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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जिन्‍हें पोथी पढ़ लेने पर भी ज्ञान नहीं होता, वे पठित-मुर्ख हैं। ऐसे पुस्‍तक के कीड़े बने हुए पुरुष पुस्‍तक पढ़ लेने पर भी उसके असली मर्म से वंचित ही रहते हैं।’ बेचारी माता के तो कलेजे से टुकड़ा निकल गया था, उसे ऐसे समय में ये इतनी ऊँची ज्ञान की बातें कैसे प्रिय लग सकती थीं। इन बातों से उसके मन में इन्‍हीं भावों का दृढ़ निश्‍चय हो गया कि विश्‍वरूप के गृहत्‍याग में आचार्य की जरूर सम्‍मति है। वह आचार्य से अत्‍यधिक स्‍नेह करता था, इनकी आज्ञा के बिना वह जा ही नहीं सकता। इन भावों को माता ने मन में ही छिपाये रखा। किसी के सामने उन्‍हें प्रकट नहीं किया।अब जब निमाई भी आचार्य के संसर्ग में अधिक रहने लगे और आचार्य ही सबसे अधिक भगवद्भाव से इनकी पूजा-स्‍तुति करने लगे, तो बेचारी दु:खिनी माता से अब नहीं रहा गया। कहावत है- ‘दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंककर पीता है।’ माता का हृदय पहले से ही घायल बना हुआ था। विश्‍वरूप उसके हृदय में पहले ही एक बड़ा भारी घाव कर गये थे, वह अभी पूरने भी नहीं पाया था कि निमाई भी उसी के पथ का अनुसरण करते हुए दिखायी देने लगे। निमाई अब भक्तों को छोड़कर एक क्षण भर के लिये भी संसारी कामों को करना पसंद नहीं करते। वे विष्‍णुप्रिया जी से अब बातें ही नहीं करते हैं, सदा भक्तमण्‍डल में बैठे हुए श्रीकृष्‍ण-कथा ही कहते-सुनते रहते हैं, नाती का मुख देखने के लिये उतावली बैठी हुई माता को अपने पुत्र का बर्ताव रुचिकर प्रतीत नहीं हुआ। इसके मूल में भी आचार्य अद्वैत का ही हाथ दीखने लगा। माता अब अपने मनोगत भावों को अधिक न छिपा सकीं। उनकी मनोव्‍यथा लोगों से बातें करते-करते आप-से-आप ही हृदय को फोड़कर बाहर निकल पड़ती। वे आंसू बहाते-बहाते अधीर होकर कहने लगतीं- ‘इन वृद्ध आचार्य को मुझ दु:खिनी विधवा के ऊपर दया भी नहीं आती। मेरे एक पुत्र को तो इन्‍होंने संन्‍यासी बना दिया। मेरे पति मुझे बीच में ही धोख देकर सदा के लिये चल बसे। मुझ बिलखती हूई दु:खिनी के ऊपर उन्‍हें तनिक भी दया नहीं आयी। अब मेरे जीवन का सहारा, मुझ अंधी की एकमात्र आधार लकड़ी यह निमाई ही है। इसे छोड़कर मेरे लिये सभी संसार सूना-ही-सूना है। मेरे आगे-पीछे बस यही एक आश्रय है, इसे भी आचार्य संन्‍यासी बनाना चाहते हैं। सदा इसे लेकर कीर्तन ही करते रहते हैं। मेरा निमाई कितना सीधा है। अद्वैताचार्य ने उनके साथी भक्तों ने उसे ईश्वर बता-बताकर विरक्‍त बना दिया है, वह घर की ओर कुछ ध्‍यान ही नहीं देता। सदा भक्तों के ही साथ घूमा करता है।’

माता की इन बातों से श्रीवास आदि भक्तों को तथा अद्वैताचार्य जी को मन-ही-मन कुछ दु:ख होता था। प्रभु भी भक्तों के मनोभावों को ताड़ गये। भक्तों को शिक्षा देने के निमित्त प्रभु ने माता के ऊपर कुछ क्रोध प्रकट करते हुए उस वैष्‍णव-निंदारूपी पाप का प्रायश्चित्त कराया।

