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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु कहने लगे- ‘गदाधर! तुम इतने अधीर होगे तो भला मैं अपने धर्म को कैसे निभा सकूँगा? मैं सब कुछ देख सकता हूँ, कितु तुम्हें इस प्रकार विलखता हुआ नहीं देख सकता।
मैंने केवल महान प्रेम की उपलब्धि करने के ही निमित्त ऐसा निश्चय किया है। यदि तुम मेरे इस शुभ संकल्प में इस प्रकार विघ्न उपस्थित करोगे तो मैं भी कभी उस काम को न करूँगा। तुम्हें दु:खी छोड़कर मैं शाश्वत सुख को भी नहीं चाहता। क्या कहते हो? बोलते क्यों नहीं। रुँधे हुए कण्ठ बड़े कष्ट के साथ लड़खड़ाती हुई वाणी में गदाधर ने कहा- ‘प्रभों! मैं कह ही क्या सकता हूँ? आपकी इच्छा के विरुद्ध कहने की किस की सामर्थ्य है? आप स्वतंत्र ईश्वर हैं।’
प्रभु ने कहा-‘मैं तुमसे आज्ञा चाहता हूँ।’ गदाधर अब अपने वेग को और अधिकन रोक सके। वे ढाह मार-मारकर जारों से रुदन करने लगे। प्रभु भी अधीर हो उठे। उस समय का दृश्य बड़ा ही करुणापूर्ण था। प्रभु की प्रेममय गोद में पड़े हुए गदाधर अबोध बालक की भाँति फूट-फूटकर रुदन कर रहे थे। प्रभु उनके सिर पर हाथ फेरते हुए उन्हें ढाढ़स बंधा रहे थे। प्रभु अपने अश्रुओं को वस्त्र के छोर से पोंछते हुए कह रहे थे- ‘गदाधर! तुम मुझसे पृथक न रह सकोगे। मैं जहाँ भी रहूँगा तुम्हें साथ ही रखूँगा। तुम इतने अधीर क्यों होते हो? तुम्हारे बिना तो मुझे वैकुण्ठ का सिंहासन भी रुचिकर नहीं होगा। तुम इस प्रकार की अधीरता को छोड़ों।’ ‘मंगलमय भगवान सब भला ही करेंगे।’ यह कहते-कहते गदाधर का हाथ पकड़े हुए प्रभु श्रीवास के घर पहुँचे। गदाधर की दोनों आँखे लाल पड़ी हुई थी। नाक में से पानी बह रहा था। शरीर लड़खड़ाया हुआ था; कहीं पैर रखते थे, कहीं जाकर पड़ते थे। सम्पूर्ण देह डगमगा रही थी। प्रभु के हाथ के सहारे से वे यंत्र की तरह जले जा रहे थे।प्रभु उस समय सावधान थे। श्रीवास सब कुछ समझ गये। उनसे पहले ही नित्यानंद जी ने आकर यह बात कह दी थी। वे प्रभु को देखते ही रुदन करने लगे। प्रभु ने कहा- ‘आप मेरे पिता के तुल्य हैं। जब आप ही इस तरह मुझे हतोत्साहित करेंगे तो मैं अपने धर्म का पालन कैसे कर सकूँगा? मैं कोई बुरा काम करने नहीं जा रहा हूँ। केवल अपने शरीर के स्वार्थ के निमित्त भी संन्यास नहीं ले रहा हूँ। आजकल मेरी दशा उस महाजन साहूकारकी-सी है, जिसका नाम तो बड़ा भारी हो, किंतु पास में पैसा एक भी न हो। मेरे पास प्रेम का अभाव है। आप सब लोगों को संसारी भोग्य पदार्थों की न तो इच्छा ही है और न कमी ही। आप सभी भक्त प्रेम के भूखे हैं। मैं अब परदेश जा रहा हूँ। जिस प्रकार महाजन परदेशों में जाकर धन कमा लाता है और उस धन से अपने कुटुम्ब-परिवार के सभी स्वजनों का समान भाव से पालन-पोषण करता है, उसी प्रकार मैं भी प्रेमरूपी धन कमाकर आप लोगों के लिये लाऊँगा। तब हम सभी मिलकर उसका उपभोग करेंगे।’
