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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जैसे सभी प्राणी जान में, अनजाने में स्वांस लेते ही रहते हैं, उसी  प्रकार संत-महात्मा जो-जो भी चेष्‍टा करते हैं, वे सभी लोक-कल्याणकारी ही होती हैं।

जगाई-मधाई का उद्धार.....

सचमुच में जिसका हृदय कोमल है, जो सभी प्राणियों को प्रेम की दृष्टि से देखता है, जिसकी बुद्धि घृणा और द्वेष के कारण मलिन नहीं हो गयी है, परोपकार करना जिसका व्यसन ही बन गया है, ऐसा साधु पुरुष यदि सच्चे हृदय से किसी घोर पापी-से-पापी का भी कल्याण चाहे तो उसके धर्मात्मा बनने में संदेह ही नहीं। महात्माओं की स्वाभाविक इच्छा अमोघ होती है, यदि वे प्रसन्नतापूर्वक किसी के ओर देखभर लें, बस, उसी समय उसका बेड़ा पार है। साधुओं के साथ खोटी बुद्धि से किया हुआ संग भी व्यर्थ नहीं होता। साधुओं से द्वेष रखने वालों का भी कल्याण ही होते देखा गया है, यदि पापी के ऊपर किसी अपराध के कारण कभी क्रोध न करने वाले महात्माओं को दैवात क्रोध आ गया तब तो उसका सर्वस्व ही नाश हो जाता है, किंतु प्राय: महात्माओं को क्रोध कभी नाममात्र को ही आता है, वे अपने अहित करने वाले का भी सदा हित ही करते हैं। प्रहार करने पर भी वे वृक्षों की भाँति सुस्वादु फल ही प्रदान करते हैं, क्योंकि उनका हृदय दया से परिपूर्ण होता है।

इतने घोर पापी दोनों भाई जगाई-मधाई के ऊपर नित्यानन्द जी की कृपा हो गयी, उनके हृदय में इन दोनों के उद्धार के निमित्त चिन्ता हो उठी, मानों इन दोनों के पापों के अन्त होने का समय आ गया। जिस दिन इन दोनों को अवधूत नित्यानन्द और महात्मा हरिदास जी के दर्शन हुए, उसी दिन इनके शुभ दिनों का श्रीगणेश हो गया। संयोगवश अब उन्होंने उसी मुहल्ले में अपना डेरा डाला, जहाँ महाप्रभु का घर था। मुहल्ले के सभी लोग डर गये। एक-दूसरे से कहने लगे- ‘अब इन कीर्तन वालों पर आपत्ति आयी। ये दोनों राक्षस भाई जरूर कीर्तन करने वालो से छेड़खानी करेंगे।' कोई-कोई कीर्तन-विरोधी कहने लगे- ‘अजी! अच्छा है। ये कीर्तन वाले रात्रि भर सोने ही नही देते थे। इनके कोलाहल के कारण रात्रि में नींद ही नही आती। अच्छा हैं, अब सुख से तो सो सकेंगे।' कोई-कोई अपने अनुमान से कहते- ‘बहुत सम्भव है, अब ये कीर्तन करने वाले लोग स्वयं ही कीर्तन बंद कर देंगे और न बंद करेंगे तो अपने किये का मजा चखेंगे।’ इस प्रकार लोग भाँति-भाँति के तर्क करने लगे।प्रभु का घर गंगा जी के समीप ही था। जिस घाट पर प्रभु स्नान करने जाते, उसी के रास्ते में इन दोनों क्रूरकर्मा भाइयों का डेरा पड़ा हुआ था। इनके डर के कारण गंगा-स्नान के निमित्त अकेला तो कोई जाता ही नहीं था। दस-बीस आदमी साथ मिलकर घाट पर स्नान करने जाते। रात्रि में तो कोई अपने घर से बाहर निकलता ही नहीं था, कारण कि ये दोनों भाई नशे में उन्मत्त होकर इधर-उधर घूमते और जिसे भी पाते, उसी पर प्रहार कर बैठते। इसलिये शाम होते ही जैसे पक्षी अपने-अपने घोंसलों में घुस जाते हैं और फिर प्रात:काल ही उसमें से निकलते हैं, उसी प्रकार उस मुहल्ले के लोग सूर्यास्त के बाद भूलकर भी घर से बाहर नहीं होते, क्योंके इनकी क्रूरता और नृशंसता से सभी लोग परिचित थे।

