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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्राण रहते तो मैं उस दुष्ट के साथ कभी न जाऊँगी।इस शरीर पर तो उन भगवान वासुदेव का ही अधिकार है। जीवित शरीर का वे ही उपभोग कर सकते है।’ यह सोचकर वह अपने प्राणनाथ के लिये प्रेम-पाती लिखने को बैठी-
श्रुत्वा गुणान्भुवनसुंदर श्रृण्वतां ते
निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽंगतापम्।
रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं
त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे।
इस प्रकार सात श्लोक लिखकर एक ब्राह्मण के हाथ उसने अपनी वह प्रणयरस से पूर्ण पाती द्वारिका को भगवान के पास भिजवायी। महाप्रभु भी उसी तरह से हाथ के नखों के द्वारा रुक्मिणी के भावावेश में अपने प्यारे श्रीकृष्ण को प्रेमपाती-सी लिखने लगे। वे उसी भाव से विलख-विलखकर रुदन करने लगे और रोते-रोते उन्हीं भावों को प्रकट भी करने लगे। कुछ काल के अनन्तर वह भाव शांत हुआ। बाहर रंगमंच पर अद्वैताचार्य सुप्रभा और गोपी के साथ मधुर भाव की बातें कर रहे थे। हरिदास कंधे पर लट्ठ रखकर ‘जागो-जागो’ कहकर घूम रहे थे। सभी भक्त प्रेम में विभोर होकर रुदन कर रहे थे। इतने में ही जगन्मोहिनी रूप को धारण किये हुए प्रभु ने रंग-मंचपर प्रवेश किया। प्रभु के आगे बड़ाई वेश में नित्यानंद जी थे।
नित्यानंद जी के कंधे पर हाथ रखे हुए धीर-धीरे प्रभु आ रहे थे। प्रभु के उस अद्भुत रूप-लावण्ययुक्त स्वरूप को देखकर सभी भक्त चकित हो गये। उस समय के प्रभु के रूप का वर्णन करना कवि की प्रतिभा के बाहर की बात है। सभी इस बात को भूल गये कि प्रभु ने ऐसा रूप बनाया है। भक्त अपनी-अपनी भावना के अनुसार उस रूप में पार्वती, सीता, लक्ष्मी, महाकाली तथा रासविहारिणी रसविस्तारिणी श्रीराधिका जी के दर्शन करने लगे। जिस प्रकार समुद्र-मंथन के पश्चात भगवान के भुवनमोहिनी रूप को देखकर देव, दानव, यक्ष, राक्षस सब-के-सब उस रूप के अधीन हो गये थे और देवाधिदेव महादेव जी तक कामासक्त होकर उसके पीछे दौड़े थे, उसी प्रकार यहाँ भी सभी भक्त विमुग्ध-से तो हो गये थे; किंतु प्रभु के आशीर्वाद से किसी के हृदय में काम के भाव उत्पन्न नहीं हुए। सभी ने उस रूप में मातृ स्नेह का अनुभव किया। प्रभु लक्ष्मी के भाव में आकर भवमय सुंदर पद गा-गाकर मधुर नृत्य करने लगे। उस समय प्रभु की आकृति-प्रकृति, हाव-भाव, चेष्टा तथा वाणी सभी स्त्रियों की-सी ही हो गयी थी। वे कोकिल-कूजित कमनीय कण्ठ से बड़े ही भावमय पदों का गान कर रहे थे। उनकी भाव-भंगी में जादू भरा हुआ था, सभी भक्त उस अनिर्वचनीय अलौकिक और अपूर्व नृत्य को देखकर चित्र के लिखे-से स्तम्भित भाव से बैठे हुए थे।प्रभु भावावेश में आकर नृत्य कर रहे थे। उनके नृत्य की मधुरिमा अधिकाधिक बढ़ती ही जाती थी, दोनों आँखों से अश्रुओं की दो अविच्छिन्न धारा-सी बह रही थी, माना गंगा-यमुना का प्रवाह सजीव होकर बह रहा हो। दोनों भृकुटियां ऊपर चढ़ी हुई थी। कड़े, छड़े, झाँझन और नूपुरों की झनकार से सम्पूर्ण रंगमंच झंकृत-सा हो रहा था। प्रकृति स्तब्ध थी मानो वायु भी प्रभु के इस अपूर्व नृत्य को देखने के लालच से रुक गया हो? भीतर बैठी हुई सभी स्त्रियाँ विस्मय से आँखें फाड़-फाड़कर प्रभु के अद्भुत रूप-लावण्य की शोभा निहार रही थीं।
