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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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मन से त्याग करने का बहाना बनाकर जो विषयों के सेवन में लगे रहने पर भी अपने को पूर्ण भगवद्भक्त कहने का दावा करते हैं, उनसे हमें कुछ कहना नहीं है। हम तो उन लोगों से निवेदन करना चाहते हैं जो यथार्थ में भक्ति-पथ का अनुसरण करने के इच्छुक हैं। उनसे हम दृढ़ता के साथ कहते हैं, अपने पूर्वजन्म के प्रारब्धानुसार आप सर्वस्व त्यागकर संन्यासी न हो सकें, यह आपकी कमज़ोरी है। जैसी भी दशा में रहें, भक्ति तक पहुँचने के लिये प्रयत्न तो प्रत्येक दशा में कर सकते हैं, किंतु पूर्ण भक्त बनने के लिये मन से नहीं स्वरूप से भी त्याग करना ही होगा।सर्व-कर्म-फल-त्याग के साथ सर्व सांसारिक भोगों का त्याग भी अनिवार्य ही है। किंतु इसके विपरीत कुछ ऐसे भी भगवद्भक्त देखे गये हैं जो प्रवृत्ति मार्ग में रहते हुए भी पूर्ण भक्त हुए हैं। उन्हें अपवाद ही समझना चाहिये। सिद्धान्त तो यही है कि भगवद्भक्ति के लिये रूप, सनातन और रघुनाथदास की तरह अकिंचन बनकर घर-घर के टुकड़ों पर ही निर्वाह करके अहर्निश कृष्ण-कीर्तन करते रहना चाहिये। इसीलिये लोकमान्य तिलक ने भक्ति-मार्ग और ज्ञान-मार्ग दोनों को ही त्याग-मार्ग बताकर एक नये ही कर्मयोग-मार्ग की कल्पना की है। यों गृहस्थ में रहकर भी भगवद्भक्ति की जा सकती है, किंतु वह ऐसी ही बात है जैसे किसी साँस के रोगी के लिये दही सर्वथा निषेध हैं। यदि वह सांस की बीमारी में दही से एकदम बचा रहे तो सर्वश्रेष्ठ है, किंतु वह अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के अनुसार दही की प्रबल वासना के कारण उसे एकदम नहीं छोड़ सकता, तो वैद्य उसमें एक ऐसी दवाई मिला देते हैं कि फिर वह दही बीमारी को हानिप्रद नहीं होती।
इसी प्रकार जो एकदम स्वरूपत: त्याग नहीं कर सकते उनके लिये भगवान ने बताया है, वे सम्पूर्ण संसारी कामों को भगवत-सेवा ही समझकर निष्काम-भाव से फल की इच्छा से रहित होकर करते रहेंगे और निरन्तर हरि-स्मरण में ही लगे रहेंगे तो उन्हें संसारी काम बाधा न पहुँचा सकेंगे। किंतु जो लोग हठपूर्वक इस बात का आग्रह ही करते हैं कि भक्ति-मार्ग के पथिक को किसी भी दशा में संसारी कर्मों को त्यागकर संन्यास-धर्म का अनुसरण न करना चाहिये, उनसे अब हम क्या कहें। वे थोड़ी ऊंची दृष्टि करके देखें तो पता चलेगा कि सभी भक्ति-मार्ग के प्रधान पुरुष घर-बार-त्यागी संन्यासी ही हुए हैं।
भक्ति के अथवा सभी मार्गों के प्रवर्तक भगवान ब्रह्माजी हैं। वे तो प्रवृत्ति-निवृत्ति दोनों के ही जनक हैं, इसलिये उन्हें किसी एक मार्ग का कहना ठीक नहीं। उनके पुत्र अथवा शिष्य भगवान नारद ही भक्ति-मार्ग के प्रधान आचार्य समझे जाते हैं। वे घर-बार-त्यागी आजन्म ब्रह्मचारी संन्यासी ही थे। उन्होंने एक-दो को ही घर-बार-विहीन नहीं बनाया; किंतु लाखों को उनकी पूर्वप्रकृति के अनुसार संसारत्यागी विरागी बना दिया।
