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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वे प्रेम की सजीव-साकार मूर्ति ही थे।शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी प्रभु के अनन्य भक्तों में से थे। वे कभी-कभी ऐसा अनुभव करते थे कि प्रभु की हमारे ऊपर जैसी होनी चाहिये वैसी कृपा नहीं है। उनके मनोगत भाव को समझकर प्रभु ने एक दिन उनसे कहा- ‘ब्रह्मचारी जी! कल हम तुम्हारें ही यहाँ भोजन करेंगे, हमारे लिये और श्रीपाद नित्यानन्द के लिये तुम ही कल भोजन बना रखना।’ ब्रह्मचारी जी को इस बात से हर्ष भी अत्यधिक हुआ और साथ ही दु:ख भी। हर्ष तो इसलिये हुआ कि प्रभु ने हमें भी अपनी सेवा का योग्य समझा और दु:ख इसलिये हुआ कि प्रभु कुलीन ब्राह्मण हैं, वे हमारे भिक्षुक के हाथ का भात कैसे खायेंगे? इसीलिये उन्होंने दीन-भाव से कहा- ‘प्रभो! हम तो भिक्षुक हैं, आपको भोजन कराने के योग्य नहीं हैं। नाथ! हम इतनी कृपा के सर्वथा अयोग्य हैं।’
प्रभु ने आग्रह के साथ कहा- ‘तुम चाहे मानो, चाहे मत मानो, हम तो कल तुम्हारे ही यहाँ खायेंगें। वैसे न दोगे, तो तुम्हारी थाली में से छीनकर खायेंगे।’ यह सुनकर ब्रह्मचारी जी बड़े असमंजस में पड़े। उन्होंने और भी दो-चार अन्तरंग भक्तों से इस सम्बन्ध में पूछा। भक्तों ने कहा- ‘प्रेम में नेम कैसा? प्रभु के लिये कोई नियम नहीं है। वे अनन्य भक्तों के तो जूठे अन्न को खाकर भी बड़े प्रसन्न होते हैं, आप प्रेमपूर्वक भात बनाकर प्रभु को खिलाइये।’
भक्तों की सम्मति मानकर दूसरे दिन ब्रह्मचारी जी ने बड़ी पवित्रता के साथ स्नान-संध्या–वन्दनादि करके प्रभु के लिये भोजन बनाया। इतने में ही नित्यानन्द जी के साथ गंगास्नान करके प्रभु आ गये। प्रभु ने नित्यानन्द जी के साथ बड़े ही प्रेम से भोजन पाया। भोजन करते-करते आप कहते जाते थे- इतने दिनों से दाल, भात और शाक खाते रहें हैं, किंतु आज के-जैसा स्वादिष्ट भोजन हमने जीवन भर में कभी नहीं पाया। चावल कितने स्वादिष्ट हैं। कड़ाखोल कितना बढ़िया बना है। इस प्रकार प्रशंसा करते-करते दोनों ने भोजन समाप्त किया। ब्रह्मचारी जी ने भक्तिभाव से दोनों के हाथ धुलाये। खा-पीकर दोनों ही ब्रह्मचारी जी की कुटिया की छतपर सो गये।ब्रह्मचारी जी की कुटिया बिलकुल गंगा जी के तट पर ही थी। छत पर गंगाजी के शीतल कणों से मिली हुई ठण्डी-ठण्डी वायु आ रही थी। नित्यानन्द जी के सहित प्रभु वहाँ आसन बिछाकर लेट गये।
विजय आखरिया नामक एक भक्त प्रभु के समीप ही लेटे हुए थे। विजयकृष्ण जाति के कायस्थ थे। वे पुस्तकें लिखने का काम करते थे। उस समय छापेखाने तो थे ही नहीं। सभी पुस्तकें हाथ से ही लिखी जाती थीं।
