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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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काजी भक्तों से डांटकर कहने लगे- ‘खबरदार, आज से किसी ने इस तरह शोर मचाया तो सभी को जेल खाने भेज दूंगा।’ बेचारे भक्त डर गये। उन्होंने संकीर्तन बंद कर दिया। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ भी सकीर्तन हो रहा था, क़ाज़ी के आदमी वहाँ-वहाँ जाकर संकीर्तन को बंद कराने लगे। सम्पूर्ण नगर में हाहाकर मच गया।लोग संकीर्तन के संबंध में भाँति-भाँति की बातें कहने लगे। कोई तो कहता- ‘भाई! यहाँ मुसलमानी शासन में संकीर्तन हो ही नहीं सकता। हम तो इस देश को परित्‍याग करके किसी ऐसे देश में जाकर रहेंगे, जहाँ सुविधापूर्वक संकीर्तन कर सकेंगे।’ कोई कहते ‘अजी! जोर-जोर से नाम लेने में ही क्‍या लाभ? यदि क़ाज़ी मना करता है, तो धीरे-धीरे ही नाम-जप कर लिया करेंगे। किसी प्रकार भगवन्‍नाम-जप होना चाहिये।’ इस प्रकार भयभीत होकर लोग भाँति-भाँति की बातें कहने लगे।

दूसरे दिन सभी मिलकर महाप्रभु के निकट आये और उन्‍होंने रात्रि में जो-जो घटनाएँ हुईं सब कह सुनायी और अंत में कहा- ‘प्रभो! आप तो हमसे संकीर्तन करने के लिये कहते हैं, किंतु हमारे ऊपर संकीर्तन करने से ऐसी-ऐसी विपत्तियाँ आती हैं। अब हमारे लिये क्‍या आज्ञा होती है। आपकी आज्ञा हो तो हम इस देश को छोड़कर किसी ऐसे देश में चले जायँ, जहाँ सुविधापूर्वक संकीर्तन कर सकें। या आज्ञा हो तो संकीर्तन करना ही बंद कर दें। बहुत-से लोग तो डर के कारण भागे भी जा रहे हैं।’

प्रभु ने कुछ दृढ़ता के साथ रोष में आकर कहा- ‘तुम लोगों को न तो देश का ही परित्‍याग करना होगा और संकीर्तन को ही बंद करना! तुम लोग जैसे करते रहे हो, उसी तरह संकीर्तन करते रहो। मैं उस क़ाज़ी को और उसके साथियों को देख लूँगा, वे कैसे संकीर्तन को रोकते हैं? तुम लोग तनिक भी न घबड़ाओ।’ प्रभु के ऐसे आश्‍वासन को सुनकर सभी भक्त अपने-अपने घरों को चले गये। बहुत-से तो प्रभु के आज्ञानुसार पूर्ववत ही संकीर्तन करते रहे। किंतु उनके मन में सदा डर ही बना रहता था। बहुतों ने उसी दिन से संकीर्तन करना बंद ही कर दिया।

लोगों को डरा हुआ देखकर प्रभु ने सोचा कि इस प्रकार काम नहीं चलने का। लोग क़ाज़ी के डर से भयभीत हो गये हैं। जब तक मैं क़ाज़ी का दमन न करूँगा, तब तक लोगों का भय दूर न होगा। यह सुनकर पालक आश्‍चर्य करेंगे कि क़ाज़ी के पास अस्‍त्र-शस्‍त्रों से सुसज्जित बहुत-सी सेना है, बादशाह की ओर उसे अधिकार प्राप्‍त है। उसके पास राजबल, धनबल, सैन्‍यबल तथा अधिकारबल आदि सभी मौजूद हैं। उसका दमन अहिंसाप्रिय, शांत स्‍वभाव वाले, अस्‍त्र-शस्‍त्रहीन, ढोल-करताल के लय के साथ नृत्‍य करने वाले निमाई पण्डित कैसे कर सकेंगे? 

क़ाज़ी की शरणागति…..

