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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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बहुत-से लोग हृदय से संकीर्तन के समर्थक हैं, किंतु क़ाज़ी के भय से उनकी कीर्तन करने से हिम्मत नहीं होती।
प्रभु के प्रोत्साहन की ही आवश्‍यकता है।’ इन बातों को नित्यानन्द जी मन-ही-मन में बहुत दिनों से सोच रहे थे। किंतु उन्होंने किसी पर अपने इन भावों को प्रकट नहीं किया। आज स्वयं महाप्रभु को नगर-कीर्तन करने के लिये उद्यत देखकर उनके आनन्द का पारावार नहीं रहा। वे हाथ में घण्‍टा लेकर नगर के मुहल्ले-मुहल्ले और गली-गली में घर-घर घूम-घूमकर इस शुभ संवाद को सुनने लगे। पहले वे घण्‍टे को जोरों से बजा देते। घण्‍टे की ध्‍वनि सुनकर बहुत-से स्त्री-पुरुष वहाँ एकत्रित हो जाते, तब नित्यानन्द जी हाथ उठाकर कहते- ‘भाइयो! आज शाम को श्रीगौरहरि अपने सुमधुर संकीर्तन से सम्पूर्ण नगर के लोगों को पावन बनावेंगे। नगरवासी नर-नारियों की चिरकाल की मनोवांछा आज पूरी होगी। सभी लोगों को आज प्रभु के अद्भुत और अलौकिक नृत्य के रसास्वादन का सौभाग्य प्राप्‍त होगा। सभी भाई संकीर्तनकारी भ‍क्तों के स्वागत के निमित्त अपने-अपने घरों को सुन्दरता के साथ सजावें और शाम को सभी एक-एक मशाल लेकर प्रभु के घर पर आवें। वहाँ किसी प्रकार का शोर-गुल न मचावें। बस, संकीर्तन का सुख लूटते हुए अपने जीवन को कृतकृत्य बनावें।
सभी लोग इस मुनादी को सुनते और आनन्‍द से उछलने लगते। सामूहिक कार्यों में एक प्रकार का स्‍वाभाविक जोश आ जाता है। उस जोश में सभी प्रकार के लोग एक अज्ञातशक्ति के कारण खिंचे-से चले आते हैं, जिनसे कभी किसी शुभकाम की आशा नहीं की जाती वे भी जोश में आकर अपनी शक्ति से बहुत अधिक कार्य कर जाते हैं, इसीलिये तो कलिकाल में सभी कार्यों के लिये संघशक्ति को ही प्रधानता दी गयी है।

