cc 154
श्री श्री चैतन्य चरितावली
154-
नवानुराग और गोपी-भाव….
महाप्रभु जब से गया से लौटकर आये थे, तभी से सदा प्रेम में छके-से, बाह्य-ज्ञानशून्य-से तथा बेसुध-से बने रहते थे! किंतु भक्तों के साथ संकीर्तन करने में उन्हें अत्यधिक आनन्द आता। कीर्तन में वे सब कुछ भूल जाते। जहाँ उनके कानों में संकीर्तन की सुमधुर ध्वनि सुनायी पड़ी कि उनका मन उन्मत्त होकर नृत्य करने लगता। संकीर्तन के वाद्यों को सुनते ही उनके रोम-रोम खिल जाते और वे भावावेश में आकर रात्रिभर अखण्ड नृत्य करते रहते। न शरीर की सुधि और न बाहरी जगत का बोध; बस, उनका शरीर यन्त्र की तरह घूमता रहता। इससे भक्तों के भी आनन्द का पारावार नहीं रहता। वे भी प्रभु के सुखकारी मधुर नृत्य के साथ नाचने लगते। इस प्रकार बारह-तेरह महीने तक प्रभु बराबर भक्तों को लेकर कथा-कीर्तन में कालयापन करते रहे।
काजी के उद्धार के अनन्तर प्रभु की प्रकृति में एकदम परिवर्तन दिखायी देने लगा। अब उनका चित्त संकीर्तन में नहीं लगता था। भक्त ही मिलकर कीर्तन किया करते थे। प्रभु संकीर्तन में सम्मिलित भी नहीं होते थे। कभी-कभी वैसे ही संकीर्तन के बीच में चले आते और कभी-कभी भक्तों के आग्रह से कीर्तन करने भी लगते, किंतु अब उनका मन किसी दूसरी ही वस्तु के लिये तड़पता रहता था। उस तड़पन के सम्मुख उनका मन संकीर्तन के ताल-स्वर के सहित नृत्य करने के लिये साफ इनकार कर देता था।
अब प्रभु पहले की तरह भक्तों के साथ घुल-घुलकर प्रेम की बातें नहीं किया करते। अब तो उनकी विचित्र दशा थी। कभी तो वे अपने-आप ही रुदन करने लगते और कभी स्वयं ही खिलखिलाकर हंस पड़ते। कभी रोते-रोते कहने लगते-
हे नाथ हे रामनाथ व्रजनाथार्तिनाशन।
मग्नमुद्धर गोविन्द गोकुलं वृजिनार्णवात
‘हे नाथ! हे रामनाथ! हे व्रजनाथ! हे गोविन्द! दु:खसागर में डूबे हुए इस व्रज का तुम्हीं उद्धार करो। हे दीनानाथ! हे दु:खितों के एकमात्र आश्रय! हमारी रक्षा करो।’
कभी राधा-भाव में भावित होकर रुदन करने लगते, कभी एकान्त में अपने कोमल कपोल को हथेली पर रखकर अन्यमनस्क भाव से अश्रु ही बहाते रहते। कभी राधा-भाव में आप कहने लगते- ‘हे कृष्ण! तुम इतने निष्ठुर हो, मैं नहीं जानती थी। मैं रास में तुम्हारी मीठी-मीठी बातों से छली गयी। मुझ भोली-भाली अबला को तुम इस प्रकार धोखा दोगे, इसका मुझे क्या पता था? हाय! मेरी बुद्धिपर तब न जाने क्यों पत्थर पड़ गये के मैं तुम्हारी उन मीठी-मीठी बातों में आ गयी। कहाँ तुम अखिल ऐश्वर्य के स्वामी और कहाँ मैं एक वन में रहने वाले ग्वाल की लड़की। तुमसे अनजान में स्नेह किया। हा प्राणनाथ! ये प्राण तो तुम्हारे ही अर्पण हो चुके हैं। ये तो सदा तुम्हारे ही साथ रहेंगे, फिर यह शरीर चाहे कहीं भी पड़ा रहे। प्यारे! तुम कोमल हृदय के हो, सरस हो, सरस हो, सुन्दर हो, फिर तुम मेरे लिये कठोर हृदय के निष्ठुर और वक्र स्वभाव वाले क्यों बन गये हो? मुझे इस प्रकार की विरह-वेदना पहुँचाने में तुम्हें क्या मजा मिलता है?’ इस प्रकार घंटों प्रलाप करते रहते!
