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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु ने मुसकराते हुए कहा- ‘भक्‍तवृंद! जिनके उद्धार के निमित्त आप सब लोग इतने चिंतित हैं, जिनकी मंगल-कामना के लिये आप सभी के हृदयों में इतनी अधिक इच्‍छा है, उनका तो उद्धार अब हुआ ही समझो। अब उनके उद्धार में क्‍या देरी है? जिन्‍हें श्रीपाद के दर्शनों का सौभाग्‍य प्राप्‍त हो चुका, वे पापी रह ही कैसे सकते हैं? श्रीपाद के दर्शन व्‍यर्थ कभी नहीं जाते। ये उनका कल्‍याण अवश्‍य करेंगे।’ प्रभु के ऐसे आश्‍वासन-वाक्‍य सुनकर भक्‍त अपने-अपने स्‍थानों को चले गये।
एक दिन रात्रि के समय नित्‍यानंद जी महाप्रभु के घर की ओर आ रहे थे। निताई ने जान-बूझकर, केवल उन दोनों भाइयों के उद्धार के नि‍मित्त ही रात्रि में उधर से आने की बात सोची थी। ये धीरे-धीरे भगवन्‍नाम का उच्‍चारण करते हुए इनके डेरे के सामने होकर ही निकले। उस समय ये दोनों शराब के नशे में चूर हुए बैठे थे। नित्‍यानंद को रात्रि में उधर से जाते देखकर लाल आँखे किये हुए मदिरा की बेहोशी में मधाई ने पूछा- ‘कौन जा रहा है?’ नित्‍यानंद जी भला क्‍यों उत्तर देने वाले थे, वे चुप ही रहे, इस पर उसने डांटकर जोर से कहा- ‘अरे, कौन जा रहा है? बोलता क्‍यों नही?’

इस पर नित्‍यानंद जी ने निर्भिक भाव से कहा- ‘क्‍यो, हम है, क्‍या कहते हो?’ मधाई ने कहा-‘तुम कौन हो? अपना नाम बताओ और इस समय रात्रिमें कहाँ जा रहे हो?’ नित्‍यानंद जी ने सरलता के साथ कुछ विनोद के लहजे में कह- ‘प्रभु के यहाँ संकीर्तन करने जा रहे हैं, हमारा नाम है ‘अवधूत’।'

अवधूत नाम को सुनकर ही मधाई चिढ़ गया। उसने कहा- ‘अवधूत, अवधूत, बड़ा विचित्र नाम है। अवधूत तो नाम नहीं होता, क्‍यों बे बदमाश! हमसे दिल्‍लगी करता है?’ यह कहकर उस अविचारी मदोन्‍मत्तन पास में पड़े हुए एक घड़े के टुकड़े को उठाकर नित्‍यानंद जी के सिर में जोर से मारा। वह खपड़ा इतने जोर से निताई के सिर मे लगा कि सिर में लगते ही उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये। एक टुकड़ा निताई के माथे में भी गड़ गया। खपड़े के गड़ जाने से मस्तक से रक्‍त की धारा-सी बहने लगी।नित्‍यानंद जी का सम्‍पूर्ण शरीर रक्त से ल‍थपथ हो गया। उनके सभी वस्‍त्र रक्‍तरंजित हो गये। इस पर भी नित्‍यानंद जी को उसके ऊपर क्रोध नहीं आया और वे आनन्‍द के साथ नृत्‍य करते हुए भगवन्‍नाम का गान करने लगे। वे इनके ऊपर दशा दर्शाते हुए रो-रोकर प्रभु से प्रार्थना करने लगे-‘प्रभो! इस शरीरमें जो आघात हुआ, उसकी मुझे कुछ भी चिंता नहीं; किंतु इन ब्राह्मण-कुमारों की ऐसी दुर्दशा अब मुझसे नहीं देखी जाती। इनकी इस शोचनीय अवस्‍था के स्‍मरण से मेरा हृदय विदीर्ण हुआ जाता है। हे दयालो! अब तो इनकी निष्‍कृतिका उपाय बता दो।’ नित्‍यानंदजी को इस प्रकार प्रेम में नृत्‍य करते देखकर मधाई और अधिक चिढ़ गया। इस पर वह इनके ऊपर दूसरी बार प्रहार करने को उद्यत हुआ। इस पर जगाई ने उसे बीच में ही रोक दिया। मधाई की अपेक्षा जगाई कुछ कोमल प्रकृति का और दयावान् था, उसे नित्‍यानंदजी की इस दशा पर बड़ी दया आयी। प्रहार करने वाले पर भी क्रोध न करके वे आनन्‍द के सहित नृत्‍य कर रहे हैं और उलटे अपने अपराधी के कल्‍याण निमित्त प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं, इस बात से जगाई का हृदय पसीज उठा। उसने मधाई को राकते हुए कहा- ‘तुम यह क्‍या कर रहे हो? एक संयासी को बिना जाने-पूछे मार रहे हो। यह अच्‍छी बात नहीं है।'

