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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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उस हार के कारण प्रभु का तपाये हुए सुवर्ण के समान शरीर अत्यंत ही शोभित होने लगा। मुख में सुंदर पान की बीरी लगी हुई थी, इससे बायीं तरफ का कपोल थोड़ा उठा हुआ-सा दीखता था। दोनों अरुण अधर पान की लालिमा से और भी रक्तवर्ण के बन गये थे। उन्हें बिम्बा-फल की उपमा देने में भी संकोच होता था। कमान के समान दोनों कुटिल भ्रुकुटियों के मध्य में चारों ओर केसर लगाकर बीच में एक बहुत ही छोटी कुंकुम की बिन्दी लगा दी थी, पीतवर्ण के शरीर में वह लाल बिन्दी लाल रंग के हीरे की कनी की भाँति दूर ही चमक रही थी। इस प्रकार भलीभाँति श्रृंगार करके प्रभु घर से बाहर निकले। प्रभु के बाहर निकलते ही द्वारपर जो अपार भीड़ प्रभु की प्रतीक्षा कर रही थी, उसमें एकदम कोलाहल होने लगा। मानो समुद्र में ज्वार आ गया हो। सभी जोरों से ‘हरि बोल,’ ‘हरि बाल’ कहकर दिशा- विदिशाओं को गुँजाने लगे। लोग प्रभु के दर्शनों के लिये उतावले हो उठे। एक-दूसरे को धक्का देकर सभी पहले प्रभु के पाद-पद्मों के निकट पहुँचना चाहते थे।
प्रभु ने अपने दोनों हाथ उठाकर भीड़ को शांत हो जाने का संकेत किया। देखते-ही-देखते सर्वत्र सन्नाटा छा गया। उस समय ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो यहाँ कोई है ही नहीं। गदाधर ने प्रभु के दोनों चरणों में नूपुर बांध दिये। फिर क्रमश: सभी भक्तों ने अपने-अपने पैरों में नूपुर पहन लिये। बायें पैर को ठमकाकर प्रभु ने नूपुरों की ध्वनि की। प्रभु के ध्वनि करते ही एक साथ ही सहस्त्रों भक्तों ने अपने-अपने नूपुरों का बजाया। भीड़ में आनन्द की तरंगें उठने लगीं। भीड़ में स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध तथा युवा सभी प्रकार के पुरुष थे। जाति-पांति का कोई भी भेद-भाव नहीं था, जो भी चाहे आकर संकीर्तन-समाज में सम्मिलित हो सकता था। किसी के लिये किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं थी। भीड़ मे जितने भी आदमी थे, प्राय: सभी के हाथों में एक-एक मशाल थी। लोगों की सूझ ही तो ठहरी। प्रकाश के लिये मशाल न लेकर उस दिन मशाल ले चलने का एक प्रकार से माहात्म्य ही बन गया था, मानो सभी लोग मिलकर अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार छोटे-बड़े आलोक के द्वारा नवद्वीप के चिरकाल के छिपे हुए अज्ञानान्धकार को खोज-खोजकर भगा देने के ही लिये कटिबद्ध होकर आये हैं। किसी के हाथ में बड़ी मशाल थी, किसी के छोटी। किसी-किसी ने तो दोनों हाथों में दो-दो मशालें ले रखी थीं। छोटे-छोटे बच्चे छोटी-छोटी मशालें लिये हुए ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ कहकर उछल रहे थे।
