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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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घुटुनों तक लटकी हुई उनकी मनोहर माला पृथ्‍वी को स्पर्श करने लगती। कमर को लचाकर, हाथों को उठाकर, ऊर्ध्‍व दृष्टि किये हुए प्रभु नृत्य कर रहे थे। उनके दोनों कमल-नयनों से प्रेमाश्रु बह-बहकर कपोलों के ऊपर से लुढ़क रहे थे।तिरछी आँखों की कोरों में से शीतल अश्रुओं के कण बह-बहकर जब कपोलों पर कढ़ी हुई पत्रावली के ऊपर होकर नीचे गिरते तब उस समय के मुख-मण्‍डल की शोभा देखते ही बनती थी। वे गद्गद कण्‍ठ से गा रहे थे ‘तुम्हार चरण मन लागुरे, हे सांरगधर’- सांरगधर कहते-कहते प्रभु का गला भर आता और सभी भक्त एक स्वर में बोल उठते ‘हरि बोल’, ‘गौरहरि बोल’। प्रभु फिर संभल जाते और फिर उसी प्रकार कोकिल-कण्‍ठ से गान करने लगते। वे हाथ फैलाकर, कमर लचाकर, भौहें मरोड़कर, सिर को नीचा-ऊंचा करके भाँति-भाँति से अलौकि‍क भावों को प्रदर्शित करते। सभी दर्शक काठकी पुतलियों के समान प्रभु के मुख की ओर देखते-के-देखते ही रह जाते।

प्रभु के आज के नृत्य से कठोर-से-कठोर हृदय में भी प्रेम का संचार होने लगा। कीर्तन के महाविरोधियों के मुखों में से भी हठात निकल पड़ने लगा- ‘धन्य है, प्रेम हो तो ऐसा हो!’ कोई कहता- ‘इतनी तन्मयता तो मनुष्‍य-शरीर में सम्भव नहीं।’ दूसरा बोल उठता- ‘निमाई तो साक्षात नारायण है।’ कोई कहता- ‘हमने तो ऐसा सुख अपने जीवन में आज तक कभी पाया नहीं।’ दूसरा जल्दी से बोल उठता- ‘तुमने क्या, किसी ने भी ऐसा सुख आज तक कभी नहीं पाया। यह सुख तो देवताओं को भी दुर्लभ है। वे भी इसके लिये सदा लालायित बने रहते हैं।’

प्रभु संकीर्तन करते हुए गंगा जी के घाट की ओर जा रहे थे। रास्ते में मनुष्‍यों की अपार भीड़ थी। उस भीड़ में से चींटी का भी निकल जाना सम्भव नहीं था। भगवद्भक्त सद्गृहस्थ अपने-अपने दरवाजों पर आरती लिये हुए खडे़ थे। कोई प्रभु के ऊपर पुष्‍पों की वर्षा करता, कोई भक्तों को माला पहनाता, कोई बहुमूल्य इत्र-फुलेल की शीशी-की-शीशी प्रभु के ऊपर उडे़ल देता। कोई इत्रदान में से इत्र छिड़क-छिड़ककर भक्तों को सराबोर कर देता। अटा, अटारी और छज्जे तथा द्वारों पर खड़ी हुई स्त्रियाँ प्रभु के ऊपर वहीं से पुष्‍पों की वृष्टि करतीं। कुमारी कन्याएं अपने आंचलों में भर-भरकर धान के लावा भक्तों के ऊपर बिखेरती। कोई सुन्दर सुगन्धित चन्दन ही छिड़क देती, कोई अक्षत, दूब तथा पुष्‍पों को ही फेंककर भक्तों का स्वागत करती। इस प्रकार सम्पूर्ण पथ पुष्‍पमय हो गया। लावा, अक्षत, पुष्‍प और फलों से रास्ता पट-सा गया।प्रभु उन्मत्त हुए नृत्य कर रहे थे। उन्हें बाह्य-जगत का कुछ पता ही नहीं था। सभी संसारी विषयों का चिन्तन छोड़कर संकीर्तन की प्रेम-धारा में वे बहने लगे। उन्हें न तो क़ाज़ी का पता रहा और न उसके अत्याचारों का ही। सभी प्रभु के नृत्य को देखकर आपा भूले हुए थे। इस प्रकार का नगर-कीर्तन यह सबसे पहला ही था। सभी के लिये यह नयी बात थी, फिर मुसलमान शासक के शासन में ऐसा करने की हिम्मत ही किसकी हो सकती थी? किंतु आज तो प्रभु के प्रभाव से सभी अपने को स्वतन्त्र समझने लगे थे। उनके हृदयों पर तो एक मात्र प्रभु का साम्राज्य था, वे उनके तनिक-से इशारे पर सिर कटाने तक को तैयार थे।

