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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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एक दिन संकीर्तन के समय मेघ आने लगे। आकाश में बड़े-बड़े़ बादल आकर चारों ओर घिर गये। असमय में आकाश को मेघाच्छन्न देखकर भक्त कुछ भयभीत-से हुए। उन्होंने समझा सम्भव है, मेघ हमारे इस संकीर्तन के आनन्द में विघ्‍न उपस्थित करें। प्रभु ने भक्तों को समझकर उसी समय एक हुंकार मारी। प्रभु के हुंकार सुनते ही मेघ इधर-उधर हट गये और आ‍काश बिलकुल साफ हो गया।
अब एक घटना ऐसी है, जिसे सुनकर सभी संसारी प्राणी क्या अच्छे-अच्छे परमार्थ-मार्ग के पथिक भी आश्चर्य चकित हो जायँगे। इस घटना से पाठकों को पता चल जाएगा कि भगवद्भक्ति में कितना माधुर्य है। जिसे भगवत्कृपा का अनुभव होने लगा है, ऐसे अनन्य भक्त के लिये माता-पिता, दारा-पुत्र तथा अन्यान्य सभी बन्धु-बान्धवों के प्रति तनिक भी मोह नहीं रह जाता। वह अपने इष्‍टदेव को ही सर्वस्व समझता है!
इष्‍टदेव की प्रसन्नता में ही उसे प्रसन्नता है, वह अपने आराध्‍यदेव की प्रसन्नता के निमित्त सबका त्याग कर स‍कता है। दुष्‍कर-से-दुष्‍कर समझे जाने वाले कार्य को प्रसन्नतापूर्वक कर सकता है।

एक दिन सभी भक्त मिलकर श्रीवास के आंगन में प्रेम के सहित संकीर्तन कर रहे थे। उस दिन न जाने क्यों, सभी भक्त संकीर्तन में एक प्रकार के अलौकिक आनन्द का अनुभव करने लगे। सभी भक्त नाना वाद्यों के सहित प्रेम में विभोर हुए शरीर की सुधि भुलाकर नृत्य कर रहे थे। इतने ही में प्रभु भी संकीर्तन में आकर सम्मिलित हो गये।प्रभु के संकीर्तन में आ जाने से भ‍क्तों का आनन्द और भी अधिक बढ़ने लगा। प्रभु भी सब कुछ भूलकर भक्तों के सहित नृत्य करने लगे। प्रभुके पीछे-पीछे श्रीवास भी नृत्य कर रहे थे। इतने में ही एक दासी ने धीरे से आकर श्रीवास को भीतर चलने का संकेत किया। दासी के सं‍केत को समझकर श्रीवास भीतर चले गये। भीतर उनका बच्चा बीमार पड़ा हुआ था। उनकी स्त्री बच्चे की सेवा-शुश्रूषा में लगी हुई थी। शचीमाता भी वहाँ उपस्थित थी। बच्चे की दशा अत्यन्त ही शोचनीय थी। श्रीवास ने बच्चे की छाती पर हाथ रखा, फिर उसकी नाड़ी देखी और अन्त में उस बच्चे के मुंह की ओर देखने लगे। श्रीवास को पता चला गया कि बच्चा अन्तिम सांस ले रहा है। बच्चे की ऐसी दशा देखकर घर की सभी स्त्रियाँ घबड़ाने लगीं। श्रीवास जी ने उन सबको धैर्य बंधाया और वे उसी तरह बच्चे के सिराहने बैठकर उसके सिर पर हाथ फेरने लगे। थोड़ी ही देर में श्रीवास ने देखा, बच्चा अब सांस नहीं ले रहा है। उसके प्राण-पखेरू इस नश्‍वर शरीर को त्यागकर किसी अज्ञात लोक में चले गये हैं। यह देखकर बच्चे की माँ और उसकी सभी चाची रुदन करने लगीं।हाय! इकलौते पुत्र की मृत्यु पर माता को कितना भारी शोक होता है, इसका अनुभव कोई मनुष्‍य कर ही कैसे सकता है? माता का हृदय फटने लगता है। उसका शरीर नहीं रोता है, किंतु उसका अन्त:करण पिघलने लगता है, वही पिघल-पिघलकर आंसुओं के रूप में स्वत: ही बहने लगता है। उस समय उसे रोने से कौप रोक सकता है? वह बाहरी रुदन तो होता ही नहीं, वह तो अन्तर्ज्वाला की भभक होती है, जिससे उसका नवनीत के समान स्निग्ध हृदय स्वत: ही पिघल उठता है। मरे हुए अपने इकलौते पुत्र को शय्या पर पड़े देखकर माता का हृदय फटने लगा, वह जोर से चीत्कार मारकर पृथ्‍वी पर मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। अपनी पत्नी को इस प्रकार पछाड़ खाते देखकर त‍था घर की अन्य सभी स्त्रियोंको रुदन करते देखकर श्रीवास जी दृढ़ता के साथ उन सबको समझाते हुए कहने लगे- ‘देखना, खबरदार! किसी ने सांस भी निकाली तो फिर खैर नहीं है। देखती नहीं हो, आंगन में प्रभु नृत्य कर रहे हैं। उनके आनन्द में भंग न होना चाहिये। मुझे पुत्र के मर जाने का उतना शोक कभी नहीं हो सकता, जितना प्रभु के आनन्द में विघ्‍न पड़ने से होगा। यदि संकीर्तन के बीच में कोई भी रोयी तो मैं अभी गंगा जी में कूदकर प्राण दे दूँगा। मेरी इस बात को बिलकुल ठीक समझो।’
हाय! कितनी भारी कठोरता है! भक्त देवी! तेरे चरणों में कोटि-कोटि नमस्कार है। जिस प्रेम और भक्ति में इतनी भारी स्निग्धता और सरसता है, उसमें क्या इतनी भारी कठोरता भी रह सकती है? जिसका एकमात्र प्राणों से भी प्यारा, नयनों का तारा, सम्पूर्ण घर को प्रकाशित करने वाला इकलौता पुत्र मर गया हो और उसका मृत देह माता के सम्मुख ही पड़ा हो, उस माता से कहा जाता है कि तू आंसू भी नहीं बहा सकती। जोर से रो‍कर अपने हृदय की ज्वाला को भी कम नहीं कर सकती। कितना भारी अन्याय है, कैसी निर्दय आज्ञा है? कितनी भारी कठोरता है? किंतु भक्त को अपने इष्‍टदेव की प्रसन्नता के निमित्त सब कुछ करना पड़ता है। पतिपरायणा बेचारी मालिनी देवी मन मसोसकर चुप हो गयी! उसने अपनी छाती पर पत्थर रखकर कलेजे को कड़ा किया। भीतर की ज्वाला को भीतर ही रोका और आंसुओं को पोंछकर चुप हो गयी।

