cc123

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
123-

उनका स्‍वभाव ही ऐसा होता है कि बिना कहे ही वे दीन-दु:खियों पर दया करते रहते हैं। बिना दया किये वे रह ही नहीं सकते। जैसे कि नीतिकारों ने कहा है-

पद्माकरं दिनकरो विकचं करोति
चन्‍द्रो विकासयति कैरवचक्रवातम्।
नाभ्‍यर्थितो जलधरोअपि जलं ददाति 
सन्‍त: स्‍वयं परहितेषु कृताभियोगा:।

रात्रि के दु:ख से सिकुड़े हुए कमल मरीचिमाली भगवान भुवन-भास्‍कर के समीप अपना दुखड़ा रोने के लिये नहीं जाते, बिना कहे ही कमलबन्धु भगवान दिवाकर उनके दु:खों को दूर करके उन्हें विकसित कर देते हैं। कुमुदिनीकी लज्जा से अवगुण्ठित कलिका को कलानाथ भगवान शशधर स्वयं ही प्रस्फुटित कर देते हैं। बिना याचना के ही जल से भरे हुए मेघ अपने सम्पूर्ण जल को बरसाकर प्राणियों के दु:ख को दूर करते हैं। इसी प्रकार महान संतगण भी स्वयं ही दूसरों के उपकार के निमित्त सदा कुछ-न-कुछ उद्योग करते ही रहते हैं। परोपकार करना उनका स्वभाव ही बन जाता है। जैसे सभी प्राणी जान में, अनजान में स्वांस लेते ही रहते हैं, उसी प्रकार संत-महात्मा जो-जो भी चेष्‍टा करते हैं, वे सभी लोक-कल्याणकारी ही होती हैं।
हंसते हुए नित्यानन्दजी ने कहा- ‘आपकी ही सम्मति से तो हम गये थे। यदि आप सम्मति ने देते तो हम क्यों जाते? आप ही तो हम दोनों में बुजुर्ग हैं।'

हरिदास जी ने कुछ रोष में आकर कहा- ‘बुजुर्ग हैं पत्‍थर! मेरी सम्मति से गये थे तो वहाँ से भाग क्यों आये? तब मेरी सम्मति क्यों नहीं ली?’

जोरों से हंसते हुए नित्यानन्द जी ने कहा- ‘यदि उस समय आपकी सम्मति की प्रतीक्षा करता, तो सब मामला साफ ही हो जाता।' इस प्रकार आपस में एक-दूसरे को प्रेम के साथ ताने देते हुए ये दोनों प्रभु के निकट पहूंचे। उस समय प्रभु भक्तों के साथ बैठे श्रीकृष्‍ण-‍कथा कह रहे थे। इन दोनों प्रचारक तपस्वियों को देखकर वे प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘लो, भाई! युगल-जोड़ी आ गयी। प्रचारक-मण्‍डल के मुखिया आ गये। अब आप लोग इनके मुख से नगर-प्रचार का वृत्तान्त सुनिये।‘

प्रभु के ऐसा कहने पर हरिदास जी ने कहा- ‘प्रभो! श्रीपाद नित्यानन्द जी बड़ी चंचलता करते हैं, इन्हें आप समझा दीजिये कि थोड़ी कम चंचलता किया करें।'

प्रभु ने पूछा- ‘क्यों-क्यों? बात क्या है, क्‍या हुआ? आज कोई नयी चंचलता कर डाली क्‍या? हाँ, आज आपलोग दोनों ही बहुत थके हुए-से मालूम पड़ते हैं। सब सुनाइये।‘

प्रभु के पूछने पर हरिदास जी ने सब वृत्तांत सुनाते हुए कहा- ‘लोगों ने बार-बार उन दोनों भाइयों के पास जाने से मना किया था, किंतु ये माने ही नहीं। जब उन्‍होंने डांट लगायी, तब वहाँ से बालकों की भाँति भाग छूटे। लोग कह रहे थे, अब की‍र्तन वालों की खैर नहीं। ये राक्षस-भाई कीर्तन वालों को बंधवा मंगावेंगे। लोग परस्‍पर में ऐसी ही बातें कह रहे थे।‘
हरिदास जी की बात सुनकर हंसते हुए प्रभु ने नित्‍यानंद जी से कहा- ‘श्रीपाद! उन लोगों के समीप जाने की आपको क्‍या आवश्‍यकता थी? थोड़ी कम चंचलता किया कीजिये। ऐसा चांचल्‍य किस काम का?’