उसी समय नित्यानंद जी बड़ाई के भाव को परित्याग करके श्रीकृष्ण-भाव से क्रन्दन करने लगे। उनके क्रन्दन को सुनकर सभी भक्त व्याकुल हो उठे और लम्बी-लम्बी सांसें छोड़ते हुए सब-के-सब उच्च स्वर से हा गौर! हा कृष्ण! कहकर रुदन करने लगे। सभी की रोदनध्वनि से चन्द्रशेखर का घर गूंजने लगा। सम्पूर्ण दिशाएँ रोती हुई-सी मालूम पड़ने लगीं। भक्तों को व्याकुल देखकर प्रभु भक्तों के ऊपर वात्सल्यभाव प्रकट करने के निमित्त भगवान के सिंहासन पर जा बैठे। सिंहासन पर बैठते ही सम्पूर्ण घर प्रकाशमय बन गया। मानों हजारों सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र एक साथ ही आकाश में उदय हो उठे हों। भक्तों की आँखों के सामने उस दिव्यालोक के प्रकाश को सहन न करने के कारण चकाचौंध-सा छा गया।
प्रभु ने भगवान के सिंहासन पर बैठे-ही-बैठे हरिदास जी को बुलाया। हरिदास जी लट्ठ फेंककर जल्दी से जगन्माता की गोदी के लिये दौड़े। प्रभु ने उन्हें उठाकर गोद में बैठा लिया। हरिदास महामाया आदि शक्ति की क्रोड में बैठकर अपूर्व वात्सल्यसुख का अनुभव करने लगे। इसके अनन्तर क्रमश: सभी भक्तों की बारी आयी। प्रभु ने भगवती के भाव में सभी को वात्सल्यसुख का रसास्वादन कराया और सभी को अपना अप्राप्य स्तनपान कराकर आनन्दित और पुलकित कराया। इसी प्रकार भक्तों को स्तनपान कराते-कराते प्रात:काल होते ही प्रभु ने भगवती-भाव का संवरण किया। वे थोड़ी देर में प्रकृतिस्थ हुए और उस वेष को बदलकर भक्तों के सहित नित्यकर्म से निवृत्त होने के लिये गंगा किनारे की ओर चले गये। चन्द्रशेखर का घर प्रभु के चले जाने पर भी तेजोमय ही बना रहा और वह तेज धीरे-धीरे सात दिन में जाकर बिलकुल समाप्त हुआ।
इस प्रकार प्रभु ने भक्तों के सहित श्रीमद्भागवत की प्राय: सभी लीलाओं का अभिनय किया।
भक्तों के साथ प्रेम-रसास्वादन…….
प्रेम की उपमा किससे दें। प्रेम तो एक अनुपमेय वस्तु है। स्थावर, जंगम, चर, अचर, सजीव तथा निर्जीव सभी में प्रेम समानरूप से व्याप्त हो रहा है। संसार में प्रेम ही तो ओतप्रोत भाव से भरा हुआ है। जो लोग आकाश को पोला समझते हैं, वे भुले हुए हैं। आकाश तो लोहे से भी कहीं अधिक ठोस है। उसमें तो एक परमाणु भी और नहीं समा सकता, वह सद्वृत्ति और दुर्वृत्तियों के भावों से ठूंस-ठूंसकर भरा हुआ है। प्रेम उन सभी में समानरूप व्याप्त है। प्रेम को चूना-मसाला या जोड़ने वाला द्राविक पदार्थ समझना चाहिये। प्रेम के कारण ये सभी भाव टिके हुए हैं। किंतु प्रेम की उपलब्धि सर्वत्र नहीं होती। वह तो भक्तों के ही शरीरों में पूर्णरूप से प्रकट होता है। भक्त ही परस्पर में प्रेमरूपी रसायन का निरंतर पान करते रहते हैं।
उनकी प्रत्येक चेष्टा में प्रेम-ही-प्रेम होता है। वे सदा प्रेम-वारूणी पान करके लोक बाह्य उन्मत्त-से बने रहते हैं और अपने प्रेमी बन्धुओं तथा भक्तों को भी उस वारूणी को भर-भर प्याले पिलाते रहते हैं।उस अपूर्व आसवका पान करके वे भी मस्त हो जाते हैं।
क्रमशः
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