नवद्वीप में ऐसा नगर-कीर्तन पहले कभी हुआ ही नहीं था। वहाँ के नर-नारियों के लिये यह एक नूतन ही वस्‍तु थी। लोग बहुत दिनों से निमाई के नृत्‍य और कीर्तन की बातें तो सुनते थे, किंतु उन्‍होंने आज तक कभी निमाई का नृत्‍य तथा कीर्तन देखा नहीं था। श्रीवास पण्डित के घर के भीतर संकीर्तन होता था और उसमें खास-खास भक्‍तों के अतिरिक्‍त और कोई जा ही नहीं सकता था, इसीलिये नगरवासियों की कीर्तनानंद देखने की इच्‍छा मन-ही-मन में द‍ब-सी जाती। आज नगर कीर्तन की बात सुनकर सभी की दबी हुई इच्‍छाएं उभड़ पड़ी। लोग अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार संकीर्तन के स्‍वागत के निमित्त भाँति-भाँति की तैयारियां करने लगे। कहावत है ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलने लगता है’ जब भगवद्भक्‍त अपने-अपने घरों को बंदनवार, कदलीस्‍तम्‍भ और ध्‍वजा-पताकाओं से सजाने लगे, तब उनके समीप रहने वाले शाक्त अथवा विभिन्‍न पन्‍थवाले लोग भी शोभा के लिये अपने-अपने दरवाजों के सामने झंडियां लगाने लगे, जिससे हमारे घर के कारण नगर की सजावट में बाधा न पड़े। किसी जोशीले नये काम के लिये सभी लोगों के हृदयों में स्‍वाभाविक ही सहानुभुति उत्‍पन्‍न हो जाती है।
उस कार्य की घूम-घाम से तैयारियां होते देखकर विपक्षी भी उसमें सहयोग देने लगते हैं। उस समय उनके विरोधी भाव दूर हो जाते हैं, कारण कि उग्र विचारों का प्रभाव तो सभी प्रकारके लोगों के ऊपर पड़ता है। इसलिये जो लोग अपनी नीच प्रकृति के कारण संकीर्तन तथा श्रीगौरांग से अत्‍यंत ही द्वेष मानते थे, उन अकारण जलने वाले खल पुरुषों के घरों को छोड़कर सभी प्रकार के लोगों ने अपने-अपने घरों को भलीभाँति सजाया। नगर की सुंदर सड़कों पर छिड़काव किया गया। स्‍थान-स्‍थानपर धूप, गुग्‍गुल आदि सुगन्धित वस्‍तुएं जलायी गयीं। सड़क के किनारे के दुमंजले-तिमंजले मकान लाल, पीली, हरि, नीली आदि विविध प्रकार की रंगीन साड़ियों से सजाये गये थे। कहीं कागज की पताकाएँ फहरा रही हैं तो कहीं रंगीन कपड़ों की झंडियाँ शोभा दे रही हैं।
भक्‍तों ने अपने-अपने द्वारों पर मंगलसूचक कोरे घड़े जल से भर-भरकर रख दिये हैं। द्वारों पर गहरों के सहित केले के वृक्ष बड़े ही सुदंर तथा सुहावने ने दिखायी देते थे। लोगों का उत्‍साह इतना अधिक बढ़ गया था कि वे बार-बार यही सोचते थे कि हम संकीर्तन के स्‍वागत के निमित्त क्‍या-क्‍या कर डालें। संकीर्तन-मण्‍डल किधर होकर निकलेगा और कहाँ जाकर उसका अंत होगा, इसके लिये कोई पथ तो निश्चित हुआ ही नहीं था। सभी अपनी-अपनी भावना के अनुसार यही समझते थे कि हमारे द्वार की ओर होकर संकीर्तन-मण्‍डल जरूर आवेगा। सभी का अनुमान था, हमें संकीर्तनकारी भक्‍तों के स्‍वागत-सत्‍कार करने का सौभाग्‍य अवश्‍य प्राप्‍त हो सकेगा। इसलिये वे महाप्रभु के सभी साथियों के स्‍वागतार्थ भाँति-भाँति की सामग्रियाँ सजा-सजाकर रखने लगे। इस प्रकार सम्‍पूर्ण नवद्वीप में चारों ओर आनन्‍द–ही-आनन्‍द छा गया। इतनी सजावट-तैयारियाँ किसी महोत्‍सव पर अथवा किसी महाराज के आने पर भी नगर में नहीं होती थीं। चारों ओर धूम-धाम मची हुई थी। भक्‍तों के हृदय मारे प्रेम के बांसों उछल रहे थे। तैयारियां करते-करते ही बात-की-बात में संध्‍या हो गयी।

क़ाज़ी की शरणागति….

महाप्रभु भी घर के भीतर संकीर्तन की तैयारियाँ कर रहे थे। उन्‍होंने विशेष-विशेष भक्‍तों को बुलाकर नगर-कीर्तन की सभी व्‍यवस्‍था समझा दी। कौन आगे रहेगा, कौन उसके पीछे रहेगा और कौन सबसे पीछे रहेगा, ये सभी बातें बता दीं। किस सम्‍प्रदाय में कौन प्रधान नृत्‍यकारी होगा, इसकी भी वयवस्‍था कर दी।

अब प्रभु के अन्‍तरंग भक्त गदाधर ने महाप्रभु श्रृंगार किया। प्रभु के घुंघराले काले-काले बालों में भाँति-भाँति के सुगन्धित तैल डालकर उसका जूरा बांधा गया, उसमें मालती, चम्‍पा आदि के सुगन्धित-पुष्‍प गूंथे गये। नासिका पर ऊर्ध्‍व-पुण्‍ड्र लगाया गया। केसर-कुंकुम की महीन बिन्दियों से मस्‍तक तथा दोनों कपोलो के ऊपर पत्रावली बनायी गयी। उनके अंग-प्रत्‍यंग की सजावट इस प्रकार की गयी कि एक बार कामदेव भी देखकर लज्जित हो उठता।

महाप्रभु ने एक बहुत ही बढ़िया पीताम्‍बर अपने शरीर पर धारण किया। नीचे तक लटकती हुई थोड़ी किनारीदार चुनी हूई पीले रंग की धोती बड़ी ही भली मालूम होती थी। गदाधर ने घुटनों तक लटकने वाला एक बहुत ही बढ़िया हार प्रभु के गले में पहना दिया।
क्रमशः

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