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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु की आज्ञा पाते ही दोनों ने अपने-अपने हाथों में जल लिया। तब प्रभु ने गम्भीरता स्वर में अत्यंत ही स्नेह के साथ दयार्द्र होकर कहा- ‘आजतक तुम दोनों भाइयों ने जितने पाप किये हों, इन जन्म में या पिछले कोटि जन्मों में, उन सभी को मुझे दान कर दो।'
हाथ के जल को जल्दी से फेंकते हुए अत्यंत ही दीनता के साथ कातरस्वर में उन दोनों भाइयों न कहा- ‘प्रभो! हमारा हृदय फट जायगा। भगवन! हम मर जायँगे। हमें ऐसा घोर कर्म करने की आज्ञा अब न प्रदान कीजिये। प्रभो! हम आपकी इतनी कृपा सहन नहीं कर सकते। हे दीनों के दयाल! जिन चरणों में भक्तगण नित्यप्रति भाँति-भाँति के सुगन्धित चंदन और विविध प्रकार के पत्र-पुष्प चढ़ाते हैं, उनमें हमें अपने असंख्यों पापों को चढ़ाने की आज्ञा न दीजिये। संसार हमें धिक्कारेगा कि प्रभु के पावन पादपद्मों में इन पापी पामर प्राणियों ने अपने पाप-पुंजों को अर्पण किया। प्रभो! हम दब जायंगे। यह काम हमसे कभी नहीं होने का।‘
प्रभु ने इन्हें धैर्य बंधाते हुए कहा- 'भाइयो! तुम घबड़ाओं नहीं। तुम्हारे पापों को ग्रहण करके मैं पावन हो जाऊगाँ। मेरा जन्म धारण करना सार्थक हो जायगा। तुमलोग संकोच न करो।' प्रभु की इस बात को सुनकर नित्यानंद जी ने उन दोनों भाइयों से कहा- ‘तुमलोग इतना संकोच मत करो। ये तो जगत को पावन बनाने वाले हैं। पाप इनका क्या बिगाड़ सकते हैं? ये तो त्रिभुवनपापहारी हैं। तुम अपने पापों का संकल्प कर दो।'
नित्यानंद जी की बात सुनकर रोते-रोते इन दोनों भाइयों ने हाथ में जल लिया। नित्यानन्द जी ने संकल्प पढ़ा और प्रभु ने दोनों हाथ फैलाकर उन दोनों भाइयों के सम्पूर्ण पापों को ग्रहण कर लिया। अहा! कैसा अपूर्व आदर्श है? दूसरों के पाप ग्रहण करने से ही तो गौरांग पतित पावन कहा सके। उनके पापों का ग्रहण करके प्रभु बोले- ‘अब तुम दोनों निष्पाप हो गये। अब तुम मेरे अत्यन्त प्रिय परम भागवत वैष्णव बन गये। आज से जो कोई तुम्हारे पुराने पापों को स्मरण करके तुम्हारे प्रति घृणा प्रकट करेगा, वह वैष्णवद्रोही समझा जायगा। उसे घोर वैष्णवापराध पातक लगेगा।' यह कहते-कहते प्रभु ने फिर दोनों को गले से लगा लिया। वे भी प्रभु का प्रेमालिंगन पाकर मूर्च्छित होकर जल में गिर पड़े। उस समय प्रभु के अत्यन्त ही अन्तरंग भक्तों को तपाये हुए सुवर्ण के समान रंगवाला प्रभु का शरीर किंचित कृष्णवर्ण का प्रतीत होने लगा। पाप ग्रहण करने से वह काला हो गया। इसके अनन्तर सभी भक्तों ने आनन्द और उल्लास के सहित खूब स्नान किया। मारे प्रेम के सभी भक्त पागल-से हो गये थे। स्नान करते-करते वे आपस मे एक-दूसरे के ऊपर जल उलीचने लगे। इस प्रकार बहुत देर तक सभी गंगा जी के त्रिभुवनपावन पय में प्रसन्नता सहित क्रीड़ा करते रहे। अर्द्धरात्रि से अधिक बीतने पर अपने-अपने घरों को चले गये, किंतु जगाई-मधाई दोनों भाई उस दिन से अपने घर नहीं गये। वे श्रीवास पण्ड़ित ही घर रहने लगे।
जगाई-मधाई का पश्चात्ताप…..
