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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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स्नान कर लेने के अनन्‍तर प्रभु ने सभी भक्तों के सम्‍मुख भक्ति की महिमा का वर्णन किया।
प्रभु भक्तों को लक्ष्‍य करके उन्‍हें समझाते हुए कहने लगे- ‘भाई! तुम्‍ही सोचो, जो अखिलकोटि ब्रह्माण्‍डनायक हैं, जिनके एक-एक रोम-कूप में अंसख्‍यों ब्रह्माण्‍ड समा सकते हैं, उन्‍हें कोई योग के ही द्वारा प्राप्‍त करना चाहे, तो वे उसके वश में केवल श्‍वास रोकने से ही कैसे आ सकते हैं! कोई कहे कि हम तत्त्वों की संख्‍या कर-करके उनका पता लगा लेंगे, तो यह उसकी कोरी मूर्खता है। भला, जो बुद्धि से अतीत हैं, जिनके लिये चारों वेद नेति-नेति कहकर कथन कर रहे हैं उनका ज्ञान सांख्‍य के द्वारा हो ही कैसे सकता है। अब रही धर्म की बात सो धर्म तो उलटा बंधन का ही हेतु है। धर्म से तो तीनों लोकों के विषय-सुखों की ही प्राप्ति हो सकती है। वह भी एक प्रकार से सुवर्ण की बेड़ी ही है। कोई जप से अथवा केवल त्‍याग से ही उन्‍हें प्रसन्‍न करना चाहे तो वे कैसे प्रसन्‍न हो सकते हैं? त्‍याग कोई कर ही क्‍या सकता है? उनकी कृपा के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। भक्ति से हीन होकर जप, तप, पूजा, पाठ, यज्ञ, दान, अनुष्‍ठान आदि कैसे भी सत्‍कर्म क्‍यों न किये जायँ, सभी व्‍यर्थ है। इस बात को भगवान से उद्धव से स्‍वयं ही कहा है-

न साधयति मां योगो न सांख्‍यं धर्म उद्धव।
न स्‍वाध्‍यायस्‍तपस्‍त्‍यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता।

इस प्रकार भक्तों को भगवद्भक्ति की शिक्षा देते हुए प्रभु सभी को अपूर्व सुख और आनन्‍द पहुँचाते हुए नवद्वीप में भाँति-भाँति की लीलाएँ करने लगे।

नदिया में प्रेम-प्रवाह और क़ाज़ी का अत्‍याचार…..

प्रेम ही ‘जीवन’ है। जिस जीवन में प्रेम नहीं, वह जीवन नहीं जंजाल है। जहाँ प्रेम है, वही वास्‍तविक प्रेम की छटा दृष्टिगोचर होती है। कहीं प्रेमियों का सम्मिलन देखिये, प्रेमियों की वार्ता सुनिये अथवा प्रेमियों के हास-परिहास, खान-पान अथवा उनके मेलों-उत्‍सवों में सम्मिलित हूजिये, तब आपको पता चलेगा कि वास्‍तविक जीवन कैसा होता है और उसमे कितना मजा है, कितनी मिठास है। उस मिठास के सामने संसार के जितने मीठे कहे जाने वाले पदार्थ हैं, सभी फीके-फीके–से प्रतीत होने लगते हैं। किसी भाग्‍यवान पुरुष के शरीर में ही प्रेम प्रकट होता है और उसकी छत्रछाया में जितने भी प्राणी आकर आश्रय ग्रहण करते हैं, वे सभी पावन बन जाते हैं, उन्‍हें भी वास्‍तविक जीवन का सुख मिल जाता है। प्रेमी जिस स्‍थान में निवास करता है, वह भूमि पावन बन जाती है, जिस स्‍थान में वह क्रीड़ा करता है, वह स्‍थान तीर्थ बन जाता है, और जिन पुरुषों के साथ वह लीला करता है, वे बड़भागी पुरुष भी सदा के लिये अमर बन जाते हैं। जिस नवद्वीप में प्रेमवतार गौरचन्‍द्र उदित होकर अपनी सुखद शीतल किरणों के प्रकाश से संसारी तापों से आक्‍लांत प्राणियों को शीतलता प्रदान कर रहे हों उस भाग्‍यवती नगरी के उस समय के आनन्‍द का वणन कर ही कौन सकता है? महाप्रभु के कीर्तनारम्‍भ से सम्‍पूर्ण नवद्वीप एक प्रकार से आनन्‍द का घर ही बन गया था। वहाँ हर समय श्रीकृष्‍ण-कीर्तन की सुमधुर ध्‍वनि सुनायी पड़ती थी।