कुछ बनावटी प्रेम-कोप प्रदर्शित करते हुए नित्‍यानंद जी ने कहा- ‘इस प्रकार मुझसे आपका यह काम नहीं होने का। आप तो घर में बैठे रहते हैं, आपको नगर-प्रचार की कठिनाइयों का क्‍या पता? एक बार तो कहते हैं सभी को नाम का प्रचार करो। ब्राह्मण से चाण्‍डालपर्यंन्‍त और पापी से लेकर पुण्‍यात्‍मा तक सभी भगवन्‍नाम के अधिकारी हैं और अब कहते हैं, उनके पास क्‍यों गये? सबसे बड़े अधिकारी तो वही हैं। हम तो जन्‍म से ही घर-बार छोड़कर टुकड़े मांगते फिरते हैं, हमारा उद्धार करने में आपकी कौन-सी बड़ाई है? आपका पतित पावन नाम तो तभी सार्थक हो सकता है, जब ऐसे-ऐसे भयंकार क्रूर कर्म करने वाले पापियों का उद्धार करें। अब यों घर में बैठे रहने से काम न चलेगा। ऐसे घोर पापियों को जब तक हरि-नाम की शरण में लाकर भक्त न बनावेंगे, तब तक लोग हरि-नाम का महत्त्व ही कैसे समझ सकेंगे।'

कुछ हंसते हुए प्रभु भक्तों से कहने लगे- ‘श्रीपाद जिनके उद्धार की इतनी भारी चिंता है, वे महाभागवत पुरुष कौन हैं?’

पास ही में बैठे हुए श्रीवास और गंगादास भक्तों ने कहा- ‘प्रभो! वे महाभागवत नहीं है, वे तो ब्राह्मण-कुल-कण्‍टक अत्‍यंत क्रूर प्रकृति के राक्षस हैं। सम्‍पूर्ण नगर में उनका आतंक छाया हुआ है।' यह कहकर उन लोगों ने जगाई-मधाई की बहुत-सी क्रूरताओं का वर्णन किया।

प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘अब वे कितने दिनों तक क्रूरता कर सकते हैं? श्रीपाद के जिन्‍हें दर्शन हो चुके और इनके मन में जिनके उद्धार का विचार आ चुका, वे क्‍या फिर पापी ही बने रह सकते हैं? श्रीपाद जिसे चाहें उसे भक्त बना सकते हैं, फिर चाहे वह कितना भी बड़ा पापी क्‍यों न हो।'   इस प्रकार निताई ने संकेत से ही प्रभु के समीप जगाई-मधाई के उद्धार की प्रार्थना कर दी और प्रभु ने भी संकेत द्वारा ही उन्‍हें उन दोनों भाइयों के उद्धार का आश्‍वासन दिला दिया। सचमुच महात्‍माओं के हृदयों में दूसरों के प्रति स्‍वा‍भाविक ही दया उत्‍पन्‍न हो जाती है। उनके समीप आकर कोई दया की प्रार्थना करे तभी वे दया करें यह बात नहीं है, किंतु उनका स्‍वभाव ही ऐसा होता है कि बिना कहे ही वे दीन-दु:खियों पर दया करते रहते हैं। बिना दया किये वे रह ही नहीं सकते। जैसे कि नीतिकारों ने कहा है-

पद्माकरं दिनकरो विकचं करोति
चन्‍द्रो विकासयति कैरवचक्रवातम्।
नाभ्‍यर्थितो जलधरोअपि जलं ददाति 
सन्‍त: स्‍वयं परहितेषु कृताभियोगा:।

रात्रि के दु:ख से सिकुड़े हुए कमल मरीचिमाली भगवान भुवन-भास्‍कर के समीप अपना दुखड़ा रोने के लिये नहीं जाते, बिना कहे ही कमलबन्धु भगवान दिवाकर उनके दु:खों को दूर करके उन्हें विकसित कर देते हैं। कुमुदिनीकी लज्जा से अवगुण्ठित कलिका को कलानाथ भगवान शशधर स्वयं ही प्रस्फुटित कर देते हैं। बिना याचना के ही जल से भरे हुए मेघ अपने सम्पूर्ण जल को बरसाकर प्राणियों के दु:ख को दूर करते हैं। इसी प्रकार महान संतगण भी स्वयं ही दूसरों के उपकार के निमित्त सदा कुछ-न-कुछ उद्योग करते ही रहते हैं। परोपकार करना उनका स्वभाव ही बन जाता है।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90