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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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कहना कि आपको उन्होंने बुलाया है, आपके साथ कोई भी अभद्र व्यवहार नहीं कर सकता, आप थोड़ी देर को बाहर चलें।’
प्रभु की बात सुनकर क़ाज़ी के सेवक घर में घिपे हुए क़ाज़ी के पास गये और प्रभु ने जो-जो बातें कही थीं, वे सभी जाकर क़ाज़ी से कह दीं। प्रभु के ऐसे आश्वासन को सुनकर और इतनी अपार भीड़ को चुपचाप शान्त देखकर क़ाज़ी बाहर निकला। प्रभु पे भक्तों के सहित क़ाज़ी का अभ्यर्थना की और प्रेमपुर्वक उसे अपने पास बिठाया। प्रभु ने कुछ हंसते हुए प्रेम के स्वर में कहा- ‘क्यों जी, यह कहाँ की रीति है कि हम तो आपके द्वार पर अतिथि होकर आये हैं और आप हमें देखकर घर में जा छिपे!’
काजी ने कुछ लज्जित होकर विनीत भाव से प्रेम के स्वर में कहा- ‘मेरा सौभाग्य, जो आप मेरे घर पर पधारे! मैंने समझा था, आप क्रोधित होकर मेरे यहाँ आ रहे हैं, इसीलिये क्रोधित अवस्था में आपके सम्मुख होना ठीक नहीं समझा।’
प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘क्रोध करने की क्या बात थी? आप तो यहाँ के शासक हैं, मैं आपके ऊपर क्रोध क्यों करने लगा?’
यह बात हम पहले ही बता चुके हैं कि शचीदेवी के पूज्य पिता तथा महाप्रभु के नाना नीलाम्बर चक्रवर्ती का घर इसी बेलपुखरिया मुहल्ले में क़ाज़ी के पास ही था। क़ाज़ी चक्रवर्ती महाशय से बड़ा स्नेह रखते थे। इसीलिये क़ाज़ी ने कहा- ‘देखों निमाई! गांव-नाते से चक्रवर्ती मेरे चाचा लगते हैं, इसलिये तूम मेरे भानजे लगे। मैं तुम्हारा मामा हूँ, मामा के ऊपर भानजा यदि अकारण क्रोध भी करे तो मामा को सहना पड़ता है। मैं तुम्हारे क्रोध को सह लूंगा। तुम जितना चाहो, मेरे ऊपर क्रोध कर लो।‘
प्रभु ने हंसते हुए कहा-‘मामा जी! मैं इस संबंध को कब अस्वीकार करता हूँ। आप तो मेरे बड़े हैं। आपने तो मुझे गोद में खिलाया है। मैं तो आपके सामने बच्चा हूँ, मैं आप पर क्रोध क्यों करूँगा!’
काजी ने कुछ लजाते हुए कहा- ‘शायद इसीलिये कि मैंने तुम्हारे संकीर्तन का विरोध किया है।’
प्रभु ने कुछ मुस्कराकर कहा- ‘इससे मैं क्यों क्रोध करने लगा? आप भी तो स्वतन्त्र नहीं है, आपको बादशाह की जैसी आज्ञा मिली होगी या आपके अधीनस्थ कर्मचारियों ने जैसा कहा होगा वैसा ही आपने किया होगा। यदि कीर्तन करने वालों को दण्ड ही देना आपने निश्चय किया हो, तो हम सभी उसी अपराध को कर रहे हैं, हमें भी खुशी से दण्ड दीजिये। हम इसीलिये तैयार होकर आये हैं।’
काजी ने कहा- ‘बादशाह की तो ऐसी आज्ञा नहीं थी, किंतु तुम्हारे बहुत-से पण्डितों ने ही आकर मुझसे शिकायत की थी कि यह अशास्त्रीय काम है। पहले ‘मंगलचण्डी’ के गीत गाये जाते थे। अब निमाई पण्डित भगवन्नाम के गोप्य मन्त्रों को खुल्लमखुल्ला गाता फिरता है और सभी वर्णों को उपदेश करता है। ऐसा करने से देश में दुर्भिक्ष पड़ेगा; इसीलिये मैंने संकीर्तन के विरोध में आज्ञा प्रकाशित की थी। कुछ मुल्ला और क़ाज़ी भी इसे बुरा समझते थे।’
प्रभु ने यह सुनकर पूछा- ‘अच्छा, तो आप सब लोगों को संकीर्तन से क्यों नहीं रोकते!’
