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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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समय के प्रभाव से आज कल तो सभी प्राचीन व्यवस्था नष्ट हो गयी; किंतु हम जब की बात कह रहे हैं उस समय ऐसी परिपाटी थी कि दण्डी संन्यासी किसी भी गृहस्थ के द्वार पर पहुँच जाय, वही गृहस्थ उठकर उनका सत्कार करता और उनसे श्रद्धा-भक्ति के सहित भिक्षा कर लेने के लिये प्रार्थना करता।
दसनामी संन्यासियों में तीर्थ, सरस्वती और आश्रम- इन तीनों को दण्ड धारण करने का अधिकारी है। भारतीयों को भी दण्ड का अधिकार है, किंतु दण्डी सम्प्रदाय में उनका आधा दण्ड समझा जाता है। शेष गिरी, पुरी, वन, अरण्य तथा पर्वत आदि छ: प्रकार के संन्यासियों को दण्ड का अधिकार नहीं है।दण्ड ब्राह्मण ही ले सकता है। इसलिये दण्डी संन्यासी ब्राह्मण ही होते हैं। केशव भारती दण्डी ही संन्यासी थे। पीछे इनकी शिष्य-परम्परा में इनके उत्तराधिकारी गृहस्थी बन गये जो कटवा के समीप अब भी विद्यमान हैं।
भारती को देखते ही प्रभु ने उठकर उनके चरणों में प्रणाम किया। भारती इनके शरीर में ऐसे अपूर्व प्रेम के लक्षणों को देखकर एकदम भौंचक्के-से रह गये। इनकी नम्रता, शालीनता और सुशीलता से प्रसन्न होकर भारती प्रेम में विभोर हुए कहने लगे- ‘आप या तो नारद हैं या प्रह्लाद, आप तो मूर्तिमान प्रेम ही दिखायी पड़ते है।’
भारती के मुख से ऐसी बात सुनकर प्रभु प्रेम में विभोर हो गये और भारती के पैरों को पकड़कर गद्गद-कण्ठ से कहने लगे- ‘आप साक्षात ईश्वर हैं, आप नररूप में नारायण हैं। आज मुझ गृहस्थी के घर को पावन बनाइये और मेरे ऊपर कृपा कीजिये, जिससे मैं संसार-बन्धन से मु्क्त हो सकूँ।’ भारती ने कहा- ‘आपके सम्पूर्ण शरीर में भगवत्ता के चिह्न हैं। आप प्रेम के अवतार हैं, मुझे तो आपके दर्शन से भगवान के दर्शन का-सा सुख अनुभव हो रहा है।’
प्रभु ने भारती की स्तुति करते हुए कहा- ‘आप तो भगवान के प्यारे हैं, आपके हृदय में भगवान सदा निवास करते हैं। आपके नेत्रों में श्रीकृष्ण की छाया सदा छायी रहती है। इसीलिये चराचर विश्व में आप भगवान के ही दर्शन करते हैं।’
इस प्रकार इन दोनों महापुरुषों में बहुत देर तक प्रेम की बातें होती रहीं। एक-दूसरे के गुणों पर आसक्त होकर एक-दूसरे की स्तुति कर रहे थे। अनन्तर शचीमाता ने भोजन तैयार किया। प्रभु ने श्रद्धापूर्वक भारती जी को भिक्षा करायी। दूसरे दिन भारती जी गंगा-किनारे अपने आश्रम को ही फिर लौट गये। मानो वे प्रभु को संन्यास का स्मरण दिलाने के ही लिये आये हों।भारती जी के चले जाने पर प्रभु का मन अब और भी अधिकाधिक अधीर होने लगा। अब वे महात्याग की तैयारियाँ करने लगे। पूर्ण सुख जिसका नाम है, जिसके आगे दूसरा सुख हो ही नहीं सकता, वह तो त्याग से ही मिलता है। धर्म, तप, ज्ञान और त्याग- ये ही भक्ति के परम साधन हैं। इसलिये शास्त्रों में बताया है-
सत्यान्नास्ति परो धर्मों मौनान्नास्ति परं तप:।
विचारान्न परं ज्ञानं त्यागान्नास्ति परं सुखम्।।
अर्थात जिसने एक सत्य का अवलम्बन कर लिया उसने सभी धर्मों का पालन कर लिया। जिसने मौन रहकर वाणी का पूर्णरीत्या संयम कर लिया, उसे सभी तपों का फल प्राप्त हो गया। जो सदा सत्-असत् का विचार करता रहता है, उसके लिये इससे बढ़कर और ज्ञान हो ही क्या सकता है और जिसने सर्वस्व त्याग कर दिया, उसने सबसे श्रेष्ठ परम सुखको प्राप्त कर लिया।
भक्तवृन्द और गौरहरि…..