कुछ क्षीण स्वर में श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! जो बड़भागी भक्त आपके लौटने तक जीवित रह सकेंगे वे ही आपकी कमाई का उपभोग कर सकेंगे। हम लोग तो आपके बिना जीवित रह ही नहीं सकते।’
प्रभु ने कहा- ‘पण्डित जी! आप ही हम सबके पूज्य हैं। मुझे कहने में लज्जा लगती है, किंतु प्रसंग वश कहना ही पड़ता है कि आपके ही द्वारा हम सभी भक्त इतने दिनों तक प्रेम के सहित संकीर्तन करते हुए भक्ति-रसामृत का आस्वादन करते रहे। अब आप ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि हम अपने व्रत को पूर्णरीत्या पालन कर सकें।’
इतने में ही मुरारी गुप्त भी वहाँ आ गये। वे तो इस बात को सुनते ही एकदम बेहोश होकर गिर पड़े। बहुत देर के पश्चात चैतन्य लाभ होने पर कहने लगे- ‘प्रभो! आप सर्वसमर्थ हैं, किसी की मानेंगे थोड़े ही। जिसमें आप जीवों का कल्याण समझेंगे, वह चाहे आपके प्रियजनों के लिये कितनी भी अप्रिय बात क्यों न हो, उसे भी कर डालेंगे, किंतु हे हम पतितों के एकमात्र आधार! हमें अपने हृदय से न भुलाइयेगा। आपके श्रीचरणों की स्मृति बनी रहे, ऐसा आशीर्वाद और देते जाइयेगा। आपके चरणों का स्मरण बना रहे तो यह नीरस जीवन भी सार्थक है। आपके चरणों की विस्मृति में अंधकार है और अंधकार ही अज्ञानता का हेतु है।’
प्रभु ने मुरारी का गाढालिंगन करते हुए कहा- ‘तुम तो जन्म-जन्मांतरों के मेरे प्रिय सुहृद् हो। यदि तुम सबको ही भुला दूंगा तो फिर स्मृति को ही रखकर क्या करूँगा। स्मृति तो केवल तुम्हीं प्रेमी बन्धुओं के चिन्तन सभी अन्तरंग भक्तों में यह बात बिजली की तरह फैल गयी। जो भी सुनता, वहीं हाथ मलने लगता। कोई ऊर्ध्व श्वास छोड़ता हुआ कहता- ‘हाय! अब यह कमलयन फिर प्रेमभरी चितवन से हमारी ओर न देख सकेंगे।’ कोई कहता- ‘क्या गौरहरि के मुन-मन-मोहन मनोहर मुख के दर्शन अब फिर न हो सकेंगे?’ कोई कहता- ‘हाय! इन घुंघराले केशों को कौन निर्दयी नाई सिर से अलग कर सकता है? बिना इन घुघंराले बालों वाला यह घुटा सिर भक्तों के हृदयों में कैसी दाह उत्पन्न करेगा? कोई कहता- ‘प्रभु काषाय वस्त्र की झोली बनाकर घर-घर टुकड़े मांगते हुए किस प्रकार फिरेंगे?’ कोई कहता- ‘ये अरुण रंगे के कोमल चरण इस कठोर पृथ्वी पर नंगे किस प्रकार देश-विदेशों में घूम सकेंगे?’
कोई-कोई पश्चात्ताप करता हुआ कहता- ‘हम अब उन घुँघराले काले-काले कन्धों तक लटकने वाले बालों में सुगन्धित तैल न मल सकेंगे क्या? क्या अब हमारे पुण्यों का अंत हो गया? क्या अब नवद्वीप का सौभाग्य-सूर्य नष्ट होना चाहता है? क्या नदियानागर अपनी इस लीला-भूमि का परित्याग करके किसी अन्य सौभाग्यशाली प्रदेश को पावन बनावेंगे ? क्या अब नवद्वीप पर क्रुर ग्रहों की वक्रदृष्टि पड़ गयी? क्या अब भक्तों का एकमात्र प्रेमदाता हम सबको विलखता हुआ ही छोड़कर चला जायगा? क्या हम सब अनाथों की तरह तड़प-तड़पकर अपने जीवन के शेष दिनों को व्यतीत करेंगे? क्या सचमुच में हम लोग जाग्रत-अवस्था में ये बातें सुन रहे हैं या हमारा यह स्वप्न का भ्रम ही है? मालूम तो स्वप्न-सा ही पड़ता है।’
क्रमशः
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