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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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कोई बाजार में सबके सामने नृत्य करते ही निकलते। इस प्रकार भक्तिरूपी नदिया में सदा प्रेम की तरंगें ही उठती रहतीं। रात्रि-दिन शंख, घड़ियाल, तुरही, ढोल, करताल, झांझ, मृदंग तथा अन्यान्य प्रकार के वाद्यों से सम्पूर्ण नवद्वीप नगर गूंजता ही रहता।

महाप्रभु भक्तों को साथ लेकर रात्रिभर संकीर्तन ही करते रहते। प्रात:काल घंटे-दो-घंटे के लिये सोते। उठते ही भक्तों को साथ लेकर गंगा-स्नान करने के लिये चले जाते। भक्तों को तो लोगों ने सदा से ही ‘बावले’ की उपाधि दे रखी है। इन बावले भक्तों का स्नान भी विचित्र प्रकार का होता। ये लोग सदा अफीमची की तरह पिनक में ही बने रहते। मद्यप के समान नशे में ही झूमते रहते और पागलों के समान ही बड़बड़ाया करते। स्नान करते-करते किसी ने किसी की धोती ही फेंक दी है, तो कोई किसी के ऊपर जल ही उलीच रहा है। कोई तैर कर उस पार जा रहा है, तो कोई प्रवाह के विरुद्ध ही तैरने का दुस्साहस कर रहा है। इस प्रकार घंटों में इनका स्नान समाप्त होता। तब प्रभु सब भक्तों के सहित घर आते।देवपूजन, तुलसीपूजन आदि कर्मों को करते। तब तक विष्‍णुप्रिया भोजन बनाकर तैयार कर लेतीं। जल्दी से आप भोजनों पर बैठ जाते। भक्तों के बिना साथ लिये इन्हें भोजन अच्छा ही नहीं लगता था, इसलिये दस-पांच भक्त सदा इनके साथ ही भोजन करते। भोजन करते-करते कभी तो माता से कहते- ‘अम्मा! तेरी बहू के हाथ में जाने क्या जादू है।’ सभी चीजों में बड़ी भारी मिठास आ जाती है। और तो और, साग भी तो मीठा लगता है।’ पास बैठे हुए भक्त से कहने लगते- ‘क्यों जी! ठीक है न? तुम्हें साग में भी मिठास मालूम पड़ती है!’ यह सुनकर सभी भक्त हंसने लगते। विष्‍णुप्रिया जी भी मन-ही-मन मुसकराने लगतीं।

भोजन के अनन्तर आप थोड़ी देर विश्राम करते। तीसरे पहर फिर धीरे-धीरे सभी भक्त प्रभु के घर आकर एकत्रित हो जाते। तब प्रभु उनके साथ श्रीकृष्‍ण-कथाएँ कहने लगते। कभी कोई श्रीमद्भागवत का ही प्रकरण छिड़ गया है। कभी कोई ‘गीत-गोविन्द’ के पद की ही व्याख्‍या कर रहा है।

