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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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रजनी की नीरवता की नाश करती हुई यमुना अपने नीले रंग के जल के साथ हुंकार करती हुई धीरे-धीरे बह रही थी। उसी समय मोहन की मनोहर मुरली की सुरीली तान गोपिकाओं के कानों में पड़ी।’ बस, इतना सुनना था कि प्रभु पछाड़ खाकर भूमि पर गिर पड़े और आँखों से अविरल अश्रु बहाते हुए श्रीवास पण्डित से कहने लगे- ‘हाँ, फिर क्या हुआ? आगे कहो। कहते क्यों नहीं? मेरे तो प्राण उस मुरली की सुरीली तान को सुनने के लिये लालायित हो रहे हैं।’
श्रीवास फिर कहने लगे- ‘उस मुरली की ध्वनि जिसके कानों में पड़ी, जिसने वह मनमोहनी तान सुनी, वही बेसुध हो गयी। सभी अकी-सी, जकी-सी, भूली-सी, भटकी-सी हो गयीं। उन्हें तन-बदन की तनिक भी सुधि न रही। उस समय-
निशम्य गीतं तदनंगवर्धनं
व्रजस्त्रिय: कृष्णगृहीतमानसा:।
आजग्मुरन्योन्यमलक्षितोद्यमा:
स यत्र कान्तो जवलोलकुण्डला:।
‘उस अनंगवर्धन करने वाले मुरली के मनोहर गान को सुनकर जिनके मन को श्रीकृष्ण ने अपनी ओर खींच लिया है, ऐसी उन गोकुल की गोपियों ने सापत्न्य-भाव से अपने अनेकों उद्योग को एक-दूसरी पर प्रकट नहीं किया। वे श्रीकृष्ण की उस जगन्मोहन तान में अधीन हुई जिधर से वह ध्वनि सुनायी पड़ी थी, उसी को लक्ष्य करके जैसे बैठी हुई थीं वैसे ही उठकर चल दीं। उस समय जाने की शीघ्रता के कारण उनके कानों के हिलते हुए कमनीय कुण्डल बड़े ही सुंदर मालूम पड़ते थे।‘
जो गौ दुह रही थी वह दुहनी को वहीं पटककर चल दी, जिन्होंने दुहने के लिये बछड़ा छोड़ दिया था, उन्हें उसे बांधन तक की भी सुध न रही। जो दूध औटा रही थीं वे उसे उफनता हुआ ही छोड़कर चल दीं। माता पुत्रों को फेंककर, पत्नी पतियों की गोद में से निकलकर, बहनें भाइयों को खिलाते छोड़कर उसी ओर को दौड़ने लगीं। श्रीवास कहते जाते थे, प्रभु भावावेश में सुनते जाते थे। दोनों ही बेसुध थे। इस प्रकार श्रीकृष्ण-कथा कहते-कहते ही सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। भगवान भुवनभास्कर भी घर के दूसरी ओर छिपकर इन लीलाओं का आस्वादन करने लगे। सूर्य के प्रकाश को देखकर प्रभु को कुछ बाह्यज्ञान हुआ। उन्होंने प्रेमपूर्वक श्रीवास पण्डित का जोरों से आलिंगन करते हुए कहा- ‘पण्डित जी! आज आपने हमें देवदुर्लभ रस का आस्वादन कराया। आज आपके श्रीमुख से श्रीकृष्ण-लीलाओं के श्रवण से मैं कृतकृत्य हो गया।’ इतना कहकर प्रभु नित्यकर्म से निवृत्त होने के लिये चले गये।
दूसरे दिन प्रभु ने सभी भक्तों के सहित परामर्श किया कि सभी भक्त मिलकर श्रीकृष्ण-लीला का अभिनय करें। स्थान का प्रश्न उठने पर प्रभु ने स्वयं अपने मौसा पं० चन्द्रशेखर आचार्यरत्न का घर बता दिया। सभी भक्तों को वह स्थान बहुत ही अनुकूल प्रतीत हुआ। वह घर भी बड़ा था और वहाँ पर सभी भक्तों की स्त्रियाँ भी बिना किसी संकोच के जा-आ सकती थीं।
भक्तों के यह पूछने पर कि कौन-सी लीला होगी और किस-किसको किस-किस पात्र का अभिनय कराना होगा, इसके उत्तर में प्रभु ने कहा- ‘इसका अभी से कोई निश्चय नहीं। बस यही निश्चय है कि लीला होगी और पात्रों के लिये आपस में चुन लो।