पत्नी के चुप हो जाने पर श्रीवास धीरे-धीरे उसे समझाने लगे- ‘इस बच्चे का इससे बढ़कर और बड़ा भारी सौभाग्य क्या हो सकता है, जो साक्षात गौरांग जब आंगन में नृत्य कर रहे हैं, तब इसने शरीर-त्याग किया है। महाप्रभु ही तो सबके स्वामी हैं। उनकी उपस्थिति में शरीर-त्याग करना क्या कम सौभाग्य की बात है?’
मालिनी देवी चुपचाप बैठी हुई पति की बातें सुन रही थीं। उसका हृदय फटा-सा जा रहा था। श्रीवास जी ने फिर एक बार दृढ़ता के साथ कहा- ‘सबको समझा देना। प्रभु जब तक नृत्य करते रहें तब तक कोई भी रोने न पावे। प्रभु के आनन्द-रस में तनिक भी विघ्‍न पड़ा तो इस लड़के के साथ ही मेरे इस शरीर का भी अन्त ही समझना!’ इतना कहकर श्रीवास जी फिर बाहर आंगन में आ गये और भक्तों के साथ मिलकर उसी प्रकार दोनों हाथों को ऊपर उठाकर संकीर्तन और नृत्य करने लगे।

चार घड़ी रात्रि बीतने पर बच्चे की मृत्यु हुई थी। आधी रात्रि से कुछ अधिक समय तक भक्तगण उसी प्रकार कीर्तन करते रहे, किंतु इतनी बड़ी बात और कितनी देर त‍क छिपी रह सकती है। धीरे-धीरे भक्तों में यह बात फैलने लगी।
क्रमशः

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