एक दिन प्रभु भगवदावेश में भगवन्‍मूर्तियों को एक ओर हटाकर भगवान के सिंहासन पर आरूढ़ हुए और उपस्थित सभी भक्तों से वरदान मांगने के लिये कहा। भक्तों ने अपने-अपने इच्‍छानुसार किसी ने अपने पिता की दुष्‍टता छुड़ाने का, किसी के स्‍त्री की बुद्धि शुद्ध हो जाने का, किसी ने पुत्र का और किसी ने भगवद्भक्ति का वर मांगा। प्रभु ने आवेश में ही आकर सभी को उन-उनका अभीष्‍ट वरदान दिया। उसी समय श्रीवास पण्डित ने अति दीन-भाव से कहा- ‘प्रभो! ये शचीमाता यदा दु‍:खिनी ही बनी रहती है। ये दु:ख के कारण सदा अश्रु ही बहाती रहती हैं। भगवन! इनके उपर भी ऐसी कृपा होनी चाहिये कि इनका शोक-सन्‍ताप सब दूर हो जाय।‘
प्रभु ने उसी प्रकार सिंहासन पर बैठे-ही-बैठे भगवदावेश में ही कहा- ‘शचीमाता पर कृपा कभी नहीं हो सक‍ती। इसने वैष्‍णवापराध किया है। अपने अपराध करने वाले को तो मैं क्षमा कर भी सकता हूँ; किंतु वैष्‍णवों का अपराध करने वाले को क्षमा करने की मुझमें सामर्थ्‍य नहीं।’

श्रीवास पण्डित ने अत्‍यंत दीन-भाव से कहा- ‘प्रभो! भला यह भी कभी हो सकता है कि जिस माता ने आपको गर्भ में धारण किया है, उसका अपराध ही क्षमा न हो सके। आपको गर्भ में धारण करने से तो ये जगज्‍जननी बन गयीं। इनके लिये क्‍या अपना और क्‍या पराया? सभी तो इनके पुत्र हैं। जिसे चाहें जो कुछ ये कह सकती हैं।’

प्रभु ने कहा- ‘कुछ भी हो, वैष्‍णवों का अपराध करने वाला चाहे कोई भी हो उसकी निष्‍कृति नहीं हो सकती। साक्षात देवाधिदेव महादेव जी भी वैष्‍णवों का अपराध करने पर तत्‍क्षण ही नष्‍ट हो सकते हैं।’

श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! कुछ भी तो इनके अपराध-विमोचन का उपाय होना चाहिये।’ प्रभु ने कहा- ‘शचीमाता का अपराध अद्वैताचार्य के प्रति है। यदि आचार्य की चरण-धूलि माता सिर पर चढ़ावें और आचार्य ही इसे हृदय से क्षमा कर दें तब यह कृपा की अधिकारिणी बन सकती हैं।’ उस समय आचार्य दूसरे स्‍थान में थे, सभी भक्‍त आचार्य के समीप गये और वहाँ जाकर उन्‍होंने सभी वृत्तांत कहा। प्रभु की बातें सुनकर आचार्य प्रेम में विभोर होकर अश्रु-विमोचन करने लगे। वे रोते-रोते कहने लगे- ‘यही तो प्रभु की भक्‍तवत्‍सलता है। भला भगन्‍माता शचीदेवी का अपराध हो ही क्‍या सकता है? यह तो प्रभु हम लोगों को शिक्षा देने के लिये इस लीला का अभिनय करा रहे हैं, तो मैं हृदय से कहता हूँ, माता के प्रति मेरे मन में किसी प्रकार का बुरा भाव नहीं है। यदि आप मुझे प्रभु की आज्ञा से ‘क्षमा कर दी’ ऐसा कहने के लिये ही विवश करते हैं तो मैं कहे देता हूँ। वैसे तो माता ने मेरा कोई अपराध किया ही नहीं हैं। यदि प्रभु की दृष्टि में यह अपराध है तो मैं उसे हृदय से क्षमा करता हूँ। रही चरण-धूलि की बात सो शचीमाता तो जगद्वन्‍द्य हैं। उनकी चरण-धूलि ही भक्‍तों के शरीर का अंगराग है। भला, माता को मैं अपने पैर कैसे छुआ सकता हूँ।’
क्रमशः

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