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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इस प्रकार भक्तों में झगड़ा हो ही रहा था कि इतने में ही शचीदेवी भी वहाँ आ पहुँची और उन्होंने जल्दी से अद्वैताचार्य की चरण-धूलि अपने मस्तक पर चढ़ा ली। इसी बात से भक्तों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वे आनन्द के साथ नृत्य करने लगे। भक्तों में एक-दूसरे के प्रति जो कुछ थोड़ा-बहुत मनोमालिन्य था, वह इस घटना से एकदम समूल नष्ट हो गया और भक्त परस्पर एक-दूसरे का प्रेम से गले लगा-लगाकर आंलिगन करने लगे।
इसी प्रकार नवद्वीप में एक देवानंद पण्डित थे। वे वैसे तो बड़े भारी पण्डित थे, शास्त्रों का ज्ञान उन्हें यथावत था। श्रीमद्भागवत के पढ़ाने के लिये दूर-दूर तक इनकी ख्याति थी। बहुत दूर-दूर से विद्यार्थी इनके पास श्रीमद्भागवत और गीता पढ़ने के लिये आते थे। ये स्वभाव के बुरे नहीं थे, संसारी सुखों से उदासीन और विरक्त थे; किंतु अभी तक इनके हृदय में प्रेमका अंकुर उदित नहीं था। हृदय में प्रेम का बीज तो पड़ा हुआ था, किंतु श्रद्धा और साधु-कृपारूपी जल के बिना क्षेत्र शुष्क ही पड़ा था। सुखे खेत में बीज अंकुरित कैसे हो सकता है, जब तक कि वह सुंदर वारि से सींचा न जाय? दयार्द्र-हृदय गौरांग ने एक दिन नगर-भ्रमण करते समय उनके ऊपर भी कृपा की। उनके ऊपर उसे वाक्-प्रहार कारके उनके सुखे और जमे हुए हृदयरूपी क्षेत्र को पहले तो जोत दिया, फिर कृपारुपी जल से सींचकर उसे स्निग्ध और उत्पन्न होने योग्य बना दिया।
देवानंद को श्रीमद्भागवत पढ़ाते देखकर प्रभु क्रोधित भाव से कहने लगे- ‘ओ पण्डित! श्रीमद्भागवत के अर्थों का अनर्थ क्यों किया करता है? तू भागवत के अर्थों को क्या जाने? श्रीमद्भागवत तो साक्षात श्रीकृष्ण का विग्रह ही है। जिनके हृदय में प्रेम नहीं, भक्ति नहीं, साधु-महात्मा और ब्राह्मण-वैष्णवों के प्रति श्रद्धा नहीं, वह श्रीमद्भागवत की पुस्तक के छूने का अधिकारी ही नहीं। भागवत, गंगा जी, तुलसी और भगवद्भक्त- ये भगवान के रूप ही है। जो शुष्क हृदय के हैं, जिनके अन्त:करण में भक्ति नहीं, वे इनके द्वारा क्या लाभ उठा सकते हैं। वैसे ही ज्ञान की बातें बघारता रहता है या कुछ समझता भी है? ऐसे पढ़ने से क्या लाभ। ला, तेरी पुस्तक को फाड़कर श्रीगंगा जी के प्रवाह में प्रवाहित कर दूं।’ इतना कहकर प्रभु भावावेश में उनकी पुस्तक फाड़ने के लिये दौड़े।
भक्तों ने यह देखकर प्रभु को पकड़ लिया और शांत किया। प्रभु को भावावेश में देखकर भक्त उन्हें आगे ले गये। लौटते हुए प्रभु फिर देवानंद के स्थान पर आये। उस समय प्रभु भावावेश में नहीं थे, उन्होंने देवानंद जी को वह बात याद दिलायी, जब वे एक बार श्रीमद्भागवत पाठ पढ़ा रहे थे और श्रीवास पण्डित भी पाठ सुनने आये थे। जिस श्रीमद्भागवत के अक्षर-अक्षर में ठूँस-ठूँसकर प्रेम रस भरा हुआ है, ऐसी भागवत का जब श्रीवास जी ने पाठ सुना तो वे प्रेम में बेहोश होकर मूर्च्छित हो गये, आपके भक्तो ने उन्हें उठाकर बाहर डाल दिया था और आपने इसमें कुछ भी आपत्ति नहीं की। महाभागवत श्रीवास पण्डित के भावों को जब आपने ही नहीं समझा तब आपके शिष्य तो समझते ही क्या? आपने उस समय एक भगवद्भक्त का बुरी तरह से तिरस्कार कराया, यह आपके ऊपर अपराध चढ़ा।