जिनका लेख सुन्दर होता, वे पुस्तकें लिखकर ही अपना जीवन-निर्वाह करते थे। विजय भी पुस्तकें ही लिखा करते थे। प्रभु के प्रति इनके हृदय में बड़ी भक्ति थी। प्रभु भी अत्यधिक प्यार करते थे। इन्होंने प्रभु की बहुत-सी पुस्तकें लिखी थीं। सोते-ही-सोते इन्हें एक दिव्य हाथ दिखायी देने लगा। वह हाथ चिन्मय था, उसकी उंगलियों में भाँति-भाँति के दिव्य रत्न दिखायी दे रहे थे। आखरिया को उस चिन्मय हस्त के दर्शन से परम कुतूहल हुआ। वह उठकर चारों ओर देखने लगे। तब भी उन्हें वह हाथ ज्यों-का-त्यों ही प्रतीत होने लगा। वह उस अद्भुत रूप-लावण्युक्त दिव्य हस्त के दर्शन से पागल-से हो गये। प्रभु ने हंसकर पुछा- ‘विजय! क्या बात है? क्यों इधर-उधर देख रहे हो? कोई अद्भुत वस्तु दिखायी दे रही है क्या? शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी बड़े भगवत-भक्त हैं, इनके यहाँ श्रीकृष्ण सदा सशरीर विराजते हैं। तुम्हें उन्हीं के तो दर्शन नहीं हो रहे हैं?’ प्रभु की बात सुनकर विजय ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। उत्तर दें भी तो कहाँ से? उन्हें तो अपने शरीर तक का होश नहीं था, प्रभु की बातें सुनकर वह पागलों की भाँति कभी तो हंसते, कभी रोते और कभी आप ही बड़बड़ाने लगते। ब्रह्मचारी जी तथा नित्यानन्द जी ने भी उठकर उनकी ऐसी दशा देखी। वे समझ गये, प्रभु की इनकी ऊपर कृपा हो गयी है।
इस प्रकार विजय सात दिन तक इसी तरह पागलों की-सी चेष्टाएँ करते रहे। उन्हें शरीर का कुछ भी ज्ञान नहीं था। न तो कुछ खाते-पीते ही थे और न रात्रि में सोते ही थे। पागलों की तरह सदा रोते ही रहते और कभी-कभी जोरों से हंसने भी लगते। सात दिन के बाद उन्हें बाह्य ज्ञान हुआ। तब उन्होंने अन्तरंग भक्तों पर यह बात प्रकट की।
इसी प्रकार श्रीवास पण्डित के घर एक दर्जी रहता था। नित्यप्रति कीर्तन सुनते-सुनते उसकी कीर्तन में तथा महाप्रभु के चरणों में प्रगाढ़ भक्ति हो गयी। प्रभु जब भी उधर से निकलते तभी वह भक्ति-भावसहित उन्हें प्रणाम करता। एक दिन उसे भी प्रभु के दिव्यरूप के दर्शन हुए। उस अलौकिक रूप के दर्शन करके वह मुसलमान दर्जी कृतकृत्य हो गया और पागलों की तरह बाजार में कई दिन तक ‘देखा है’ ‘देखा है’ कहकर चिल्लाता फिरा।
इस प्रकार प्रभु अपने अन्तरंग भक्तों में भाँति-भाँति की प्रेम-लीलाएँ करते रहे। उनके शरणापन्न भक्तों को ही उनके ऐसे-ऐसे रूपों के दर्शन होते थे। अन्य साधारण लोगों की दृष्टि में तो वे निमाई पण्डित ही थे। बहुतों की दृष्टि में तो ढोंगी भी थे। यद्यपि उनका न तो किसी से विशेष राग था, न द्वेष, तो भी जो एकदम उन्हीं के बन जाते, उन्हें उनके दिव्य-दिव्य रूपों के दर्शन होने लगते।
भगवान के सम्बन्ध में भी यही बात कही जाती है कि भगवान के लिये सभी समान हैं, प्राणी मात्र पर वे कृपा करते हैं, किंतु जो सबका आश्रय त्यागकर एकदम उन्हीं का पल्ला पकड़ लेते हैं, उनकी वे सम्पुर्ण मन:कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं। जैसे कल्पवृक्ष सबके लिये समान रूप से सुख देने वाला होता है, किंतु मनोवांछित फल तो वह उन्हीं लोगों को प्रदान करता है, जो उसके नीचे बैठकर उन फलों का चिन्तन करते हैं। चाहे उसके निकट ही घर बनाकर क्यों न रहो, जब तक उसकी छत्र-छाया में प्रवेश न करोगे, जब तक उसके मूल में बैठकर चिन्तन न करोगे, तब तक अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति हो ही नहीं सकती। प्रभु के पाद-पद्मों का आश्रय लेने पर ही उसकी कृपा के हम अधिकारी बन सकते हैं।
क्रमशः
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