cc 156
श्री श्री चैतन्य चरितावली
156-
यदि उनका सचमुच में ऐसा ही व्यवहार रहा और अब से आगे किसी अन्य छात्र पर इस प्रकार प्रहार किया तब तुम लोगों को प्रहार का उत्तर प्रहार से देना चाहिये। अभी इतनी शीघ्रता नहीं करनी चाहिये।’ इस प्रकार उस समय तो छात्र शान्त हो गये। किंतु उनके प्रभु के प्रति विद्वेष के भाव बढ़ते ही गये। कुछ दुष्टबुद्धि के मायापुर-निवासी ब्राह्मण भी छात्रों के साथ मिल गये। इस प्रकार प्रभु के विरुद्ध एक प्रकार का बड़ा भारी दल ही बन गया।
भावावेश के अनन्तर प्रभु को सभी बातें मालूम हुईं। इससे उन्हें अपार दु:ख हुआ। वे घर-बार तथा इष्ट-मित्र और अपने साथी भक्तो से पहले से ही उदासीन थे। इस घटना से उनकी उदासी और भी अधिक बढ़ गयी। अब उन्हें संकीर्तन के कारण फैली हुई अपनी देशव्यापी कीर्ति काटने के लिये दौड़ती हुई-सी दिखायी देने लगी। उन्हें घर-बार, कुटुम्ब-परिवार तथा धर्मपत्नी और माता से एकदम विराग हो गया। उनका मन-मधुप अब घिरी हुई सुगन्धित वाटिका को छोड़कर खुली वायु में स्वच्छन्दता के साथ जंगलों की कंटीली झाड़ियों के ऊपर विचरण करने के लिये उत्सुकता प्रकट करने लगा। वे जीवों के कल्याण के निमित्त घर-बार को छोड़कर संन्यासी बनने की बात सोचने लगे।
संन्यास से पूर्व…..
महाप्रभु का मन अब महान त्याग के लिये तड़पने लगा। उनके हृदय में वैराग्य की हिलोंरे-सी मारने लगीं। यद्यपि महाप्रभु को घर में भी कोई बन्धन नहीं था, यहाँ रहकर वे लाखों नर-नारियों का कल्याण कर रहे थे। किंतु इतने से ही वे संतुष्ट होने वाले नहीं थे। उन्हें तो भगवन्नाम को विश्वव्यापी बनाना था, फिर ये अपने को नवद्वीप का ही बनाकर और किसी एक पत्नी का पति बनाकर कैसे रख सकते थे? वे तो सम्पूर्ण विश्व की विभूति थे। भगवद्भक्तमात्र के वे पूजनीय तथा वन्दनीय थे। ऐसी दशा में उनका नवद्वीप में ही रहना असम्भव था।
संसारी सुख, धन-सम्पत्ति और कीर्ति- ये पूर्वजन्म के भाग्य से ही मिलते हैं। जिसके भाग्य में धन अथवा कीर्ति नहीं होती, वह चाहे कितना भी परिश्रम क्यों न करे, कितने भी अच्छे-अच्छे भावों का प्रचार उसके द्वारा क्यों न हो उसे धन या कीर्ति मिल ही नहीं सकती। राजा युद्ध में शायद ही कभी लड़ने जाते है, नहीं तो घर में ही बैठा रहता हैं। सेना में बड़े-बड़े़ वीर योद्धा साहस और शूरवीरता के साथ युद्ध करते हैं, प्राणों की बाजी लगाकर लाखों एक-से-एक बढ़कर पराक्रम दिखाते हुए शत्रु के दांतों को खट्टा करते हैं, किंतु उनकी शूरवीरता का किसी को पता ही नहीं लगता।
