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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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आप इनके उद्धार का श्रेय मेरे सिर पर लादना चाहते हैं, किंतु इस बात को तो सभी जानते हैं कि पतितपावन गौर में ही ऐसे पापियों को उबारने की सामर्थ्य है।प्रभो! मैं हृदय से कहता हूँ, मेरे हृदय में मधाई के प्रति अणुमात्र भी विद्वेष के भाव नहीं है। यदि मैंने जन्म-जन्मान्तरों में कभी भी कोई सुकृत किया हो, तो उन सबका पुण्य मैं इन दोनों भाइयों को प्रदान करता हूँ।
इतना सुनते ही प्रभु ने दौड़कर मधाई को अंक में उठा लिया और जोरों से उसका आलिंगन करते हुए कहने लगे- ‘मधाई! अब तुम मेरे अत्यंत ही प्रिय हो गये। श्रीपाद ने तुम्हें क्षमा कर दिया। उन्होंने अपने सभी पुण्य प्रदान करके तुम्हें भागवत वैष्णव बना दिया। तुम आज से मरे अन्तरंग भक्त हुए। श्रीपाद की कृपा से तुम पापरहित बन गये।' प्रभु का प्रेमालिंगन और आश्वासन पाने से मधाई के आनन्द की सीमा न रही। वह उसी क्षण मूर्च्छित होकर प्रभु के पादपद्मों में पड़ गया। प्रभु के दोनों पैरों को पकड़े हुए नवद्वीप के सर्वेसर्वा और एकमात्र शासनकर्ता वे दोनों भाई धूलि में लोटे हुए रुदन कर रहे थे। भक्त तथा नगर के अन्य नर-नारी मन्त्रमुग्ध की भाँति खड़े हुए इस पतितोद्धार के दृश्य को देख रहे थे। इस हृदय को हिला देने वाले दृश्य से उनकी तृप्ति ही नहीं होती थी। उसी समय प्रभु ने अपने पैरों में पड़े हुए धूलिधूसरित दोनों भाइयों को उठाया और भक्त को संकीर्तन करने की आज्ञा दी।
इन दोनों पापी भाइयों की ऐसी दीनता देखकर भक्तों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। वे अलग-अलग सम्प्रदाय बना-बनाकर प्रेम में उन्मत्त हुए हरिध्वनि करने लगे और जोरों से ताल और स्वरसहित कीर्तन करने लगे। नगर के सभी नर-नारी कीर्तन में सम्मिलित हुए। आज उनके लिये संकीर्तन देखने का यह प्रथम ही अवसर था। सभी भक्तों के सहित-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
-इस महामंत्र का उचारण करने लगे। झाँझ, मृंदग और मजीरा बजने लगे, भक्त उन्मत्त होकर कीर्तन करने लगे। बीच-बीच में गौरहरि के जय-जयकरों की ध्वनि से आकाश-मण्डल गूंजने लगा। कीर्तन की ध्वनि से सभी को स्वेद, कम्प, अश्रु आदि सात्त्विक भाव होने लगे। उस समय के संकीर्तन में एक प्रकार की अद्भुत छटा दिखायी देने लगी। सभी प्रेम में पागल-से बने हुए थे। संकीर्तन करते हुए भक्तगण उन दोनों भाइयों को साथ लिये हुए प्रभु के घर पर पहुँचे।
जगाई और मधाई की प्रपन्नता……
वृंदावन में एक परम भगवद्भक्त माताने हमें यह कथा सुनायी थी- भक्त- भयभंजन भगवान द्वारका के भव्य भोजन-भवन में बैठे हुए सत्यभामा आदि भामिनियों से घिरे हुए भोजन कर रहे थे। भगवान एक बहुत ही सुदंर सुवर्ण-चौकी पर विराजमान थे। सुवर्ण के बहुमूल्य थालों में भाँति-भाँति के स्वादिष्ट व्यंजन सजे हुए थे। बहुमूल्य रत्नजड़ित कटोरियों में विविध प्रकार के पेय पदार्थ रखे हुए थे। सामने रुक्मिणी जी बैठी हुई पंखा डुला रही थीं। इधर-उधर अन्य पटरानियां बैठी हुई थीं। सहसा भगवान भोजन करते-करते एकदम रुक गये, उनके मुख का ग्रास मुख में था और हाथ का हाथ में। वे निर्जीव मूर्ति की भाँति ज्यों-के-त्यों ही स्तम्भित रह गये। उनका कमल के समान प्रफुल्लित मुख एकदम कुम्हला गया। आँखों में आंसू भरकर वे रुक्मिणी जी की ओर देखने लगे। सभी पटरानियां भगवान के ऐसे भाव को देखकर भयभीत हो गयीं। वे किसी भावी आशंका के भय से भयभीत-सी हुई प्रभु के मूख की ओर निहारने लगीं। कुछ कम्पित स्वर में भयभीत होकर रुक्मिणी जी ने पूछा- ‘प्रभो! आपकी एक साथ ही ऐसी दशा क्यों हो गयी? मालूम पड़ता है, कहीं आपके परम प्रिय किसी भक्त पर भारी संकट पड़ा है, उसी के कारण आप इतने खिन्न हो गये हैं। क्या मेरा यह अनुमान ठीक है?’