इस प्रकार संकीर्तन-समाज अपने नृत्य-गान तथा जय-जयकारों से नगर-वासियों के हृदय में एक प्रकार के नवजीवन का संचार करता हुआ गंगा जी के उस घाट पर पहुँच, जहाँ प्रभु नित्यप्रति स्नान करते थे। वहाँ से प्रभु भक्त मण्‍डली के सहित मधाई-घाट पर गये। मधाई-घाट से सीधे ही बेलपुखरा जहाँ क़ाज़ी रहता था उसकी ओर चले। अब सभी को स्मरण हो उठा कि प्रभु को आज क़ाज़ी का भी उद्धार करना है। सभी उसके अत्याचारों को स्मरण करने लगे। कुछ लोग तो यहाँ तक आवेश में आ गये कि खूब जोरों के साथ चिल्लाने लगे- ‘इस क़ाज़ी को पकड़ लो’, ‘जान से मार डालो’, ‘इसने हिंद-धर्म पर बड़े-बड़े़ अत्याचार किये हैं।’ प्रभु को इन बातों का कुछ भी पता नहीं था। उन्हें किसी मनुष्‍य से या किसी सम्प्रदाय-विशेष से रत्तीभर भी द्वेष नहीं था। वे तो अन्याय के द्वेषी थे, सो भी अन्यायी के साथ वे लड़ना नहीं चाहते थे! वे तो प्रेमास्त्र द्वारा ही उसका पराभव करना चा‍हते थे। वे संहार के पक्षपाती न होकर उद्धार के पक्ष में थे। इसलिये मार-काट का नाम लेने वाले पुरुष उनके अभिप्राय को न समझने वाले अभक्त पुरुष ही थे। उन उत्तेजना प्रिय अज्ञानी मनुष्‍यों ने तो यहाँ तक किया कि वृक्षों की शाखाएं तोड़-तोड़कर वे क़ाज़ी के घर में घुस गये और उसकी फुलवारी तथा बाग के फल-फूलों को नष्‍ट-भ्रष्‍ट करने लगे। क़ाज़ी के आदमियों ने पहले से ही क़ाज़ी को डरा दिया था। उससे कह दिया था- ‘निमाई पण्डित हजारों मनुष्‍यों को साथ लिये हुए तुम्हें पकड़ने के लिये आ रहा है। वे लोग तुम्हें जान से मार डालेंगे।’ कमज़ोर हृदय वाला क़ाज़ी अपार लोगों के कोलाहल से डर गया। उसकी फौज ने भी डरकर जवाब दे दिया। बेचारा चारों ओर से अपने का असहाय समझकर घर के भीतर जा छिपा।जब प्रभु को इस बात का पता चला कि कुछ उपद्रवी लोग जनता को भड़काकर उसमें उत्तेजना पैदा कर रहे हैं और क़ाज़ी को क्षति पहुँचाने का उद्योग कर रहे थे, तो उन्होंने उसी समय संकीर्तन बंद कर देने की आज्ञा दे दी। प्रभु की आज्ञा पाते ही सभी भक्तों ने अपने-अपने वाद्य नीचे उतार कर रख दिये। नृत्य करने वाले रुक गये। पद गाने वालों ने पद बंद कर दिये। क्षणभर में ही वहाँ सन्‍नाटा-सा छा गया। प्रभु ने दिशा‍ओं को गुंजाते हुए मेघ-गम्भीर स्वर में कहा- ‘खबरदार! किसी ने क़ाज़ी को तनिक भी क्षति पहुँचाने का उद्योग किया तो उससे अधिक अप्रिय मेरा और कोई न होगा। सभी एकदम शान्त हो जाओ।’ प्रभु का इतना कहना था कि सभी उपद्रवी अपने-अपने हाथों से शाखा तथा ईंट-पत्थर फेंककर चुपचाप प्रभु के समीप आ बैठे। सबको शान्त भाव से बैठे देखकर प्रभु ने क़ाज़ी के नौकरों से कहा- ‘काजी से हमारा नाम लेना।
क्रमशः

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