोग विद्वान भक्त समझते और कुछ वैसे ही इनके प्रभाव से प्रभावान्वित होकर स्तुति-पूजा करते। इस प्रकार अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार लोग विविध प्रकार से इनकी पूजा करने लगे। लोग भाँति-भाँति के उपहार तथा भेंट प्रभु के लिये लाते। प्रभु उन सबकी प्रसन्नता के निमित्त उन्हें ग्रहण कर लेते। ये घाट में, बाजार में जिधर भी निकल जाते उधर के ही लोग खड़े हो जाते और इन्हें विविध प्रकार से दण्ड-प्रणाम करने लगते। इस प्रकार ज्यों-ज्यों संकीर्तन का प्रचार होने लगा। त्यों-ही-त्यों प्रभु का यश:-सौरभ चारों ओर व्याप्त होता हुआ दृष्टिगोचर होने लगा। प्रभु सभी से नम्रतापूर्वक मिलते।
क्रमशः
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