रूक्मिणी की ओर देखते हुए प्रभु ने कहा- ‘तुम्हारा अनुमान असत्य नहीं है।‘
अधीरता प्रकट करते हुए रुक्मिणीजी ने कहा-‘प्राणेश्वर! मैं उन महाभाग भक्त का और उनकी विपत्ति का हाल जानना चाहती हूँ।‘
विषण्ण स्वर में भगवान ने कहा- ‘दुष्ट दु:शासन भरी सभा में द्रुपद सुता के चीर को खींच रहा है। गुरुजनों के सामने उस पतिव्रता को नग्न करना चाहता है।'
द्रुपदसुता के दु:ख की सुनकर नारी सुलभ भीरूता और कातरता के साथ जल्दी से रुक्मिणी जी ने कहा- ‘तब आप सोच क्या रहे हैं, जल्दी से उसकी सहायता क्यों नहीं करते, जिससे उसकी लाज बच सके। प्रभो! उस दीन-हीन अबला की रक्षा करो। नाथ! उसके दु:ख से मेरा दिल धड़कने लगा है।'
गद्गदकण्ठ से भगवान ने कहा- ‘सहायता कैसे करूं? उसने तो अपने वस्त्र का एक छोर दांतों से दाब रखा है। वह सर्वतोभावेन मेरा सहारा न लेकर दांतों का सहारा ले रही है। जब तक वह सब आशाओं को छोड़कर पूर्णरूप से मेरे ही ऊपर निर्भर नहीं हो जाती, तब तक मैं उसकी सहायता कर ही कैसे सकता हूँ?
भगवान द्वारिका में इतना कह ही रहे थे कि द्रौपदी ने सब ओर से अपने को निस्सहाय समझकर भगवान का ही आश्रय लेने का निश्चय किया। उसके मुख में से ‘कृष्’ इतना ही निकला था कि दाँतों में से वस्त्र छूट गया। दांतों का आश्रय छोड़ना था और ‘कृष्’ के आगे ‘ण’ भी नहीं निकलने पाया कि तभी भगवान वहाँ आ उपस्थित हुए और द्रौपदी के चीर को अक्षय बना दिया। इसी का वर्णन करते हुए सूरदास जी कहते हैं-
द्रुपद-सुता निर्बल भइ ता दिन, गहि लाये निज धाम।
दु:शासन की भुजा थकित भइ, बसनरूप भये श्याम।।
सुने री मैंने निर्बलके बल राम ।
क्योंकि जब तक मनुष्य को अपने बल का आश्रय है, जब तक वह अपने को ही बली और समर्थ माने बैठा है, तब तक भगवान सहायता क्यों करने लगे? वे तो निर्बलों के सहायक हैं- निष्किंचनों के रक्षक हैं- इसी आगे सूर कहते हैं-
अप-बल तप-बल और बाहु-बल चौथा है बल दाम।
सूर किसोर-कृपातें सब बल, हारे को हरि नाम।।
सुने री मैंने निर्बलके बल राम ।
जगाई-मधाई के पास अन्याय से उपर्जित यथेष्ट धन था, शरीर उन दोनों का पुष्ट था, शासक की ओर से उन्हें अधिकार मिला हुआ था।
क्रमशः
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