देवानंद विरक्त थे, विद्वान थे, शास्त्रज्ञ थे, फिर भी उन्होंने प्रभु के क्रोधयुक्त वचनों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। भगवत्कृपा से उनकी बृद्धि शुद्ध हो गयी। उन्हें अपनी भूल का अनुभव होने लगा। वे प्रभु के शरणापन्न हुए और उन्होंने अपने पूर्व के भूल तथा अज्ञान में किये जाने वाले उपराध के लिए श्रीवास पण्डित से क्षमा याचना की। जब प्रभु की उनके ऊपर कृपा हो गयी, तब उनके भगवद्भक्त होने में क्या देर थी। वे उस दिन से परमभक्त बन गये।
प्रभु अपने भक्तों को भजन की प्रणाली और भजन किस प्रकार के बनकर करना चाहिये इसकी शिक्षा सदा दिया करते थे। एक दिन आप भक्तों को भगवन्नाम का माहात्म्य बता रहे थे। माहात्म्य बताते हुए उन्होंने कहा- ‘भक्त को अपने लिये तृण से भी नीचा समझना चाहिये और वृक्षों से भी अधिक सहनशील। स्वयं तो कभी मान की इच्छा करे नहीं, किंतु दूसरों को सदा सम्मान प्रदान करते रहना चाहिये। इस प्रकार होकर निरन्तर भगवन्नामों का ही चिंतन-स्मरण करते रहना चाहिये। सबसे अधिक सहनशीलता पर ध्यान देना चाहिये। जिसमें सहनशीलता नहीं, वह चाहे कितना भी बड़ा विद्वान, तपस्वी और पण्डित ही क्यों न हो, कभी भी भगवत्कृपा का अधिकारी नहीं बन सकता। सहनशीलता का पाठ वृक्षों से लेना चाहिये। वृक्ष किसी से कटु वचन नहीं बोलते, उन्हें जो ईंट-पत्थर मारता है तो उस पर रोष न करके उलटे प्रहार करने वाले को पके हुए फल ही देते हैं। भूख-प्यास लगने पर भोजन तथा जल की याचना नहीं करते। सदा एकांत में ही रहते हैं। इसी प्रकार भक्त को जनसंसद से पृथक रहकर किसी से किसी बात की याचना न करते हुए अमानी और सहनशील बनकर भगवत-चिंतन करते रहना चाहिये।‘ इसके अनन्तर आपने-
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।
इस श्लोक की व्याख्या भक्तों को बतायी। तीन बार मना करने से यह अभिप्राय है कि कलियुग में इससे सरल और सुगम उपाय कोई दूसरा है ही नहीं। एक हृदयहीन जड़-बुद्धि वाला विद्यार्थी भी प्रभु की इस व्याख्या को सुन रहा था। उसने कहा- ‘यह तो सब शास्त्रों में अर्थवाद है। नामकी प्रशंसा में वैसे ही बहुत-सी चढ़ा-बढ़ाकर बातें कह दी हैं। वास्तव में कोरे नाम से कुछ नहीं होता।
लोगों की नाम में प्रवृत्ति हो, इसलिये ऐसे वाक्य कह दिये हैं।’ इतना सुनते ही प्रभु ने अपने दोनों कान बंद कर लिये और ‘श्रीहरि’ ‘श्रीहरि’ कहकर वे सभी भक्तों से कहने लगे- ‘भगवन्नाम में अर्थवाद कहने वाले को पातक लगता ही है, सुनने वाले को भी पाप होता है। इसलिये चलो, हम सभी गंगा जी में सचैल स्नान करें, तभी इस भगवन्नाम में अर्थवाद सुनने वाले पाप से मुक्त हो सकेंगे।’ यह कहकर प्रभु भक्तों के सहित गंगास्नान के लिये चले गये। सभी भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति के सहित सुरसरि के सुंदर सुशीतल नीर में स्नान किया।
क्रमशः
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