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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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भक्तों द्वारा आंवले के जल से धोये हुए और सुगन्धित तैलों से तर हुए ये बाल ही ही भूले-भट के अज्ञानी पुरुषों के हृदय में विद्वेष की अग्नि भभकाते हैं। मैं इन घुंघराले बालों को नष्ट कर दूंगा। शिखासूत्र का त्याग करके मै। वीतराग संन्यासी बनूँगा। मेरा हृदय अब संन्यासी होने के लिये पड़प रहा है। मुझे वर्तमान दशा में शांति नहीं, सच्चा सुख नहीं। मैं अब पूर्ण शांति और सच्चे सुख की खोज में संन्यासी बनकर द्वार-द्वार पर भटकूंगा। मैं अपरिग्रही संन्यासी बनकर सभी प्रकार के परिग्रहों का त्याग करूँगा। श्रीपाद! तुम स्वयं त्यागी हो, मेरे पूज्य हो, बड़े हो, मेरे इस काम में रोडे़ मत अटकाना।’
प्रभु की ऐसी बात सुनते ही नित्यानन्द जी अधीर हो गये। उन्हें शरीर का भी होश नहीं रहा। प्रेम के कारण उनके नेत्रों में से अश्रु बहने लगे। उनका गला भर आया। रुँधे हुए कण्ठ से उन्होंने रोते-रोते कहा- प्रभो! आप सर्वसमर्थ हैं, सब कुछ कर सकते हैं। मेरी क्या शक्ति है, जो आपके काम में रोडे़ अटका सकूं? किंतु प्रभो! ये भक्त आपके बिना कैसे जीवित रह सकेंगे? हाय! विष्णुप्रिया की क्या दशा होगी! बूढ़ी माता जीवित न रहेंगी। आपके पीछे वह प्राणों का परित्याग कर देंगी। प्रभो! उनकी अन्तिम अभिलाषा भी पूर्ण न हो सकेगी। अपने प्रिय पुत्र से उन्हें अपने शरीर के दाह-कर्म का भी सौभाग्य प्राप्त न हो सकेगा। प्रभो! निश्चय समझिये, माता आपके बिना जीवित न रहेंगी।’
प्रभु ने कुछ गम्भीरता के स्वर में नित्यानंद जी से कहा- ‘श्रीपाद! आप तो ज्ञानी हैं, सब कुछ समझते हैं। सभी प्राणी अपने-अपने कर्मों के अधीन हैं। जितने दिनों तक जिसका जिसके साथ संबंध होता है, वह उतने ही दिनों तक उसके साथ रह सकता है। सभी अपने-अपने प्रारब्ध कर्मों से विवश हैं।’
प्रभु की बातें सुनकर नित्यानंद जी चुप रहे। प्रभु उठकर मुकुंद के समीप चले आये। मुकुंददत्त का गला बड़ा ही सुरीला था। प्रभु को उनके पद बहुत पसंद थे। वे बहुधा मुकुन्ददत्त से भक्ति के अपूर्व-अपूर्व पद गवा-गवाकर अपने मन को संतुष्ट किया करते थे। प्रभु को अपने यहाँ आते हुए देखकर मुकुन्द ने जल्दी से उठकर प्रभु की चरण-वंदना की और बैठने के लिये सुंदर आसन दिया। प्रभु ने बैठते ही मुकुंददत्त से कोई पद गाने के लिये कहा। मुकुंद बड़े स्वर के साथ गाने लगे। मुकुंद के पद को सुनकर प्रभु प्रेम में गद्गद हो उठे। फिर प्रेम से मुकुन्दत्त का आलिंगन करते हुए बोले- ‘मुकुन्द! अब देखें तुम्हारे पद कब सुनने को मिलेंगे?’
आश्चर्यचकित होकर सम्भ्रम के सहित मुकुन्द कहने लगे-‘क्यों-क्यों प्रभों! मैं तो आपका सेवक हूँ, जब भी आज्ञा होगी तभी गाऊँगा!’