कभी अक्रूर वृन्दावन में श्रीकृष्ण को लेने के लिये आये हैं और गोपियाँ भगवान के विरह में रुदन कर रही हैं। इसी भाव को स्मरण करके आप गोपी-भाव से कहने लगते- ‘हाय देव! तूने क्या किया? हमारे प्राणप्यारे, हमारे सम्पूर्ण व्रज के दुलारे मनमोहन को तू हमसे पृथक क्यों कर रहा है? ओ निर्दयी विधाता! तेरी इस खोटी बुद्धि को बार-बार धिक्कार है, जो तू इस प्रकार प्रेमियों का मिलाकर फिर उन्हें विरह-सागर में डुबा-डुबाकर बुरी तरह से तड़पाता रहता है!
हाय! प्यारे कृष्ण! अब चले ही जायंगे क्या? क्या अब वह मुरली की मनोहर तान सुनने को न मिलेगी? क्या अब उस पीताम्बर की छटा दिखायी न पड़ेगी? क्या अब मोहन के मनोहर मुख को देखकर हम सम्पूर्ण दिन के दु:ख-संतापों को न भुला सकेंगी? क्या अब कृष्ण हमारे घर में माखन खाने न आवेंगे? क्या अब सांवरे की सलोनी सूरत को देखकर सुख के सागर में आनन्द की डुबकियां न लगा सकेंगी? यह क्रूरकर्मा अक्रूर कहाँ से आ गया? इसका ऐसा उलटा नाम किसने रख दिया। जो हमसे हमारे प्राणप्यारे को अलग करेगा, उसे अक्रूर कौन कह सकता है? वह तो महाक्रूर है या यह सब विधाता की ही क्रूरता है! बेचारे अक्रूर का इसमें क्या दोष?’ ऐसा कह-कहकर वे जोरों से चिल्लाते लगते।
कभी श्रीकृष्ण के भाव में होकर गोपों के साथ व्रज की लीलाओं का अनुकरण करने लगते। कभी प्रह्लाद के आवेश में आकर दैत्य-बालकों को शिक्षा देने का अनुकरण करके पास में बैठे हुए भक्तों को भगवन्नाम-स्मरण और कीर्तन का उपदेश करने लगते। कभी ध्रुव का स्मरण करके उन्हीं के भाव में एक पैर से खडे़ होकर तपस्या-सी करने लगते। फिर कभी विरहिणी की दशा का अभिनय करने लगते। एकदम उदास बन जाते। हाथों के नखों से पृथ्वी को कुरेदने लगते। भक्त तो अहिंसा-प्रिय, शान्त और प्राणिमात्र पर दया करने वाले होते हैं।शचिमाता इनकी ऐसी दशा देखकर बड़ी दु:खी होतीं। वे पुत्र की मंगलकामना के निमित्त सभी देवी-देवताओं की पूजा करतीं। इसे कोई रोग समझकर वैद्यों से परामर्श करतीं। भक्तों से अत्यन्त ही दीन-भाव से कहतीं- ‘न जाने निमाई को क्या हो गया है, अब वह पहले की भाँति कीर्तन भी नहीं करता और न किसी से हंसता-बोलता ही है। उसे हो क्या गया? तुम लोग उसका इलाज क्यों नहीं कराते। किसी वैद्य को दिखाओ?’
बेचारे भक्त भोली-भाली माता की इन सीधी-सरल मातृस्नेह से सनी हुई बातों को सुनकर हंसने लगते। वे मन-ही-मन कहते- ‘जगत की चिकित्सा तो ये करते हैं, इनकी चिकित्सा कौन कर सकता है? इनके रोग की दवा तो आज तक किसी वैद्य ने बनायी ही नहीं और न कोई संसारी वैद्य बना ही सकता है। इनकी ये ही जानते हैं! साँवलिया ही इनकी नाड़ी पकडे़गा तब ये हंसने लगेंगे।’ वे माता को भाँति-भाँति से समझाते, किंतु माता की समझ में एक भी बात नहीं आती। वह सदा अधीर-सी बनी रहतीं।
क्रमशः
Comments
Post a Comment