महाप्रभु का वैराग्य दिनों दिन बढ़ता ही जाता था, उधर विरोधियों के भाव भी महाप्रभु के प्रति अधिकाधिक उत्तेजनापूर्ण होते जाते थे। दुष्ट-प्रकृति के कुछ पुरुष प्रभु के ऊपर प्रहार करने का सुयोग ढूंढ़ने लगे। महाप्रभु ने ये बातें सुनी और उनके हृदय में उन भाइयों के प्रति महान दया आयी। वे सोचने लगे- ‘ये इतने भूले हुए जीव किस प्रकार रास्ते पर आ सकेंगे? इनके उद्धार का उपाय क्या है, ये लोग किस भाँति श्रीहरि की शरण में आ सकेंगे।’
एक दिन महाप्रभु भक्तों के सहित गंगा-स्नान के निमित्त जा रहे थे। रास्ते में प्रभु ने दो-चार विरोधियों को अपने ऊपर ताने कसते हुए देखा। तब आप हंसते हुए कहने लगे- ‘पिप्पली के टुकडे़ इसलिये किये थे कि उससे कफकी निवृत्ति हो, किंतु उसका प्रभाव उलटा ही हुआ। उससे कफकी निवृत्ति न होकर और अधिक बढ़ने ही लगा। इतना कहकर प्रभु फिर जोरों के साथ हंसने लगे। भक्तों में से किसी ने भी इस गूढ़ वचन का रहस्य नहीं समझा। केवल नित्यानन्द जी प्रभु की मनोदशा देखकर ताड़ गये कि जरूर प्रभु हम सबको छोड़कर कहीं अन्यत्र जाने की बात सोच रहे हैं। इसीलिये उन्होंने एकांत में प्रभु से पूछा-‘प्रभो! आप हमसे अपने मन की कोई बात नहीं छिपाते। आजकल आपकी दशा कुछ विचित्र ही हो रही है। हम जानना चाहते हैं, इसका क्या कारण है?’
नित्यानंद जी की ऐसी बात सुनकर गद्गद-कण्ठ से प्रभु कहने लगे- ‘श्रीपाद! तुमसे छिपाव ही क्या है? तुम तो मेरे बाहर चलने वाले प्राण ही हो। मैं अपने मन की दशा तुमसे छिपा नहीं सकता! मुझे कहने में दु:ख हो रहा है। अब मेरा मन यहाँ नहीं लग रहा है। मैं अब अपने अधीन नहीं हूँ। जीवों का दु:ख अब मुझसे देखा नहीं जाता। मैं जीवों के कल्याण के निमित्त अपने सभी संसारी सुखों का परित्याग करूँगा। मेरा मन अब गृहस्थ में नहीं लगता है। अब मैं परिव्राजक-धर्म का पालन करूंगा। जो लोग मेरी उत्तरोतर बढ़ती हुई कीर्ति से डाह करने लगे हैं, जो मुझे भक्तों के सहित आनन्द-विहार करते देखकर जलते है, जो मेरी भक्तों के द्वारा की हुई पूजा को देखकर मन-ही-मन हमसे विद्वेष करते हैं, वे जब मुझे मूँड़ मुड़ाकर घर-घर भिक्षा के टुकड़े माँगते देखेंगे, तो उन्हें अपने बुरे भावों के लिये पश्चात्ताप होगा। उसी पश्चात्ताप के कारण वे कल्याण-पथ के पथिक बन सकेंगे। इन मेरे घुंघराले काले-काले बालों ने ही लोगों के विद्वेषपूर्ण हृदय को क्षुभित बना रखा है।
क्रमशः
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