गोधूलि का सुखमय समय था। आकाश-मण्डल में स्थित भगवान दिवानाथ गौरचन्द्र के असह्यरूप-लावण्य से पराभव पाकर अस्ताचल में मुंह छिपाने के लिये उद्योग कर रहे थे। लज्जा के कारण उनका सम्पूर्ण मुख-मण्डल रक्तवर्ण का हो गया था। इधर आकाश में अर्धचन्द्र उदित होकर पूर्णचन्द्र के पृथ्वी पर अवतीर्ण होने की घोषणा करने लगे। शुक्ल पक्ष था, चांदनी रात्रि थी, ग्रीष्मकाल का सुखद समय था। सभी प्रेम में उन्मत्त हुए ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ कहकर चिल्ला रहे थे। प्रभु ने भक्तों को नियमपूर्वक खड़े हो जाने का संकेत किया। सभी लोग पीछे हट गये। संकीर्तन करने वाले भक्त आगे खड़े हुए। प्रभु ने भक्त-मण्डली को चार सम्प्रदायों में विभक्त किया। सबसे आगे वृद्ध सेनापति भक्ति-सेना के महारथी भीष्म पितामह के तुल्य श्री अद्वैताचार्य का सम्प्रदाय था। उस सम्प्रदाय के वे ही अग्रणी थे। इनके पीछे श्रीवास पण्डित अपने दल-बल के सहित डटे हुए थे। श्रीवास पण्डित के सम्प्रदाय में छटे हुए कीर्तन कला में कुशल सैकड़ों भक्त थे। इनके पीछे महात्मा हरिदास का सम्प्रदाय था। सबसे पीछे महाप्रभु अपने प्रधान-प्रधान भक्तों के सहित खड़े हुए। प्रभु के दायीं ओर नित्यानंद जी और बायीं ओर गदाधर पण्डित शोभायमान थे।सब लोगों के यथायोग्य खड़े हो जाने पर प्रभु ने नूपुर बजाकर इशारा किया। बस, प्रभु का संकेत पाना था कि ढोल-करतालों की मधुर ध्वनि से आकाशमण्डल गूंजने लगा। प्रेम-वारुणी में पागल-से बने हुए भक्त ताल-स्वर के सहित गा-गाकर नृत्य करने लगे। उस समय किसी को न तो अपने शरीर की सुधि रही और न बाह्य जगत का ही ज्ञान रहा। जिस प्रकार भूत-पिशाच से पकड़े जाने वाले मनुष्य होश-हवास भुलाकर नाचने-कूदने लगते हैं, उसी प्रकार भक्तगण प्रेम में विभोर होकर नृत्य करने लगे, किंतु कोई भी ताल-स्वर के विपरीत नहीं जाता था। इतने भारी कोलाहल में भी सभी ताल-स्वर के नियमों का भलीभाँति पालन कर रहे थे। सभी के पैर एक साथ ही उठते थे।
घुँघरुओं की रुनझुन-रुनझुन ध्वनि के साथ ढोल-करताल और झाँझ-मजीरों की आवाजें मिलकर विचित्र प्रकार की ही स्वर-लहरी की सृष्टि कर रही थीं। एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय से बिलकुल पृथक ही पदों का गायन करता था। वाद्य बजाने वाले भक्त नृत्य करते-करते बाद्य बजा रहे थे। ढोल बजाने वाले बजाते-बजाते दोहरे हो जाते और पृथ्वी पर लेट-लेटकर ढोल बजाने लगते। करताल बजाने वाले चारों ओर हाथ फेंक-फेंककर जोरों से करताल बजाते। झाँझ और मजीरा की मीठी-मीठी ध्वनि सभी के हृदयों में खलबली-सी उत्पन्न कर रही थी। नृत्य करने वाले के चारों ओर से घेरकर भक्त खडे़ हो जाते और वह स्वच्छन्द रीति से अनेक प्रकार के कीर्तन के भावों को दर्शाता हुआ नृत्य करने लगता। उसके सम्प्रदाय के सभी भक्त उसके पैरों के साथ पैर उठाते और उसकी नूपुर-ध्वनि के सहित अपनी नूपुर-ध्वनि को मिला देते। बीच-बीच में सम्पूर्ण लोग एक साथ जोरों से बोल उठते ‘हरि बोल,’ ‘हरि बोल’,’गौरहरि बोल।’ अपार भीड़ में से उठी हुई यह आकाश-मण्डल को कपाँ देने वाली ध्वनि बहुत देर तक अन्तरिक्ष में गूजंती रहती। भक्त फिर उसी प्रकार संकीर्तन में मग्न हो जाते।
सबसे पीछे नित्यानन्द और गदाधर के साथ प्रभु नृत्य कर रहे थे। महाप्रभु का आज का नृत्य देखने ही योग्य था। मानो आकाश-मण्डल में देवगण अपने-अपने विमानों में बैठे हुए प्रभु का नृत्य देख रहे हों। प्रभु उस समय भावावेश में आकर नृत्य कर रहे थे।
क्रमशः
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