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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इस प्रकार सभी भक्त प्रभु के भावी वियोगजन्य दु:ख का स्मरण करते हुए भाँति-भाँति से प्रलाप करने लगे।
शचीमाता और गौरहरि……..
भक्तों के मुख से निमाई के संन्यास की बात सुनकर माता के शोक का पारावार नहीं रहा। वह भूली-सी, भटकी-सी, किंकर्तव्यविमूढा-सी होकर चारों ओर देखने लगी। कभी आगे देखती, कभी पीछे को निहारती, कभी आकाश की ही ओर देखने लगती। मानो माता दिशा-विदिशाओं से सहायता की भिक्षा माँग रही है। लोगों के मुख से इस बात को सुनकर दु:खिनी माता का धैर्य एकदम जाता रहा। वह विलखती हुई, रोती हुई, पुत्र-वियोगरूपी दावानल से झुलसी हुई-सी महाप्रभु के पास पहुँची और बड़ी ही कातरता के साथ कलेजे की कसक को अपनी मर्माहत वाणी से प्रकट करती हुई कहने लगी- ‘बेटा निमाई! मैं जो कुछ सुन रही हूँ वह सब कहाँ तक ठीक है?’ पुत्र-वियोग को अशुभ समझने वाली माता के मुख से वह दारुण बात स्वयं ही न निकली। उसने गोलमाल तरह से ही उस बात को पूछा। कुछ अन्यमनस्क भाव से प्रभु ने पूछा- ‘कौन-सी बात?’ हाय! उस समय माता का हृदय स्थान-स्थान से फटने लगा। वह अपने मुख से वह हृदय को हिला देने वाली बात कैसे कहती? कड़ा जी करके उसने कहा- ‘बेटा! कैसे कहूँ, इस दु:खिनी विधवा के ही भाग्य में न जाने विधाता ने सम्पूर्ण आपत्तियाँ लिख दी हैं क्या? मेरे कलेजे का बड़ा टुकड़ा विश्वरूप घर छोड़कर चला गया और मुझे मर्माहत बनाकर आज तक नहीं लौटा। तेरे पिता बीच में ही धोखा दे गये। उस भयंकर पति-वियोगरूपी पहाड़-से दु:ख को भी मैंने केवल तेरा ही मुख देखकर सहन किया। तेरे कमल के समान खिले हुए मुख को देखकर मैं सभी विपत्तियों को भूल जाती। मुझे जब कभी दु:ख होता तो तुझसे छिपकर रोती। तेरे सामने इसलिये खुलकर नहीं रोती थी कि मेरे रुदन से तेरा चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख कहीं म्लान न हो जाय। मैं तेरे मुख पर म्लानता नहीं देख सकती! दु:ख-दावानल में जलती हुई इस अनाश्रिता दु:खिनी का तेरा चन्द्रमा के समान शीतल मुख ही एकमात्र आश्रय था। उसी की शीतलता में मैं अपने तापों को शांत कर लेती। अब भक्तों के मुख से सुन रही हूँ कि तू भी मुझे धोखा देकर जाना चाहता है। बेटा! क्या यह बात ठीक है?’ माता की ऐसी करुणापूर्ण कातर वाणी को सुनकर प्रभु ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वे डबडबाई आँखों से पृथ्वी की ओर देखने लगी। उनके चेहरे पर म्लानता आ गयी। वे भावी वियोगजन्य दु:ख के कारण कुछ विषण्ण-से हो गये।
माता की अधीरता और भी अधिक बढ़ गयी। उसने भयभीत होकर बड़े ही आर्तस्वर में पूछा- ‘निमाई! बेटा, मैं सत्य-सत्य जानना चाहती हूँ। क्या यह बात ठीक है? चुप रहने से काम न चलेगा। मौन रहकर मुझे और अत्यधिक क्लेश मत पहुँचा, मुझे ठीक-ठीक बता दे।’ सरलता के साथ प्रभु ने स्वीकार किया कि माता ने जो कुछ सुना है, वह ठीक ही है।