लाल-लाल आँखों से चारों ओर देखते हुए मधाई ने कहा- ‘यह अपना सीधी तरह नाम-गांव ही नहीं बताता।' सरलता के स्‍वर में जगाई न कहा- ‘यह परदेशी संयासी अपना नाम-गांव क्‍या बतावे? देखते नहीं अवधूत है। मांगकर खाता होगा, इधर-उधर पड़ा रहता होगा।’ जगाई के इस प्रकार निवारण करने पर मधाई शांत हुआ। उसने दूसरी बार नित्‍यानंदजी पर प्रहार नहीं किया। नित्‍यानंद जी आनंद में उन्‍मत्त हुए नृत्‍य कर रहे थे। माथे से रक्‍त का पनाला-सा बह रहा था। वहाँ की सम्‍पूर्ण पृथ्‍वी रक्‍त से भीग गयी थी। लोगों ने जल्‍दी से जाकर यह संवाद महाप्रभु को दिया। उस समय महाप्रभु भक्तों के सहित कीर्तन आरम्‍भ करने ही वाले थे। नित्‍यानंद जी के प्रहार की बात सुनकर अब इनसे नहीं रहा गया। ये नित्‍यानंद जी को प्राणों से भी अधिक प्‍यार करते थे। नित्‍यानंद जी की विपत्ति का समाचार सुनकर ये एकदम उठ पड़े और दौड़ते हुए घटनास्‍थल पर आये। इनके पीछे सभी भक्‍त भी ज्‍यों-के-त्‍यों ही उठे हुए चले आये। किसी के गले में ढोलकी लटक रही थी, किसी से मृदंग बंधा था, कोई पखावज लिये था, किसी के दोनों हाथों में करताल थी और बहुतों के हाथों में मजीरा ही थे।प्रभु ने देखा नित्‍यानंद जी आनन्‍द के उद्रेक में प्रेम से उन्‍मत्त की भाँति नृत्‍य कर रहे हैं। उनके मस्‍तक से रक्‍त की धार बह रही है, उनका सम्‍पूर्ण शरीर रक्‍तरंजित हो रहा है। शरीर में से रक्‍त टप-टप नीचे टपक रहा है, उनके नीचे की सम्‍पूर्ण पृथ्‍वी रक्‍त के कारण लाल हो गयी है। ऐसी दशा में भगवान के सुमधुर नामों का कीर्तन कर रहे हैं। नित्‍यानंद जी के रक्‍तप्रवाह को देखकर प्रभु का खून उबलने लगा, उस समय वे अपनी सब प्रतिज्ञा भूल गये और आकाश की ओर देखकर जोरों से हुंकार मारते हुए ‘चक्र-चक्र’ इस प्रकार कहने लगे। मानो इन दोनों पापियों के संहार के निमित्त वे सुदर्शन चक्र का आ‍हृवान कर रहे हैं।

प्रभु को इस प्रकार क्रोधविष्‍ट देखकर नित्‍यानंद जी ने उनसे विनीत भाव से कहा- प्रभो! अपनी प्रतिज्ञा स्‍मरण कीजिये, इन पापियों के प्रति जो आपके हृदय में क्रोध उत्‍पन्‍न हो आया है, उसे दूर कीजिये। जब आप ही पापियों के ऊपर दया न करके क्रोध करेंगे तो इनका उद्धार कैसे होगा? आप तो पापसंहारी हैं, आपका नाम तो पतितपावन है। आप तो दीनानाथ हैं। इनके बराबर दीन-हीन पतित आपको उद्धार के निमित्त कहाँ मिलेगा! प्रभो! ये पापी आपकी कृपा के पात्र हैं, ये गौर की दया के अधिकारी हैं। इनके ऊपर अनुग्रह होना चाहिये। अपने जगद्वन्‍द्य चरणों को मस्‍तकों पर रखकर इनका उद्धार कीजिये।’
क्रमशः

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