महाराज दक्ष प्रजापति के ग्यारह-बारह हजार शबलाश्व और हरिताश्व नामक पुत्रों को सदा के लिये संन्यासी बना दिया। भक्ति-मार्ग की एक प्रधान शाखा के प्रवर्तक सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन- ये चारों-के-चारों संन्यासी ही थे। भगवान के ब्राह्मण-शरीरों में परशुराम, वामन, नारद, सनत्कुमार, कपिल, नर-नारायण जितने भी अवतार हुए हैं, सभी गृह-त्यागी संन्यासी ही थे। और तो क्या भक्ति मार्ग के चारों सम्प्रदायों के माधवाचार्य (आनन्दतीर्थ), निम्बार्काचार्य, रामानुजाचार्य और वल्लभाचार्य- ये सब-के-सब संन्यासी ही थे।यद्यपि भगवान वल्लभाचार्य की पूजा-पद्धति में संन्यास-धर्म की उतनी आवश्यकता नहीं। यथार्थ में उन्होंने प्रवृत्ति-मार्ग वाले धनवान पुरुषों के ही निमित्त इस प्रकार की पूजा-अर्चा की पद्धति की परिपाटी चलायी और स्वयं भी गृहस्थी रहते हुए सदा वात्सल्यभाव से बालकृष्ण की सेवा-पूजा करके ही भक्तों के सामने आदर्श उपस्थित करते रहे; किंतु फिर भी उन्होंने अन्त में श्रीवाराणसी धाम में जाकर भागवत-धर्म के अनुसार सर्वस्व त्यागकर संन्यास-धर्म को ग्रहण किया। जिस संन्यास-धर्म की इतनी महिमा है, उसकी निन्दा संसारी विषयों में आबद्ध जीवों के अतिरिक्त कोई कर ही नहीं सकता। बुद्ध, ईसा और चैतन्य यदि संन्यासी न होते तो ये महापुरुष संसार में आज त्याग का इतना ऊँचा भाव कैसे भर सकते थे? महाप्रभु गौरांगदेव तो त्याग की मूर्ति ही थे। वे तो यहाँ तक कहते हैं-
संदर्शनं विषयिणामथ योषितां च।
हा हन्त हन्त विषभक्षणतोऽप्यसाधु।
अर्थात ‘विषयी लोगों का तथा कामिनियों का दर्शन भी विष-भक्षण से बढ़कर है।’ अहा! ऐसा त्याग का सजीव उदाहरण और कहाँ मिल सकता है? महाप्रभु ने सचमुच में महान त्याग की पराकाष्ठा करके दिखा दी। उनके पथ के अनुयायी अन्तरंग भक्त जीव, सनातन, रूप, रघुनाथदास, प्रबोधानन्द, स्परूप दामोदर, हरिदास, गोपाल भट्ट, लोकनाथ गोस्वामी एक-से-एक बढ़कर परम त्यागी संन्यासी थे। इनका त्याग और वैराग महाप्रभु के परम त्यागमय भावों का एक उज्ज्वल आदर्श है। रूप स्वामी के लिये तो यहाँ तक सुना जाता है, कि वे एक दिन से अधिक एक वृक्ष के नीचे भी नहीं ठहरते थे। व्रजवासियों के घर से टुकडे़ माँग लाना और रोज किसी नये वृक्ष के नीचे पड़ रहना। धन्य है उनके त्याग का और उनके भक्ति को! भगवान के अन्तरंग भक्त उद्धव, विदुर दोनों ही संन्यासी हुए। परम संन्यासिनी गोपिकाओं से बढ़कर त्याग का आदर्श कहाँ मिल सकता है? उद्धव, विदुर और गोपिकाओं ने यद्यपि लिंग-संन्यास नहीं लिया था, क्योंकि लिंग-संन्यास का विधान शास्त्रों में प्राय: ब्राह्मण के लिये ही पाया जाता है, किंतु तो भी ये घर-बार को छोड़कर अलिंग-संन्यासी ही थे।
महाप्रभु भला घर में कैसे रह सकते थे? उनके मन में संन्यास लेने के भाव प्रबलता के साथ उठने लगे। वे मन-ही–मन सोचने लगे कि- ‘अब हम जब तक संन्यासी बनकर और मूँड़ मुड़ाकर घर-घर भिक्षा नहीं माँगेंगे तब तक न तो हमारी आत्मा को पूर्ण शान्ति प्राप्त होगी और न हमारे इन विरोधियों का ही उद्धार होगा। हम इन विरोधियों का उद्धार अपने महान त्याग द्वारा ही कर सकेंगे। ये हमारी बढ़ती हुई कीर्ति से डाह करके ऐसे भाव रखने लगे है।’
प्रभु इन्हीं भावों में मग्न थे कि इतने में ही कटवा में रहने वाले दण्डी स्वामी केशव भारती महाराज नवद्वीप पधारे।
क्रमशः
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