जो हृदय पाप करते-करते मलिन हो जाता है, उसमें पश्चात्ताप की लपट कुछ असर नहीं करती। जिस प्रकार अत्यन्त कालें वस्त्र में स्याही का दाग प्रतीत नहीं होता, जो वस्त्र जितना ही स्वच्छ होगा, उसमें मैल का दाग भी उतना ही अधिक प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होगा। इसी प्रकार पश्चात्ताप की ज्वाला स्वच्छ और सरल हृदयों में ही अधिक उठा करती है। जो जितना ही अधिक निष्पाप होगा, जिसने अपने पापों को समझकर उनसे सदा के लिये मुंह मोड़ लिया होगा, उसे अपने पूर्वकृत कुकर्मों पर उतना ही अधिक पश्चात्ताप होगा और वह पश्चात्ताप ही उसे प्रभु के पादपद्मों तक पहुँचाने में सहायक बन सकेगा। पाप करने के पश्चात जो उसके स्मरण से हृदय में एक प्रकार का ताप या दु:ख होता है, उसे ही पश्चात्ताप कहते हैं। जिसे अपने कुकृत्यों पर दु:ख नहीं, जिसे अपने झूठ और अनर्थ वचनों का पश्चात्ताप नहीं, वह सदा इन्द्रियलोलुप संसारी योनियों में घूमने वाला नारकीय जीव ही बना रहेगा। उसकी निष्कृति का उपाय प्रभु कृपा करें तब भले ही हो सकता है। पश्चात्ताप हृदय के मल को धोकर उसे स्वच्छ बना देता है। पश्चात्ताप दुष्कर्मों की सर्वोत्तम ओषधि है, पश्चात्ताप प्राणियों को परम पावन बनाने के लिये रसायन है। पश्चात्ताप संसार-सागर में डूबते हुए पुरुष का एकमात्र सहारा है। वे पुरुष धन्य हैं, जिन्हें अपने पापों और दुष्कर्मों के लिये पश्चात्ताप हुआ करता है।
जगाई-मधाई दोनों भाइयों की निताई और निमाई इन दोनों भाइयों की अहैतु की कृपा से ऐसी कायापलट हुई कि इन्हें घरबार, कुटुम्ब-परिवार कुछ भी अच्छा नहीं लगता। ये सब कुछ छोड़कर सदा श्रीवास पण्ड़ित के ही घर में रहकर श्रीकृष्ण-कीर्तन और भगवन्नाम का जप करने लगे। ये नित्यप्रति चार बजे उषाकाल में उठकर गंगा स्नान करने जाते और नियम से रोज दो लाख हरिनाम का जप करते। इनकी आँखे सदा अश्रुओं से भीगी ही रहतीं। पुरानी बातों को याद कर-करके ये दोनों भाई सदा अधीर-से ही बने रहते। इन्हें खाना-पीना या किसी से बातें करना विष का समान जान पड़ता। ये न तो किसी से बोलते और न कुछ खाते ही थे, दिन-रात आँखों से आंसू ही बहाते रहते। श्रीवास इनसे खाने के लिये बहुत अधिक आग्रह करते, किंतु इनके गले के नीचे ग्रास उतरता ही नहीं। नित्यानन्द जी समझा-समझाकर हार गये, किंतु इन्होंने कुछ खाना स्वीकार ही नहीं किया। तब नित्यानन्दजी प्रभु को बुला लाये। प्रभु ने अपना कोमल कर इन दोनों की पीठपर फेरते हुए कहा- ‘भाइयों! तुम्हारें सब पाप तो मैंने ले लिये। अब तुम निष्पाप होकर भी भोजन क्यों नहीं करते? क्या तुमने मुझे सचमुच में अपने पाप नहीं दिये या मेरे ही ऊपर तुम्हारा विश्वास नहीं है।'
हाथ जोडे़ हुए अत्यन्त दीनता के साथ इन दोनों ने कहा- ‘प्रभो! हमें आपके ऊपर पूर्ण विश्वास है, हम अपने पापों के लिये नहीं रो रहे हैं, यदि हमें पापों का फल भोगना होता, तब तो परम प्रसन्नता होती, हमें तो आपके अहैतु की कृपा के ऊपर रुदन आता है। आपने हम-जैसे पतित और नीचों के ऊपर जो इतनी अपूर्व कृपा की है, उसका रह-रहकर स्मरण होता है और रोकने पर भी हमारे अश्रु नहीं रुकते।'
क्रमशः
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