जगाई-मधाई के उद्धार से लोग संकीर्तन का महत्त्व समझने लगे। हजारों लोग सदा प्रभु के दशर्नों के लिये आते। वे प्रभु के लिये भाँति-भाँति की भेंटे लाते। कोई तो सुंदर पुष्‍पों की मालाएँ लाकर प्रभु के गले में पहनाता, कोई स्‍वादिष्‍ट फलों को ही उपहारस्‍वरूप प्रभु के सामने रखता। बहुत-से सुंदर-सुंदर पकवान अपने घरों से लाकर प्रभु को भेंट करते। प्रभु उनमें से थोड़ा-सा लेकर सभी के मन को प्रसन्‍न कर देते। सभी आकर पूछते- प्रभो! हमलोग भी कुछ कर सकते हैं? क्‍या हमलोगों को भी कृष्‍ण कीर्तन का अधिकार है?’ प्रभु कहते- ‘कृष्‍ण-कीर्तन सब कोई कर सकता है। इसमें तो अधिकार-अनधिकारी का प्रश्‍न ही नहीं। भगवन्‍नाम के तो सभी अधिकारी हैं। नाम में विधि-निषेध अथवा ऊँच-नीच का विचार ही नहीं। आपलोग प्रेम-पूर्वक श्रीकृष्‍ण-कीर्तन कर सकते हैं।‘ इस पर लोग पूछते- ‘प्रभो! हमलोग तो जानते भी नहीं, कीर्तन कैसे किया जाता है। हमें आजतक संकीर्तन की शिक्षा ही नहीं मिली और न हमने इसकी पद्धति किसी पुस्‍तक में ही पढ़ी।प्रभु हंसकर कहने लगते- ‘नाम-संकीर्तन में सीखना ही क्‍या है, यह तो बड़ा सरल मार्ग है। इसके लिये विज्ञता अथवा बहुज्ञता की आवश्‍यकता नहीं। सभी कोई इसे कर सकते हैं। देखो, इस प्रकार ताली बजाकर-

हरि हरये नम: कृष्‍ण यादवाय नम:।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन।।

इस मन्त्र को या और किसी मन्त्र को जिसमें भगवान के नामों का ही कीर्तन हो, गाते गये, दस-पांच अपने साथी इकट्ठे कर लिये और सभी मिलकर नाम-संकीर्तन करने लगे। तुम लोग नियमपूर्वक महीने भर तक करो तो सही, फिर देखना कितना आनन्द आता है।’ लोग प्रभु के मुख से भगवन्नाम-माहात्म्य और कीर्तन की महिमा सुनते और वहीं उन्हें दिखा-दिखाकर संकीर्तन करने लगते। जहाँ वे भूल करते प्रभु उन्हें फौरन बता देते। इस प्रकार उनसे जो भी पूछने आते, उन सभी को भगवन्नाम संकीर्तन का ही उपदेश करते। लोग महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके अपने-अपने घरों को चले आते और दूसरे ही दिन से संकीर्तन आरम्भ कर देते। पहले तो लोग ताली बजा-बजाकर ही कीर्तन करते थे, किंतु ज्यों-ज्यों उन्हें आनन्द आने लगा, त्यों-ही-त्यों उनके संकीर्तन के साथ ढोल-करताल तथा झाँझ-मृदंग आदि वाद्यों का ही समावेश होने लगा। एक को कीर्तन करते देखकर दूसरे को भी उत्साह होने लगा और उसने भी दस-पांच लोगों को इकट्ठा करके अपनी एक छोटी संकीर्तन-मण्‍डली बना ली और दोनों समय नियम से संकीर्तन करने लगे। इस प्रकार प्रत्येक मुहल्ले में बहुत-सी संकीर्तन मण्‍डलियां स्थापित हो गयीं। अच्छे-अच्छे घरों के लोग संध्‍या-समय अपने सभी परिवार वालों को साथ लेकर संकीर्तन करते। जिसमें स्त्री-पुरुष, छोटे-बडे़ सभी सम्मिलित होते।

भक्त सदा आनन्द में छके-से रहते। परस्पर एक-दूसरे का आलिंगन करते। दो भक्त जहाँ भी रास्ते में मिलते, वहीं एक-दूसरेसे लिपट जाते। कोई दूसरे को साष्‍टांग प्रणाम ही करते, वह जल्दी से उनकी चरण-रज लेने को दौड़ता। कभी दस-बीस भक्त मिलकर संकीर्तन के पदों का ही गायन करने लगे।
क्रमशः

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