विजय का सुयश घर में बैठे हुए राजा को ही प्राप्त होता है। एक चर्मकार का परिवार दिनभर काम करता है, उसके छोटे-से-बच्चे से लेकर बडे़-बूढे़, स्त्री-पुरुष दिन-रात्रि काम में ही जुटे रहते हैं, फिर भी उन्हें खाने को पूरा नहीं पड़ता। इसके विपरीत दूसरा महाजन पलंग से नीचे भी जब उतरता है, तो बहुत-से सेवक उसके आगे-आगे बिछौना बिछाते चलते हैं। उसके मुनीम दिन-रात्रि परिश्रम करते हैं, उन्हीं के द्वारा उसे हजारों रुपये रोज की आमदनी है। किंतु उन मुनीमों को महीनों में गिने हुए पंद्रह-बीस रूपये ही मिलते हैं। उस सब आमदनी का स्वामी वह कुछ न करने वाला महाजन ही समझा जाता है। इसलिये किसी के धन अथवा बढ़ती हुई कीर्ति को देखकर कभी इस प्रकार का द्वेष नहीं करना चाहिये कि हम इससे बढ़कर काम करते हैं तब भी हमारा इतना नाम क्यों नहीं होता? यह तो अपने-अपने भाग्य की बात है। तुम्हारे भाग्य में उतनी कीर्ति है ही नहीं, फिर तुम कितने भी बड़े काम क्यों न करो, कीर्ति उसी की अधिक होगी जो तुम्हारी दृष्टि में तुमसे कम काम करता है। तुम उसके भाग्य की रेखा को तो नहीं मेट सकते।
श्रीरामानुजाचार्य से भी पूर्व बहुत-से श्रीसम्प्रदाय के त्यागी और विरक्त संन्यासी हुए; किंतु श्रीसम्प्रदाय के प्रधान आचार्य का पद रामानुजभगवान के ही भाग्य में था। इसी प्रकार चाहे कोई कितना भी बड़ा महापुरुष हो या महात्मा क्यों न हो, उन सबके भोग प्रारब्ध के ही अनुसार होंगे। प्रारब्ध का सम्बन्ध शरीर से है, जिसने शरीर धारण किया है, उसे प्रारब्ध के भोग भोगने ही पड़ेंगे। यह दूसरी बात है कि महापुरुषों की उन भोगों में तनिक भी आसक्ति नहीं होती। वे शरीर को और प्रारब्ध को देह का वस्त्र और मैल समझकर उसी के अनुसार व्यवहार करते हैं। असली बात तो यह है कि उनका अपना प्रारब्ध तो कुछ होता ही नहीं, वे जगत के कल्याण के निमित्त ही प्रारब्ध का बहाना बनाकर लीलाएँ करते हैं।
कीर्ति भी संसार के सुखों में से एक बड़ा भारी सुख है। लोक में जिसकी अधिक कीर्ति होने लगती है, उसी से कीर्तिलोलुप संसारी लोग डाह करने लगते हैं। इसका एकमात्र उपाय है अपनी ओर से कीर्ति लाभ का तनिक भी प्रयत्न न करना। ‘हमारी कीर्ति हो’ ये भाव भी जहाँ तक हों, हृदय में आने ही न चाहिये और आयी हुई कीर्ति का त्याग भी करते रहना चाहिये। त्याग से कीर्ति और निर्मल हो जाती है और डाह करने वाले भी त्याग के प्रभाव से उसके चरणोंमें सिर झुकाते हैं।
यह तो संसारी भोगों के विषय में बात रही। त्याग का इतना ही फल नहीं कि उससे कीर्ति निर्मल बने और विद्वेषी भी उसका लोहा मानने लगे; किंतु त्याग का सर्वोत्तम फल तो भगवत्प्राप्ति ही है। त्याग के बिना भगवत्प्राप्ति हो ही नहीं सकती। भगवत्प्राप्ति का प्रधान कारण है सर्वस्व का त्याग कर देना। जो लोग यह कहते हैं कि ‘संन्यास-धर्म तो भक्ति-मार्ग का विरोधी है।’ वे अज्ञानी हैं, उन्हें भक्ति-मार्ग का पता ही नहीं। हम दृढ़ता के साथ कहते हैं, बिना संन्यासी बने कोई भी मनुष्य भक्ति-मार्ग का अनुसरण कर ही नहीं सकता। हम शास्त्रों की दुहाई देकर यहाँ तक कहने के लिये तैयार हैं, कि कोई बिना संन्यासी हुए ज्ञान-लाभ भले ही कर ले, किंतु सर्वस्व त्याग किये बिना भक्ति तो प्राप्त हो ही नहीं सकती।
क्रमशः
Comments
Post a Comment