पात्रों के पाठ का कोई निश्चय नहीं है। उस समय जिसे जिसका भाव आ जाय, वह उसी भाव में अपने विचारों को प्रकट करे। अभी से निश्चय करने पर तो बनावटी लीला हो जायगी। उस समय जैसी भी जिसे स्वाभाविक स्फुरता हो, यह सुनकर सभी भक्त बड़े प्रसन्न हुए। प्रभु के अन्तरंग भक्तों को तो अनुभव होने लगा मानो कल वे प्रत्यक्ष वृंदावन-लीला के दर्शन करेंगे।प्रभु ने उसी समय पात्रों का निर्णय किया। पात्रों के चुनने में भक्तों में खूब हंसी-दिल्लगी होती रही। सबसे पहले नाटक कराने वाले सूत्रधार का प्रश्न उठा। एक भक्त ने कहा- ‘सूत्रधार तो कोई ऐसा मोटा-ताजा होना चाहिये जो जरूरत पड़ने पर मार भी सह सके; क्योंकि सूत्रधार को ही सबकी देख-रेख रखनी होती है।’
यह सुनकर नित्यानंद जी बोल उठे- ‘तो इस काम को हरिदास जी के सुपुर्द किया जावे। ये मार खाने में भी खूब प्रवीण हैं।’ सभी भक्त हंसने लगे, प्रभु ने भी नित्यानंद जी की बात का समर्थन किया। फिर प्रभु स्वयं ही कहने लगे- ‘नारद जी के लिये तो किसी दूसरे की जरूरत ही नहीं! साक्षत नारदावतार श्रीवास पण्डित उपस्थित हैं ही।’ इसी समय एक भक्त धीरे से बोल उठा- ‘नारदो कलहप्रिय:’ नारद जी तो लड़ाई-झगड़ा पसंद करने वाले हैं। इस पर हंसते हुए अद्वैताचार्य ने कहा- ‘ये नारद भगवान इससे अधिक और कलह क्या करावें? आज नवद्वीप में जो इतना कोलाहल और हो-हल्ला मच रहा है, इसके आदिकारण तो ये नारदावतार श्रीवास महाराज ही हैं।’
इतने में ही मुरारी बोल उठा- ‘अजी, नारद जी को एक चेला भी चाहिये, यदि नारद जी पसंद करें तो मैं इनका चेला बन जाऊं।‘
यह सुनकर गदाधर बोले- ‘नारद जी के पेट में कुछ दर्द तो हो ही नहीं गया है, जो हिंगाष्टक-चूर्ण के लिये वैद्य को चेला बनावें। उन्हें तो एक ब्रह्मचारी शिष्य चाहिये। तुम ठहरे गृहस्थी। तुम्हें लेकर नारद जी क्या करेंगे? उनके चेला तो नीलाम्बर ब्रह्मचारी बने ही बनाये हैं।‘
प्रभु ने मुसकराते हुए कहा- ‘भुवनमोहिनी लक्ष्मी देवी का अभिनय हम करेंगे। किंतु हमारी सखी ललिता कौन बनेगी?’ इस पर पुण्डरीक विद्यानिधि बोल उठे- ‘प्रभु की ललिता तो सदा प्रभु के साथ छाया की तरह रहती ही हैं। ये गदाधर जी ही तो ललिता सखी हैं।’ इस पर सभी भक्तों ने एक स्वर में कहा- ‘ठीक है, जैसी अगूंठी वैसा ही उसमें नग जड़ा गया है।’ इस पर प्रभु हंसकर कहने लगे- ‘तब बस ठीक है, एक बड़ी बूढ़ी बड़ाई की भी हमें जरूरत थी सो उसके लिये श्रीपाद नित्यानन्द जी हैं ही।’ इतने में ही अधीर होकर अद्वैताचार्य बोल उठे- ‘प्रभो! हमें एकदम बुला ही दिया क्या? अभिनय में क्या बूढे़ कुछ न कर सकेंगे।‘
हंसते हुए प्रभु ने कहा- ‘आपको जो बूढा़ बताता है, उसकी बुद्धि स्वयं बूढ़ी हो गयी है। आप तो भक्तों के सिरमौर हैं। दान लेने वाले वृन्दावन विहारी श्रीकृष्ण तो आप ही बनेंगे।’ यह सुनकर सभी भक्त बड़े प्रसन्न हुए। सभी ने अपना-अपना कार्य प्रभु से पूछा। बुद्धिमन्त खां और सदाशिव के जिम्मे रंगमंच तैयार करने का काम सौंपा गया।
क्रमशः
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