काजी इस प्रश्न को सुनकर चुप हो गया। थोड़ी देर सोचते रहने के बाद बोला- ‘यह बड़ी गुप्त बात है, तुम एकान्त में चलो तो कहूँ।’
प्रभु ने कहा- ‘यहाँ सब अपने ही आदमी हैं। इन्हें आप मेरा अन्तरंग ही समझिये। इनके सामने आप संकोच न करें। कहिये, क्या बात है?’
प्रभु के ऐसा कहने पर क़ाज़ी ने कहा- ‘गौरहरि! मुझे तुम्हें गौरहरि कहने में अब संकोच नहीं होता। भक्त तुम्हें गौरहरि कहते हैं, इसलिये तुम सचमुच में हरि हो। तुम जब कृष्ण-कीर्तन करते थे, तब कुछ मुल्लाओं ने मुझसे शिकायत की थी कि यह निमाई ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहकर सभी को बरबाद करता है। इसका कोई उपाय कीजिये। तब मैंने विवश होकर उस दिन एक भक्त के घर में जाकर ढोल फोड़ा था और संकीर्तन के विरुद्ध लोगों को नियुक्त किया था, उसी दिन रात को मैंने एक बड़ा भंयकर स्वप्न देखा। मानो एक बड़ा भारी सिंह मेरे समीप आकर कह रहा है कि ‘यदि आज से तुमने संकीर्तन का विरोध किया तो उस ढोल की तरह ही मैं तुम्हारा पेट फोड़ दूंगा।’ यह कहकर वह अपने तीक्ष्ण पंजों से मेरे पेट को विदारण करने लगा। इतने में ही मेरी आँखे खुल गयीं! मेरी देह पर उन नखों के चिह्न अभी तक प्रत्यक्ष बने हुए हैं।’ यह कहकर क़ाज़ी ने अपने शरीर का वस्त्र उठाकर सभी भक्तों के सामने वे चिह्न दिखा दिये।काजी के मुख से ऐसी बात सुनकर प्रभु ने क़ाज़ी का जोरों से आलिगंन किया और उसके ऊपर अनन्त कृपा प्रदर्शित करते हुए बोले- ‘मामा जी! आप तो परम वैष्णव बन गये। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो किसी भी बहाने से, हंसी में, दु:ख में अथवा वैसे ही भगवान के नामों का उच्चारण कर लेता है उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं[1] आपने तो कई बार ‘हरि’, ‘कृष्ण’ इन सुमधुर नामों का उच्चारण किया है। इन नामों के उच्चारण के ही कारण आपकी बुद्धि इतनी निर्मल हो गयी है।’
प्रभु का प्रेमालिंगन पाकर क़ाज़ी का रोम-रोम खिल उठा। उसे अपने शरीर में एक प्रकार के नवजीवन का- सा संचार होता हुआ दिखायी देने लगा। वह अपने में अधिकाधिक स्निग्धता, कोमलता और पवित्रता का अनुभव करने लगा। तब प्रभु ने कहा- ‘अच्छा तो मामा जी! आपसे मुझे यही बात कहनी है कि अब आप संकीर्तन का विरोध कभी न करें।’
गद्गद-कण्ठ से क़ाज़ी कहने लगा- ‘गौरहरि! तुम साक्षात नारायणस्वरूप हो, तुम्हारे सामने मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि मैं अपने कुल-परिवार को छोड़ सकता हूँ, कुटुम्बी तथा जाति वालों का परित्याग कर सकता हूँ, किंतु आज से संकीर्तन का भी विरोध नहीं करूंगा। तुम लोगों से कह दो, वे बेखट के कीर्तन करें।’
काजी की ऐसी बात सुनकर उपस्थित सभी भक्त मारे प्रसन्नता के उछलने लगे। प्रभु ने एक बार फिर क़ाज़ी को गाढालिंगन प्रदान किया और आप भक्तों के सहित फिर उसी प्रकार आगे चलने लगे। प्रभु के पीछे-पीछे प्रेम के अश्रु बहाते हुए क़ाज़ी भी चलने लगा और लोगों के ‘हरि बोल’ कहने पर वह भी ‘हरि बोल’ की उच्च ध्वनि करने लगा।
क्रमशः
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