शाम को नियतिम रूप से भक्‍त संकीर्तन करते थे और कभी-कभी तो रात्रि भर संकीर्तन होता रहता था। इन दोनों के डेरा डालने पर भी संकीर्तन ज्यों-का-त्यों ही होता रहा। रात्रि में सभी भक्‍त एकत्रित हुए और उसी प्रकार लय एवं ध्‍वनि के साथ खोल, मृदंग, करताल और मजीरा आदि वाद्यों सहित भगवान के सुमधुर नामों का संकीर्तन होने लगा।

संकीर्तन की त्रितापहारी, अनन्त अघसंहारी, सुमधुर ध्‍वनि इन दोनों भाइयों के कानों में भी पड़ी। ये दोनों शराब के मद में तो चूर थे ही, उस कर्णप्रिय ध्‍वनि के श्रवणमात्र से और अधिक उन्‍मत्त हो गये। गर्मियों के दिन थे, बाहर अपने पलंगों पर पड़े हुए ये कीर्तन के जगत-पावनकारी रसामृत का पान करने लगे। कभी तो वे बेसुध होकर हुंकार मारने लगते, कभी पड़े-पड़े ही ‘अहा-अहा’ इस प्रकार कहने लगते। कभी भावावेश में आकर कीर्तन के लय के साथ उठकर नृत्‍य करने लगते। इस प्रकार ये संकीर्तन के माहात्‍म्‍य को बिना जानेही केवल उसके श्रवणमात्र से ही पागल-से हो गये। एक दिन दूर से कीर्तन की ध्‍वनि सुनकर ही इनके हृदय की कठोरता बहुत कुछ जाती रही। भला जिस हृदय में कर्णों के द्वारा भगवन्‍नाम का प्रवेश हो चुका है, वहाँ पर कठोरता रह ही कैसे सकती है? संकीर्तन श्रवण करते-करते ही ये दोनों भाई सो गये! प्रात:काल जब जगे तो इन्‍होंने भक्‍तों को घाट की ओर गंगास्‍नान के निमित्त जाते हुए देखा। महाप्रभु भी उधर से ही जा रहे थे। इन्‍होंने यह सब तो पहले ही सुन रखा था कि प्रभु ही संकीर्तन के जीवनदाता हैं। अत: प्रभु को देखते ही इन्‍होंने कुछ गर्वित स्‍वर में प्रसन्‍नता के साथ कहा- ‘निमाई पण्डित! रात्रि में तो बड़ा सुंदर गाना गा रहे थे, क्‍या ‘मंगलचण्‍डी’ के गीत थे? एक दिन अपने सभी साथियों के सहित हमारे यहाँ गान करो। तुम जो-जो सामग्री बताओगे वह सब हम मंगा देंगे। एक दिन जरूर हमारे यहाँ चण्‍डीमंगल होना चाहिये। हमें तुम्‍हारे गीत बहुत भले मालूम पड़ते है।' भगवन्‍नाम-संकीर्तन का कैसा विलक्षण प्रभाव है! केवल अनिच्‍छापूर्वक श्रवण करने का यह फल है कि जो दोनों भाई किसी से सीधे बातें ही करना नहीं जानते थे, वे ही महाप्रभु से अपने यहाँ गायन करने की प्रार्थना करने लगे। प्रभु ने इनकी बातों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वे उपेक्षा करके आगे चले गये।तीसरे पहर सभी भक्‍त प्रभु के घर एकत्रित हुए। सभी ने प्रभु से प्रार्थना की- ‘प्रभों! इन दोनों भाइयों का अब अवश्‍य ही उद्धार होना चाहिये। अब यही इनके उद्धार के निमित्त सुअवसर है। तभी लोगों को संकीर्तन का महत्त्व जान पड़ेगा एवं आपका पतितपावन और दीनबंधु नाम सार्थक हो सकेगा!’
क्रमशः

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