बिना मुकुट के राजा भी होते हैं और बिना शस्‍त्र के सेना भी लड़ सकती है। जो मुकुटधारी राजा अथवा महाराजा होते हैं, उनके तो प्राय: जनता के ऊपर भय से आधिपत्‍य होता है, वे भीतर से उससे द्वेष भी रख सकते हैं और जनता कभी-कभी उनके विरुद्ध बलवा भी कर सकती है, किंतु जो बिना मुकुट के राजा होते हैं उनका तो जनता के हृदयों पर आधिपत्‍य होता है। वे तो प्रेम से ही सभी लोगों को अपने वश में कर सकते हैं। चाहे मुकुटधारी राजा की सेना रणक्षेत्र से भय के कारण भाग आवे, चाहे उसकी पराजय ही हो जाय, किंतु जिनका जनता के हृदयों के ऊपर आधिपत्य है, जनता के अन्त:करण पर जिनके शासन की प्रेम-मुहर लगी हुई है, उनके सैनिक चाहे शस्त्रधारी हों अथवा बिना शस्त्र के, बिना जय प्राप्त किये मैदान से भागते ही नहीं। क्योंकि वे अपने प्राणों की कुछ भी परवा नहीं करते। जिसे अपने प्राणों की कुछ भी परवा नहीं, जो मृत्यु का नाम सुनकर तनिक भी विचलित न होकर उसका सर्वदा स्वागत करने के लिये प्रस्तुत रहता है, उसके लिये संसार में कोई काम दुरूह नहीं। उसे इन बाह्यशस्त्रों की उतनी अधिक अपेक्षा नहीं, उसका तो साहस ही शस्त्र है। वह निर्भिक होकर अपने साहसरूपी शस्त्र के सहारे अन्याय के पक्ष लेने वाले का पराभव कर सकता है। फिर भी वह अपने विरोधी के प्रति किसी प्रकार के बुरे विचार नहीं रखता। वह सदा उसके हित की ही बात सोचता रहता है, अन्त में उसका भी कल्याण हो जाता है। प्रेम में यही तो विशेषता है। प्रेममार्ग में कोई शत्रु ही नहीं। घृणा, द्वेष, कपट, हिंसा अथवा अकारण कष्‍ट पहुँचाने के विचार तक उस मार्ग में नहीं उठते, वहाँ तो ये ही भाव रहते हैं-

सर्वे कुशलिन: सन्तु सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्‍यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्।

इसी का नाम ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’, ‘सविनय अवज्ञा’ अथवा ‘सत्याग्रह’ है। महाप्रभु गौरांगदेव ने संकीर्तन रोकने के विरोध में इसी मार्ग का अनुसरण करना चाहा। क़ाज़ी की नीच प्रवृत्तियों के दमन करने के निमित्त उन्होंने इसी उपाय का अवलम्बन किया। सब लोगों से उन्होंने कह दिया- ‘आप लोग घबड़ायँ नहीं, मैं स्वयं क़ाज़ी के सामने संकीर्तन करता हुआ निकलूंगा, देखें, वह मुझे संकीर्तन से किस प्रकार रोकता है?’ प्रभु के ऐसे आश्‍वासन से सभी को परम प्रसन्नता हुई और सभी अपने-अपने घरों को चले गये।दूसरे दिन महाप्रभु ने नित्यानन्द जी को आज्ञा दी कि सम्पूर्ण नगर में इस संवाद को सुना आओ कि ‘हम आज सायंकाल के समय क़ाज़ी की आज्ञा के विरुद्ध नगर में संकीर्तन करते हुए निकलेंगे। संध्‍या के समय सभी लोग हमारे घर पर एकत्रित हों और प्रकाश के लिये एक-एक मशाल भी साथ लेते आवें।’ नित्यानन्द जी तो बहुत दिन से यही बात चाहते भी थे। उनकी इच्छा थी कि ‘एक दिन महाप्रभु सम्पूर्ण नगर में संकीर्तन करते हुए निकलें तो लोगों को पता चल जाय कि संकीर्तन में कितना माधुर्य है। उन्हें विश्‍वास था कि जो लोग संकीर्तन का विरोध करते हैं, यदि वे लोग एक दिन भी गौरांग के प्रेम-नृत्य को देख लेंगे, तो वे सदा के लिये गौरांग के तथा उनके संकीर्तन के भक्त बन जायंगे। महाप्रभु के खुलकर कीर्तन करने से भयभीत भक्तों का भय भी दूर भाग जायगा और अन्य लोगों को भी फिर संकीर्तन करने का साहस होगा।
क्रमशः

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