सांयकाल के समय भक्तों को साथ लेकर प्रभु नगर-भ्रमण करने के लिये निकलते। इस प्रकार इनका सभी समय भक्तों के सहवास में ही व्यतीत होता। क्षणभर भी भक्तों का पृथक् होना इन्हें असह्य-सा प्रतीत होता। भक्तों की भी प्रभु के चरणों में अहैतु की भक्ति थी। वे प्रभु के संकेत के अनुसार चेष्‍टाएँ करते। वे सदा प्रभु के मुख की ही ओर देखते रहते कि किस समय प्रभु के मुख पर कैसे भावों के लक्षण प्रतीत होते हैं। उन्हीं भावों के अनुसार वे क्रियाएँ करने लगते। इस कारण ईर्ष्‍या करना ही जिनका स्वभाव है, जो दूसरे के अभ्‍युदय तथा गौरव को देख ही नहीं सकते, ऐसे खल पुरुष सदा प्रभु की निन्दा किया करते। प्रभु उन लोगों की बातों के ऊपर ध्‍यान ही नहीं देते थे। जब कोई भक्त किसी के सम्बन्ध की ऐसी बातें छेड़ भी देता तो आप उसी समय उसे डांटकर कह देते ‘अन्यस्य दोषगुणचिन्तनमाशु त्यक्त्वासेवाकथारसमहो नितरां पिब त्वम्’ दूसरोंकी निन्दा-स्तुति करना छोड़कर तुम निरन्तर श्रीकृष्‍ण-कीर्तन में ही अपने मन को क्यों नहीं लगाते। इस कारण प्रभु के सम्मुख किसी की निन्दा-स्तुति करने की भक्तों को हिम्मत ही नहीं होती थी।
प्रभु के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर द्वेषी लोगों ने मुसलमानों को भड़काया। वे जानते थे कि हम निमाई पण्डित का वैसे तो कुछ बिगाड़ नहीं सकते। उनके कहने में हजारों आदमी हैं। हाँ, यदि शासकों की ओर से इन्हें पीड़ा पहुँचायी जायगी, तब तो इनका सभी गौरहरिपना ठीक हो जायगा। उस समय मुसलमानों का शासन था। इसलिये मुसलमानों की शिकायतों पर विशेष ध्‍यान दिया जाता था। इसलिये खलों ने मुसलमानों को ही बहकाना शुरू किया- ‘निमाई पण्डित अशास्त्रीय काम करता है। उसकी देखा-देखी सम्पूर्ण नगर में कीर्तन होने लगा है। दिन-रात्रि कीर्तन की ही ध्‍वनि सुनायी पड़ती है। इस कोलाहल के कारण रात्रि में लोगों को निद्रा भी तो नहीं आने पाती। क़ाज़ी से कहकर इन लोगों को दण्‍ड दिलाना चाहिये। न जाने ये सब मिलकर क्या कर बैठें?’ मुसलमानों को भी यह बात जँच गयी। वे भला हिंदु धर्म का अभ्‍युदय कब देख सकते थे! इसलिये सभी ने मिलकर क़ाज़ी के यहाँ संकीर्तनके विरुद्ध अभियोग चलाया। उस समय बंगाल-सूबे में अभियोगों के निर्णय करने का काम काजियों के ही अधीन था। जमींदार, राजा अथवा मण्‍डलेश्‍वर कुछ गांवों का बादशाह से नियत समय के लिये ठेका ले लेते और जितने में ठेका लेते उतने रूपये तो कर उगाहकर बादशाह को दे देते, जो बचते उसे अपने पास रख लेते। दीवानी और फौजदारी के जितने मामले होते उनका फैसला क़ाज़ी किया करते। बादशाह की ओर से स्थान-स्थान पर क़ाज़ी नियुक्त थे।

उस समय बंगाल के नवाब हुसेनशाह थे। वे बंगाल के स्वतन्त्र शासक थे। उनकी ओर से फौजदार चाँदखाँ नाम के क़ाज़ी नवद्वीप में भी नियुक्त हुए थे। बादशाह के दरबार में इनका बड़ा सम्मान था। कुछ लोगों का कहना है, ये हुसेनशाह के विद्यागुरु थे। कुछ भी हो, चाँदखाँ सहृदय, समझदार और शान्तिप्रिय मनुष्‍य थे। हिन्दुओं से वे अ‍कारण नहीं चिढ़ते थे।

नीलाम्बर चक्रवर्ती के दौहित्र होने के नाते से वे महाप्रभु से भी परिचित थे। इसलिये लोगों के बार-बार शिकायत करने पर भी उन्होंने महाप्रभु के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करनी चाही। जब लोगों ने नित्यप्रति उनसे संकीर्तन की शिकायत करनी आरम्भ कर दी और उन पर अत्यधिक जोर डाला गया तब उनकी भी समझ में यह बात आ गयी कि ‘हाँ, ये लोग दिन-रात्री बाजे बजा-बजाकर शोर मचाते रहते हैं। ऐसा भी क्या भजन-कीर्तन? यदि भजन ही करना है, तो धीरे-धीरे करें। यही सोचकर वे एक दिन अपने दल-बल के सहित कीर्तनवालों को रोकने के लिये चले। बहुत-से लोग प्रेम में उन्मत्त होकर संकीर्तन कर रहे थे। इनके आदमियों ने उनसे कीर्तन बंद कर देने के लिये कहा; किंतु वे भला किसी की सुनने वाले थे। मना करने पर भी वे बराबर कीर्तन करते ही रहे। इस पर क़ाज़ी को गुस्सा आ गया और उसने घुसकर कीर्तन करने वालों के ढोल फोड़ दिये।
क्रमशः

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