इतना सुनने पर माता को कितना अपार दु:ख हुआ होगा, इसे किस कवि की निर्जीव लेखनी व्यक्त करने में समर्थ हो सकती है? माता के नेत्रों से निरन्तर अश्रु निकल रहे थे। वे उस सूखे हुए मुख को तर करते हुए माता के वस्त्रों को भिगोने लगे। रोते-रोते माता ने कहा- ‘बेटा! तुझको जाने के लिये मना करूँ, तो तू मानेगा नहीं। इसलिये मेरी यही प्रार्थना है कि मेरे लिये थोड़ा विष खरीदकर और रखता जा। मेरे आगे-पीछे कोई भी तो नहीं है। तेरे पीछे से मैं मरने के लिये विष किससे मंगाऊंगी? बेचारी विष्णुप्रिया अभी बिलकुल अबोध बालिका है। उसे अभी संसार का कुछ पता ही नहीं। उसने आज तक एक पैसे की भी कोई चीज नहीं खरीदी। यदि उसे ही विष लेने भुजूं तो हाल तो वह जा ही नहीं सकती। चली भी जाय तो कोई उसे अबोध बालिका समझकर देगा नहीं। ये जो इतने भक्त यहाँ आते हैं, ये सब तेरे ही कारण आया करते हैं। तू चला जायगा तो फिर ये बेचारे क्यों आवेंगे? मेरे सूने घर का तू ही एकमात्र दीपक है, तेरे रहने से अंधेरे में भी मेरा घर आलोकित होता रहता है। तू अब मुझे आधी सुलगती ही हुई छोड़कर जा रहा है। जा बेटा! खुशी से जा। किंतु मैंने तुझे नौ महीने गर्भ में रखा है, इसी नाते से मेरा इतना काम तो कर जा। मुझ दु:खिनी का विष के सिवा दूसरा कोई और आश्रय भी तो नहीं। गंगा जी में कूदकर भी प्राण गंवाये जा सकते हैं; किंतु बहुत सम्भव है कोई दयालु पुरुष मुझे उसमें से निकाल ले। इसलिये घर के भीतर ही रहने वाली मुझ आश्रयहीना दु:खिनी का विष ही एकमात्र सहारा है।’ यह कहते-कहते वृद्धा माता बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़ी।
प्रभु ने अपने हाथों से अपनी दु:खिनी माता को उठाया और सम्पूर्ण शरीर में लगी हुई उसकी धूलि को अपने वस्त्र से पोंछा और माता को धैर्य बंधाते हुए वे कहने लगे- ‘माता! तुमने मुझे गर्भ में धारण किया है। मेरे मल-मूत्र साफ किये हैं, मुझे खिला-पिलाकर और पढा़-लिखाकर इतना बड़ा किया है। तुम्हारे ऋण से मैं किस प्रकार उऋण हो सकता हूँ? माता! यदि मैं अपने जीवित शरीर पर से खाल उतारकर तुम्हारें पैरों के लिये जूता बनाकर पहनाऊँ तो भी तुम्हारे इतने भारी ऋण का परिशोध नहीं कर सकता। मैं जन्म-जन्मान्तरों से तुम्हारा ऋणी रहा हूँ और आगे भी रहूँगा। मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ, यदि मेरे वश की बात होती, तो मैं प्राणों को गंवाकर भी तुम्हें प्रसन्न कर सकता। किंतु मैं क्या करूँ? मेरा मन मेरे वश में नहीं है। मैं ऐसा करने के लिये विवश हूँ।’
‘तुम वीर-जननी हो। विश्वरूप-जैसे महापुरुष की माता होने का सौभाग्य तुम्हें प्राप्त हुआ है। तुम्हें इस प्रकार का विलाप शोभा नहीं देता। ध्रुव की माता सुनीति ने अपने प्राणों से भी प्यारे पाँच वर्ष की अवस्था वाले अपने इकलौते पुत्र को तपस्या करने के लिये जाने की आज्ञा प्रदान कर दी थी।
क्रमशः
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