आँखों में आँसू भरे हुए प्रभु ने कहा- ‘मुकुन्द! अब हम इस नवद्वीप को त्याग देंगे, सिर मुड़ा लेंगे। काषाय वस्त्र धारण करेंगे। द्वार-द्वार से टुकड़े माँगकर अपनी भूख को शांत करेंगे और नगर के बारह सूने मकानों में टूटी कुटियाओं में तथा देवताओं के स्थानों में निवास करेंगे। अब हम गृह त्यागी वैरागी बनेंगे।’ मानो मुकुन्द के ऊपर वज्राघात हुआ हो। उस हृदय को बैधने वाली बात सुनते ही मुकुन्द मूर्च्छित-से हो गये। उनका शरीर पसीने से तर हो गया। बड़े ही दु:ख से कातर स्वर में वे विलख-विलखकर कहने लगे-‘प्रभु! हृदय को फाड़ देने वाली आप यह कैसी बात कह रहे हैं? हाय! इसीलिये आपने इतना स्नेह बढ़ाया था क्या? नाथ! यदि ऐसा ही करना था, तो हम लोगों को इस प्रकार आलिंगन करके, पास में बैठा के, प्रेम से भोजन कराके, एकांत में रहस्य की बातें कर-करके, इस तरह से अपने प्रेमपाश में बांध ही क्यों लिया था? हे हमारे जीवन के एकमात्र आधार! आपने बिना हम नवद्वीप में किसके बनकर रह सकेंगे? हमें कौन प्रेम की बातें सुनावेगा? हमें कौन संकीर्तन की पद्धति सिखावेगा? हम सबको कौन भगवन्नाम का पाठ पढ़ावेगा? प्रभों! आपके कमलमुख के बिना देखे हम जीवित न रह सकेंगे। यह अपने क्या निश्चय किया है? हे हमारे जीवनदाता! हमारे ऊपर दया करो।’
प्रभु ने रोते हुए मुकुन्द को अपने गले से लगाया। अपने कोमल करों से उनके गरम-गरम आंसुओं को पोछते हुए कहने लगे- ‘मुकुन्द! तुम इतने अधीर मत हो। तुम्हारे रुदन को देखकर हमारा हृदय फटा जाता है। हम तुमसे कभी पृथक न होंगे। तुम सदा हमारे हृदय में ही रहोगे।’
मुकुन्द को इस प्रकार समझाकर प्रभु गदाधर के समीप आये। महाभागवत गदाधर ने प्रभु को इस प्रकार आसमय में आते देखकर कुछ आश्चर्य-सा प्रकट किया और जल्दी से प्रभु की चरण-वंदना करके उन्हें बैठने को आसन दिया। आज ये प्रभु की ऐसी दशा देखकर कुछ भयभीत-से हो गये। उन्होंने आजतक प्रभु की ऐसी आकृति कभी नहीं देखी थी। उस समय की प्रभु की चेष्टा में दृढ़ता थी, ममता थी, वेदना थी और त्याग, वैराग्य, उपरति और न जाने क्या-क्या भव्य भावनाएँ भरी हुई थीं। गदाधर कुछ भी न बोल सके। तब प्रभु आप-से-आप ही कहने लगे- गदाधर! तुम्हें मैं एक बहुत ही दु:खपूर्ण बात सुनाने आया हूँ। बुरा मत मानना! क्यों, बुरा तो न मानोगे?’ मानो गदाधर के ऊपर यह दूसरा प्रहार हुआ। वे उसी भाँति चुप बैठे रहे। प्रभु की इस बात का भी उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। तब प्रभु कहने लगे- ‘मैं अब तुम लोगों से पृथक हो जाऊँगा। अब मैं इन संसारी भोगों का परित्याग कर दूँगा और यतिधर्म का पालन करूँगा।’
गदाधर तो मानो काठ की मूर्ति बन गये। प्रभु की इस बात को सुनकर भी वे उसी तरह मौन बैठे रहे इतना अवश्य हुआ कि उनका चेतनाशून्य शरीर पीछे की दीवाल की ओर स्वयं लुढ़क पड़ा। प्रभु समीप ही बैठे थे, थोड़ी ही देर में गदाधर का सिर प्रभु के चरणों में लोटने लगा। उनके दोनों नेत्रों से दो जल की धाराएँ निकलकर प्रभु के पाद-पद्मों को प्रक्षालित कर रही थीं। उन गरम-गरम अश्रुओं के जल से प्रभु के शीतल-कोमल चरणों में एक प्रकार की ओर अधिक ठंढक-सी पड़ने लगी। उन्होंने गदाधर के सिर को बलपूर्वक उठाकर अपनी गोदी में रख लिया और उनके आंसू पोंछे।
क्रमशः
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